'रोका' प्रथा नहीं बल्कि सामाजिक बुराई, होता है गुलामों सा बर्ताव:दिल्‍ली हाईकोर्ट

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर से हैरत-अंगेज बात कही है, तलाक के एक मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि 'रोका' प्रथा एक सामाजिक बुराई है क्योंकि इस प्रथा के जरिये लड़के-लड़की के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता है।

मालूम हो कि शादी से पहले 'रोका' की प्रथा होती है, जिसके तहत कुछ लेन-देन के साथ ये तय होता है कि लड़का-लड़की शादी के लिए तैयार हैं और अब इसके बाद वो शादी के लिए कहीं और नहीं जायेंगे।

जस्टिस प्रदीप नंद्राजोग और जस्टिस प्रतिभा रानी की बैंच ने निर्दयता और परित्‍याग के आधार पर इस बयान को दिया है। दरअसल कोर्ट में एक तलाक का मामला सामने आया था जिसमें पति ने कहा था रोका की रस्‍म के बाद उसकी पत्‍नी शिकायत करने लगी कि उसे बढ़िया गिफ्ट नहीं मिले और साथ ही उसने ससुराल पक्ष और पति की कमाई पर शक भी जाहिर किया था।

जबकि महिला ने इन आरोपों से इनकार कर दिया है, इस मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि 'रोका' एक सामाजिक बुराई है जिसमें मिलने वाले गिफ्ट के जरिये समाज को शादी की खबर दी जाती है, जो कि एक बिल्कुल भी सही नहीं है। इसमें लड़की के घरवालों पर बोझ पड़ता है और लड़के के घरवालों पर भी दवाब होता है, जिसके चलके रिश्तों में खटास पैदा होती है जो कि आगे चलकर रिश्तों के बवाल का कारण बनती है।

क्या है मामला?

जिस मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने ये राय दी है, दरअसल उस मामले में दंपती की शादी नवंबर 2006 में हुई थी और 2007 में दोनों को शादी से एक संतान भी हो गई लेकिन इसके बाद दोनों के बीच झगड़े होने लगे जिसके बाद साल 2008 में लड़की ने ससुराल छोड़ दिया।

इसके बाद साल 2013 में निर्दयता और परित्‍याग के आधार पर पति ने तलाक मांगा जो उसे मिल गया। जिसके खिलाफ महिला ने 2013 में हाईकोर्ट में अर्जी लगाई। जहां कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोई अनैतिक व्यवहार नहीं हुआ है क्योंकि इस केस में ना तो परित्याग किया गया है और ना ही किसी तरह की निर्दयता बरती गई है।

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