Teejan Bai: नहीं रहीं पंडवानी की 'सुर चिरैया' तीजन बाई, एम्स में ली अंतिम सांस, PM मोदी ने जताया शोक
Teejan Bai: आज सुबह एक दुखद खबर संगीत की दुनिया से आई है, मशहूर पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं, उनका आज रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया, वो लंबे समय से बीमारियों से जूझ रही थीं और पिछले कुछ हफ्तों से एम्स में भर्ती थीं।
डॉक्टरों की एक टीम लगातार उनके इलाज में जुटी हुई थी, लेकिन रविवार तड़के करीब 3:15 बजे अचानक उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और उन्होंने 70 साल की अवस्था में दुनिया को अलविदा कह दिया।

उनके निधन की खबर फैलते ही छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के कला, संगीत और सांस्कृतिक क्षेत्रों में गहरा शोक फैल गया है। तीजन बाई केवल एक लोक कलाकार नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति की एक ऐसी अभूतपूर्व ध्वजवाहक थीं, जिन्होंने देश की प्राचीन लोक परंपराओं को वैश्विक पहचान दिलाने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया, उन्हें लोग पंडवानी की 'सुर चिरैया' कहते थे।
पारंपरिक कला शैली 'पंडवानी' को तीजन बाई ने दी नई पहचान
8 अगस्त 1956 गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने उस दौर में पंडवानी जैसी लोक कला की ओर अपने कदम बढ़ाए थे, जब महिलाओं के लिए सार्वजनिक मंचों पर इस तरह का प्रदर्शन करना अच्छा नहीं माना जाता था तब समाज की परवाह ना करते हुए तीजन बाई ने पारंपरिक कला शैली 'पंडवानी' विश्न पटल पर अपने हूनर से नए कलेवर में चरितार्थ किया था। उन्हें भारत सरकार द्वारा 1987 में पद्म श्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।

13 साल की अवस्था में किया था पहला प्रोग्राम, मिले थे 10 रु
उनका पहला मंचीय प्रोग्राम 13 साल की अवस्था में था, जिसके लिए उन्हें 10 रु मिले थे। उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी की ओर से संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी नवाजा जा चुका था। उन्हें बचपन से ही अपने नाना बृजलाल से महाभारत की पौराणिक कहानियां सुनने का अवसर मिला, जिससे उनके भीतर पंडवानी के प्रति लगाव पैदा हुआ था।
बुलंद आवाज और संवाद अदायगी से तीजन करती थीं सम्मोहित
तमाम सामाजिक बंधनों और प्रतिबंधों के बावजूद तीजन बाई का अपनी कला के प्रति समर्पण रत्ती भर भी कम नहीं हुआ। वे जब हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर उतरती थीं, तो उनकी बुलंद आवाज, अद्भुत ऊर्जा और संवाद अदायगी दर्शकों को सम्मोहित कर लेती थी। धीरे-धीरे उनके विरोधी भी उनकी इस अद्भुत प्रतिभा के प्रशंसक बन गए।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर छत्तीसगढ़ की माटी का गौरव
पांच दशकों से अधिक लंबे अपने करियर में तीजन बाई ने पंडवानी को केवल भारत तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने फ्रांस, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, जर्मनी और कई एशियाई देशों का दौरा किया। इन देशों के रंगमंच पर छत्तीसगढ़ की माटी की इस पारंपरिक गाथा को जीवंत कर उन्होंने भारतीय संस्कृति का परचम पूरी दुनिया में बुलंद किया।
अनोखी प्रस्तुति ने कला जगत में नए मानक स्थापित किए
मंच पर तीजन बाई का प्रदर्शन एक अनूठा था, गायन के दौरान उनका तंबूरा कभी अर्जुन का गांडीव धनुष बन जाता था, तो कभी भीम की शक्तिशाली गदा। अपनी इसी बहुआयामी अभिनय शैली के कारण वे दर्शकों को सीधे महाभारत के कुरुक्षेत्र में ले जाती थीं। उनकी अनोखी प्रस्तुति ने कला जगत में नए मानक स्थापित किए।

पीएम मोदी ने जताया शोक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मशहूर पंडवानी गायिका तीजन बाई के निधन पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने ट्वीट किया, "अपनी शानदार प्रस्तुतियों के ज़रिए उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला शैली को दुनिया भर में एक अनोखी पहचान दिलाई। उनका जाना कला और संस्कृति की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है।"
एक नजर में तीजन बाई का परिचय
- नाम: तीजन बाई
- जन्म: 24 अप्रैल 1956
- निधन: 5 जुलाई 2026
- जन्म स्थान: गनियारी
- पहचान: विश्व प्रसिद्ध पंडवानी लोकगायिका
- कला: छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पंडवानी गायन शैली, जिसमें महाभारत की कथाओं का गायन और अभिनय किया जाता है।
- गुरु: उमेद सिंह देशमुख
- विशेषता: 'कापालिक शैली' में ऊर्जावान प्रस्तुति, अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं के साथ पंडवानी को नई पहचान दिलाई।
- उपलब्धि: पंडवानी लोककला को दुनिया के कई देशों तक पहुंचाया।
- प्रमुख सम्मान:पद्म श्री (1988)
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
- पद्म भूषण (2003)
- नृत्य शिरोमणि सम्मान
- पद्म विभूषण (2019)














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