क्यों देश छोड़ रहे अमीर भारतीय ? मोदी सरकार बनने के बाद 35000 बने विदेशी नागरिक, जानिए डेस्टिनेशन
Rich Indian Leaving Country: नई दिल्ली। भारतीय लोग पैसा कमाने के लिए लंबे समय से दूसरे देश में बड़ी संख्या में जाते रहे हैं लेकिन इधर देखा जा रहा है कि इस लिस्ट में अब ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जिन्होंने भारत में रहकर ही अथाह संपत्ति इकठ्ठा की और फिर दूसरे देशों की तरफ निकल लिए। यहां तक कि कोरोना काल में जब भारत से विदेश यात्राएं बंद थी उस दौरान भी अमीर भारतीय विदेशी नागरिकता के लिए निवेश वाली योजना के बारे में सबसे अधिक पूछताछ करने में पहले नंबर पर थे।

क्यों हो रहा अमीरों का मोहभंग ?
दुनिया में कई देश ऐसे हैं जो अमीर लोगों को इस शर्त पर नागरिकता देते हैं कि वे वहां पर भारी निवेश करेंगे। हेनली एंड पार्टनर्स ग्लोबल एजेंसी हैं जो इस तरह से नागरिकता की ख्वाहिश रखने वाले लोगों की मदद करती है। इस एजेंसी के मुताबिक 2019 की तुलना में भारतीयों ने इस बारे में काफी पूछताछ की। यही वजह है कि अमीरों के विदेश में बसने के मामले में भारत अब चीन और फ्रांस जैसे देशों से आगे निकल गया है।
अब ये भारतीय देश छोड़कर विदेश क्यों जाना चाहते हैं इस बारे में तो वही बता सकते हैं लेकिन इसने भारत सरकार के माथे पर बल जरूर ला दिया है। खास तौर पर जब प्रधानमंत्री ये दावा करते हों कि भारतीय पासपोर्ट का वजन बढ़ा है। जब पासपोर्ट का वजन बढ़ा है तो इसे रखने वाले अमीर लोग क्यों इससे छुटकारा पाना चाह रहे हैं?
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जाने से क्या होगा असर ?
भारत सरकार के केंद्रीय निकाय सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (सीबीडीटी) की समिति इस बात की जांच कर रही है कि आखिर किस वजह से देश के धनी लोग विदेशों का रुख कर रहे हैं ? इसके साथ ही ये कमेटी इस बात का भी पता लगाएगी कि इनके जाने से देश में आने वाले टैक्स पर क्या असर पड़ेगा। सीबीडीटी को आशंका है कि देश के अमीर लोग टैक्स बचाने के चक्कर में विदेशों में बस जा रहे हैं।
इन अमीरों के देश छोड़ने से एक तरफ तो देश को भारी कर का नुकसान होता है वहीं ये भारतीय खुद को दूसरे देश का नागरिक बताए रख सकते हैं और भारत में अपने निजी संबंधों की बदौलत कारोबार को बढ़ाते रह सकते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण 2018 में भारत की नागरिकता छोड़ने वाले हीरानंदानी ग्रुप के सुरेंद्र हीरानंदानी का नाम है। हीरानंदानी ने भारत की नागरिकता छोड़कर साइप्रस का पासपोर्ट अपना लिया था। लेकिन खास बात वह थी जो नागरिकता छोड़ने के बाद उन्होंने कही थी। उन्होंने एक तो इसकी वजह यह बताई की उन्हें वर्क वीजा मिलने में मुश्किल आती है। वर्क वीजा की बात वो हीरानंदानी कर रहे थे जिनका नाम फोर्ब्स की अमीर भारतीयों की सूची में है। दूसरी बात उन्होंने कही कि उनका बेटा भारत का नागरिक बना रहेगा और बिजनेस देखता रहेगा।

6 सालों में 35 हजार भारतीयों ने छोड़ा देश
लेकिन हीरानंदानी बस एक नाम है। पिछले कुछ सालों में टैक्स हैवेन कहे जाने वाले यूरोप और कैरिबियाई देशों में कई भारतीय जाकर बस चुके हैं। इन देशों में टैक्स को लेकर किसी तरह के कड़े नियम नहीं है यही वजह है कि इन्हें टैक्स हैवेन कहा जाता है। निवेश व वित्तीय मामलों से जुड़ी फर्म मॉर्गन के मुताबिक 2014 से 2019 के बीच 35 हजार अमीर भारतीय देश छोड़ चुके हैं। 2014 में 6000, 2015 में 4000, 2016 में 6000, 2017 में 7000 और 2018 में 5000 भारतीयों ने देश छोड़ा था। वहीं 2019 में इसमें 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 7000 अमीर भारतीयों ने देश छोड़ा।
वहीं एजेंसी हेनली एंड पार्टर्नर्स के मुताबिक 2020 में जब कोरोना महामारी से भारत त्रस्त था उस समय भी 2019 के मुकाबले 63 प्रतिशत अधिक अमीर भारतीयों ने इस बारे में जानकारी मांगी थी। खास बात यह है कि इस योजना के जरिए नागरिकता पाने के लिए इन अमीरों को खूब पैसा भी खर्च करना पड़ता है।

ये देश हैं अमीरों की प्रमुख पसंद
भारत से अमीर जिन देशों में जाना चाहते हैं उनमें आस्ट्रेलिया, कनाडा, पुर्तगाल, आस्ट्रिया, तुर्की प्रमुख हैं। इसके साथ ही घोटालेबाजों के लिए एंटिगुआ, माल्टा, साइप्रस, ग्रेनाडा और डोमिनिका जैसे देश टॉप डेस्टिनेशन बने हुए हैं। पीएनबी घोटाले में शामिल और भारत से फरार चल रहा मेहुल चौकसी इसी एंटिगुआ-बरबुडा का नागरिकता ले रखी है। लेकिन इन देशों में नागरिकता के लिए पैसा बहुत खर्च करना पड़ता है यही वजह है कि भारतीयों का रुख कैरेबियाई देशों की तरफ भी खूब है। इन देशों में कम पैसे में नागरिकता के साथ ही यहां के पासपोर्ट पर लगभग 120 देशों में बिना वीजा के नागरिकता मिल जाती है। यहां सरकारी फंड या फिर रियल एस्टेट में निवेश पर ही नागरिकता मिल जाती है। यही वजह है कि भारतीयों ने यहां पर भी खूब नागरिकता ली है।

पाकिस्तान का नाम भी इस सूची में तीसरे नंबर पर
निवेश के जरिए विदेशी नागरिकता पाने की लिस्ट में पिछले साल अमेरिका भी काफी आगे रहा। कोविड और राजनीतिक उथल-पुथल भरे साल में अमेरिका में भी विदेशी नागरिकता के लिए काफी उत्सुकता देखी गई जिसके चलते अमेरिका दूसरे नंबर पर पहुंच गया। पाकिस्तान में भी विदेशों में नागरिकता लेने के लिए बहुत अधिक पूछताछ की गई हेनली इंडेक्स ने इसे तीसरे नंबर पर रखा है। अमेरिका के बारे में खास बात यह है कि 2019 में यह विदेशी नागरिकता की जानकारी लेने वाली की सूची में छठे नंबर पर था।












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