US China Tech War: अलीबाबा, बैडू से लेकर BYD तक! अमेरिका ने इन तीन बड़ी चीनी कंपनियों को क्यों किया ब्लैकलिस्ट

US China Tech War: अमेरिका और चीन के बीच टेक्नोलॉजी और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर टकराव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने चीन की कई बड़ी कंपनियों को अपनी अपडेटेड ब्लैकलिस्ट में शामिल कर लिया है। इस सूची में ई-कॉमर्स दिग्गज अलीबाबा, सर्च इंजन कंपनी बैडू और इलेक्ट्रिक व्हीकल निर्माता BYD जैसी कंपनियां शामिल हैं।

अमेरिका का आरोप है कि ये कंपनियां सीधे या परोक्ष रूप से चीन की सेना की मदद कर रही हैं। हालांकि चीन और संबंधित कंपनियों ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

US China Tech War

क्या है यह ब्लैकलिस्ट और क्यों बनाई जाती है?

अमेरिकी रक्षा विभाग समय-समय पर ऐसी कंपनियों की सूची जारी करता है, जिन पर चीन की सेना से जुड़े होने या सैन्य गतिविधियों में सहयोग करने का शक होता है। इस सूची का उद्देश्य अमेरिकी निवेशकों, कंपनियों और सरकारी एजेंसियों को संभावित सुरक्षा जोखिमों के बारे में चेतावनी देना है। किसी कंपनी का नाम इस लिस्ट में आने का मतलब यह नहीं कि उस पर तुरंत प्रतिबंध लग जाएगा, लेकिन इससे उसके खिलाफ आगे सख्त कदम उठाने का रास्ता खुल सकता है।

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अलीबाबा, बैडू और BYD पर क्या आरोप हैं?

अमेरिका का दावा है कि ये कंपनियां ऐसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं जिनका इस्तेमाल चीन की सैन्य क्षमता बढ़ाने में हो सकता है। खासकर AI, डेटा प्रोसेसिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और एडवांस टेक्नोलॉजी को लेकर अमेरिका की चिंता बढ़ी हुई है। वॉशिंगटन का मानना है कि चीन में निजी और सरकारी सेक्टर के बीच करीबी संबंध हैं, जिससे कई कंपनियों की टेक्नोलॉजी सैन्य उपयोग में लाई जा सकती है। हालांकि कंपनियों ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है।

ब्लैकलिस्ट में आने से कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?

फिलहाल इस सूची में शामिल होने से कंपनियों पर सीधे कानूनी प्रतिबंध नहीं लगता। लेकिन इससे अमेरिकी निवेश, बिजनेस पार्टनरशिप और सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं। कई अमेरिकी कंपनियां ऐसे नामों से दूरी बनाना शुरू कर देती हैं ताकि भविष्य में किसी कानूनी या राजनीतिक जोखिम का सामना न करना पड़े। निवेशकों के बीच भी चिंता बढ़ सकती है, जिससे कंपनियों की मार्केट वैल्यू और ग्लोबल विस्तार योजनाओं पर असर पड़ सकता है।

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चीन और कंपनियों ने क्या जवाब दिया?

चीन ने इस फैसले का विरोध करते हुए इसे राजनीतिक कदम बताया है। बैडू ने कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह गलत हैं और वह कानूनी रास्ता अपनाएगी। अलीबाबा ने भी खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि उसका किसी सैन्य गतिविधि से कोई संबंध नहीं है। चीनी सरकार का कहना है कि अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर चीनी कंपनियों को निशाना बना रहा है और ग्लोबल मार्केट में उनकी प्रतिस्पर्धा कम करना चाहता है।

अमेरिका-चीन रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है?

यह फैसला ऐसे समय आया है जब हाल के महीनों में दोनों देशों ने रिश्तों में स्थिरता लाने की बात की थी। लेकिन नई ब्लैकलिस्ट से दोनों देशों के बीच अविश्वास फिर बढ़ सकता है। AI, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल और एडवांस टेक्नोलॉजी पहले ही अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा का केंद्र बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में टेक सेक्टर दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा रणनीतिक और आर्थिक संघर्ष का मैदान बन सकता है।

क्या यह सिर्फ कंपनियों का मामला है या बड़ी रणनीति?

विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल कुछ कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने का मामला नहीं है। इसके पीछे अमेरिका की व्यापक रणनीति है, जिसका मकसद चीन की टेक्नोलॉजिकल और सैन्य प्रगति पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर उसे सीमित करना है। दूसरी तरफ चीन अपनी घरेलू कंपनियों को ग्लोबल स्तर पर आगे बढ़ाना चाहता है। ऐसे में अलीबाबा, बैडू और BYD का मामला दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बढ़ती टेक और जियोपॉलिटिकल प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय माना जा रहा है।

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