हाई कोर्ट की मंजूरी के बिना राज्य सांसदों, विधायकों के खिलाफ मामले वापस नहीं ले सकते- सुप्रीम कोर्ट

राज्य सरकारों की शक्तियों को खत्म करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि कोई भी राज्य हाई कोर्ट की मंजूरी के बिना सांसदों या विधायकों के खिलाफ किसी भी आपराधिक मामले को वापस नहीं ले सकता।

नई दिल्ली, 10 अगस्त। राज्य सरकारों की शक्तियों को खत्म करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि कोई भी राज्य हाई कोर्ट की मंजूरी के बिना सांसदों या विधायकों के खिलाफ किसी भी आपराधिक मामले को वापस नहीं ले सकता। सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमों के तेज निपटारे से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह आदेश दिया है। जस्टिस रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हम यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि संबंधित उच्च न्यायालय की अनुमति के बिना सांसदों और विधायकों के खिलाफ कोई भी मुकदमा वापस नहीं लिया जाएगा।

Supreme Court

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि विशेष अदालतों में सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाले ट्रायल जज अगले आदेश तक अपने मौजूदा पदों पर बने रहें और उच्च न्यायालय इस पर गौर करें। पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश जारी किए, जिसमें सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के लंबित होने पर विशेष अदालतों की स्थापना करके उनके शीघ्र निपटान का हवाला दिया गया था। अदालत का यह आदेश दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत राज्य सरकारों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग पर रोक लगाता है जो एक अभियोजक को आरोपी के खिलाफ एक आपराधिक मामले को वापस लेने की मांग करने के लिए अधिकृत करता है।

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कोर्ट ने यह आदेश न्याय मित्र, वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया के अनुरोध के बाद दिया। हंसरिया ने कोर्ट के समक्ष उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और महाराष्ट्र के कुछ उदाहरणों को रखा जहां सीआरपीसी की धारा 321 के तहत आदेश जारी किए गए थे। कर्नाटक में अगस्त 2020 में पारित एक सरकारी आदेश के द्वारा 61 आपराधिक मामले वापस लेने का निर्देश जारी किया गया, इनमें से कई मामले मौजूदा विधायकों या सांसदों के खिलाफ दर्ज किये गए थे।

उत्तर प्रदेश की बात करें तो पिछले साल यूपी सरकार ने साध्वी प्राची और तीन मौजूदा विधायकों संगीत सोम, सुरेश राणा और कपिल देव के खिलाफ 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान भड़काऊ बयान देने के लिए मुकदमा वापस लेने का फैसला किया था। इसी प्रकार न्याम मित्र ने कई अन्य राज्यों के उदाहरण कोर्ट के सामने रखे। हंसारिया ने कोर्ट को बताया कि देश भर में वर्तमान और पूर्व सांसदों/विधायकों के खिलाफ 4,800 से ज़्यादा केस लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार से भी फिलहाल जनप्रतिनिधियों के मुकदमे सुन रहे निचली अदालत के जजों की लिस्ट सौंपने को कहा है।

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