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National Unity Day 2025: सरदार पटेल को कैसे मिला 'लौह पुरुष' नाम, 150वीं जयंती पर भी प्रेरणादायक है उनके विचार

Sardar Vallabhbhai Patel Jyanti: पूरा देश लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती मना रहा है। हर साल 31 अक्टूबर को मनाया जाने वाला यह दिन राष्ट्रीय एकता दिवस (National Unity Day) के रूप में समर्पित है, लेकिन इस बार यह और भी खास है - क्योंकि यह उनके जन्म का सवा सौवां वर्ष यानी 150वीं वर्षगांठ है। देशभर में आज 'रन फॉर यूनिटी (Run for Unity)' कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।

सरदार वल्लभभाई पटेल केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि आज़ाद भारत के निर्माता, दृढ़ प्रशासक और सच्चे राष्ट्रनायक थे - जिनकी दूरदृष्टि ने एक बिखरे हुए भारत को एक सूत्र में पिरोया।

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किसान परिवार से भारत के लौहपुरुष तक की यात्रा

सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। केवल 16 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हुआ और 33 वर्ष की आयु में उनकी पत्नी का निधन हो गया। जीवन के संघर्षों के बीच उन्होंने लंदन जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी की और भारत लौटकर अहमदाबाद में वकालत शुरू की। उनकी ईमानदारी और न्यायप्रियता के कारण लोग उन्हें "पटेल साहब" के नाम से सम्मान देते थे।

महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर पटेल ने कानून की दुनिया छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में कदम रखा।उनका पहला बड़ा योगदान 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में रहा। खेड़ा में सूखे की वजह से किसानों की हालत खराब थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने कर माफ करने से इंकार कर दिया। पटेल ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया - और ब्रिटिश सरकार को किसानों के कर माफ करने के लिए झुकने पर मजबूर किया। यही वह क्षण था जब पटेल का नाम एक सशक्त जननेता के रूप में उभरने लगा।

'सरदार' कैसे बने वल्लभभाई पटेल?

1928 में गुजरात के बारडोली सत्याग्रह ने पटेल के जीवन को नई दिशा दी। बारदोली के किसानों पर ब्रिटिश सरकार ने अन्यायपूर्ण टैक्स लगाया था। पटेल ने आंदोलन का सफल नेतृत्व किया और आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा। इस संघर्ष के बाद बारडोली की महिलाओं ने वल्लभभाई को प्यार और सम्मान से "सरदार" की उपाधि दी। महात्मा गांधी ने भी कहा, "आज भारत को उसका सच्चा सरदार मिल गया है।"

ऐसे पड़ा 'भारत के लौह पुरुष' नाम

1947 में जब भारत को स्वतंत्रता मिली, तो देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी - 562 रियासतों को एक राष्ट्र में जोड़ना। कुछ रियासतें पाकिस्तान में शामिल होना चाहती थीं, कुछ स्वतंत्र रहना। लेकिन सरदार पटेल ने अपने दृढ़ निश्चय, राजनीतिक बुद्धिमत्ता और कूटनीति से यह कर दिखाया जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसी रियासतें जहां अलग राह पर थीं, उन्हें भी उन्होंने भारतीय संघ में मिला लिया। उन्होंने "एक भारत" का सपना साकार किया - बिना किसी बड़े युद्ध के, सिर्फ संवाद और दृढ़ नेतृत्व से। इसी कारण उन्हें "भारत का लौह पुरुष (Iron Man of India)" और "भारत का बिस्मार्क" कहा गया।

'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' का सपना

सरदार पटेल का मानना था कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है और यह विविधता तभी सार्थक है जब हम सब एक धागे में बंधे रहें। आज जब भारत राष्ट्रीय एकता दिवस मना रहा है,तो यह केवल एक श्रद्धांजलि नहीं - बल्कि सरदार पटेल के उस "एक भारत, श्रेष्ठ भारत" के विज़न को याद करने का अवसर है। 2025 में जब उनकी 150वीं जयंती मनाई जा रही है,तो यह सिर्फ अतीत की याद नहीं, बल्कि एकता और राष्ट्रनिर्माण की भावना को दोहराने का अवसर है। 'रन फॉर यूनिटी' के जरिए देश एक बार फिर यह संदेश देगा हम अलग भाषाएं बोलते हैं, अलग संस्कृतियां जीते हैं, लेकिन भारत की आत्मा एक ही है।"

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