TMC की अंदरूनी लड़ाई में ऋतब्रत बनर्जी की बड़ी जीत! बने रहेंगे LoP, हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक से किया साफ इनकार

Ritabrata Banerjee to Remain West Bengal LoP: पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब अदालत तक पहुंच चुका है। इस मामले में गुरुवार को कलकत्ता हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई, जहां अदालत ने फिलहाल किसी भी तरह का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। इसका मतलब है कि विधानसभा अध्यक्ष की ओर से लिया गया फैसला अभी प्रभावी रहेगा और ऋतब्रत बनर्जी नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे।

इस नियुक्ति को लेकर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के भीतर ही दो अलग-अलग गुट आमने-सामने हैं। एक तरफ पार्टी नेतृत्व के समर्थन वाला समूह है, जबकि दूसरी ओर बागी विधायकों का गुट है। इसी खींचतान के बीच नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हुई, जिसमें अब हाईकोर्ट ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है। साथ ही इस मामले से जुड़े कथित फर्जी हस्ताक्षर विवाद की जांच भी जारी है, जिसने पूरे घटनाक्रम को और अधिक चर्चा में ला दिया है।

Ritabrata Banerjee

दो गुटों ने भेजे थे अलग-अलग नाम

नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए तृणमूल कांग्रेस की ओर से दो अलग-अलग नाम सामने आए थे। पार्टी नेतृत्व के करीबी गुट ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम का प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को भेजा था। वहीं, पार्टी के बागी विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी का नाम आगे बढ़ाया।

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दोनों प्रस्ताव मिलने के बाद विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने ऋतब्रत बनर्जी के नाम को स्वीकार कर उन्हें नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर दिया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देने से किया इनकार

गुरुवार 18 जून 2026 को हुई सुनवाई में जस्टिस कृष्ण राव ने स्पष्ट किया कि अदालत फिलहाल स्पीकर के फैसले पर कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं कर रही है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को अपने जवाब और विरोध में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पक्षकारों को दो सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई अब 28 जुलाई को होगी।

कल्याण बनर्जी ने क्या कहा

तृणमूल कांग्रेस के सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने सुनवाई के बाद कहा कि अदालत ने कोई अंतरिम राहत नहीं दी है, लेकिन याचिका को स्वीकार कर लिया गया है। उनके अनुसार अब इस पूरे मामले पर विस्तृत सुनवाई होगी और उसके बाद अंतिम फैसला सामने आएगा।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उठाए अहम सवाल

मंगलवार को हुई पिछली सुनवाई में जस्टिस कृष्ण राव ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया था। अदालत ने पूछा था कि यदि किसी एक राजनीतिक दल की ओर से नेता प्रतिपक्ष के लिए दो अलग-अलग नाम भेजे जाएं तो ऐसी स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी क्या होगी। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि क्या अध्यक्ष अपने स्तर पर फैसला ले सकते हैं या फिर दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देना जरूरी होता है। यह सवाल पूरे विवाद का मुख्य बिंदु बन गया है।

स्पीकर की ओर से क्या दलील दी गई

विधानसभा अध्यक्ष की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने अदालत को बताया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा परिलब्धियां अधिनियम, 1937 के तहत नेता प्रतिपक्ष वही सदस्य माना जाता है जिसे सदन में सबसे अधिक संख्या वाले विपक्षी दल के नेता के रूप में मान्यता मिली हो।

उन्होंने अदालत में यह भी कहा कि यदि किसी राजनीतिक दल के संख्याबल या उसके नेता को लेकर विवाद खड़ा होता है तो ऐसे मामलों में अध्यक्ष का फैसला अंतिम और मान्य माना जाता है।

फर्जी हस्ताक्षर विवाद ने बढ़ाई मुश्किलें

इस पूरे मामले से जुड़ा एक और विवाद भी सामने आया है। आरोप लगाया गया है कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय के समर्थन में भेजे गए प्रस्ताव पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षर असली नहीं थे। बताया जा रहा है कि यह प्रस्ताव तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की ओर से भेजा गया था। बाद में कुछ विधायकों ने दावा किया कि दस्तावेज पर मौजूद उनके हस्ताक्षर सही नहीं हैं।

शिकायत के बाद शुरू हुई जांच

ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने सबसे पहले इस मामले पर सवाल उठाए थे और औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत सामने आने के बाद विधानसभा सचिवालय ने FIR दर्ज कराई।

FIR के आधार पर पश्चिम बंगाल क्राइम इंवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) ने जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसी उन विधायकों के बयान दर्ज कर रही है जिनके नाम विवादित दस्तावेजों में शामिल बताए जा रहे हैं। इसके साथ ही हस्ताक्षरों के नमूने भी जुटाए जा रहे हैं ताकि दस्तावेजों की सत्यता की जांच की जा सके।

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