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राणा सांगा कौन थे? महाराणा प्रताप से क्‍या था संबंध? उस सांसद की कुंडली भी जान लो जो उनको गद्दार बता रहा

Rana Sanga MP Ramji Lal Suman News: समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने राज्‍यसभा में राणा सांगा को गद्दार बताकर नई सियासी बहस छेड़ दी, जिस पर उत्‍तर प्रदेश से लेकर राजस्‍थान में भी बवाल मचा हुआ है। यूपी के आगरा स्थित रामजी लाल सुमन के घर पर करणी सेना ने हमला बोल दिया। वहीं, हिंदू महासभा की महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष मीरा राठौर ने रामजी लाल सुमन की जीभ काटकर लाने पर 1 लाख का इनाम देने की घोषणा तक कर डाली।

सबसे पहले जानिए आखिर रामजी लाल सुमन ने राणा सांगा को लेकर क्‍या अपमानजनक बयान दिया। फिर बताते हैं आपको राणा सांगा का इतिहास, महाराणा प्रताप से राणा सांगा का संबंध और खुद रामजी लाल सुमन की पूरी कुंडली।

Rana Sanga

सांसद रामजी लाल सुमन बोले-'गद्दार राणा सांगा की औलाद हैं हिंदू'

शुक्रवार को राज्‍यसभा में सपा MP रामजी लाल सुमन ने कहा कि 'BJP वालों का तकिया कलाम हो गया कि मुसलमानों में बाबर का DNA है तो फिर हिंदुओं में किसका डीएनए है? बाबर को कौन लाया? बाबर को भारत में इब्राहीम लोदी को हराने के लिए राणा सांगा लाया था।

मुसलमान बाबर की औलाद हैं तो तुम (हिंदू) गद्दार राणा सांगा की औलाद हो। यह हिंदुस्तान में तय हो जाना चाहिए। बाबर की आलोचना करते हैं, राणा सांगा की नहीं। देश की आजादी की लड़ाई में इन्होंने अंग्रेजों की गुलामी की थी। हिंदुस्तान का मुसलमान बाबर को अपना आदर्श नहीं मानता है। वो मोहम्मद साहब और सूफी परंपरा को आदर्श मानता है।'

Rana Sanga relation with Maharana Pratap: महाराणा प्रताप के दादा थे राणा सांगा

12 अप्रैल 1482 को मालवा में जन्मे राणा सांगा (महाराणा संग्राम सिंह) रिश्‍ते में महाराणा प्रताप के दादा लगते थे। 30 जनवरी 1528 को आखिरी सांस लेने वाले राणा सांगा राजस्‍थान के मेवाड़ के एक महान शासक और राजपूतों के महान योद्धा थे।

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राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे राणा सांगा उर्फ संग्राम सिंह। वे सिसोदिया राजपूत वंश के सदस्य थे। उनके शासनकाल ने राजपूताना के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। अपने साम्राज्य को विस्तार करने के लिए कड़ी मेहनत की और राजपूतों को एकजुट किया।

राणा सांगा का प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

  • राजस्‍थान के मेवाड़ के शासक महाराणा रायमल के तीन बेटे कुंवर पृथ्वीराज, जयमल और राणा सांगा।
  • पिता की जिंदा रहते ही तीनों भाइयों में उत्‍तराधिकारी के लिए जंग हुई, जिसमें राणा सांगा की एक आंख फूट गई थी।
  • बाद में पिता राणा रायमल बेटे राणा सांगा को उत्‍तराधिकारी घोषित किया। 1508 ईस्‍वी में राणा सांगा ने महज 27 साल की उम्र में मेवाड़ की गद्दी संभाली।
  • अपने भाईयों से खतरा था। अपनी जान की सलामती के लिए वे अजमेर भाग गए। 1509 में राणा सांगा ने अजमेर में राजपूत सरदारों की मदद से मेवाड़ का शासन प्राप्त किया।
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राणा सांगा का शासन और साम्राज्य विस्तार

राणा सांगा का शासनकाल 1509 से 1528 तक था। उन्होंने अपनी वीरता और रणनीति से मेवाड़ साम्राज्य को मजबूत किया और इसे और अधिक विस्तृत किया।

राणा सांगा का साम्राज्य पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में बयाना और ग्वालियर तक फैला था। उन्होंने दक्षिण में मालवा और नर्मदा नदी तक अपना साम्राज्य विस्तार किया।

राणा सांगा का सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने उत्तर भारत के विभिन्न राजपूत राज्यों को एक छत्र के नीचे लाकर एक बड़ा और शक्तिशाली राजपूत संघ बनाया। उन्होंने गुजरात, मालवा, और दिल्ली सुलतानत के खिलाफ युद्ध लड़ा और इन राज्यों को पराजित किया।

राणा सांगा के प्रमुख युद्ध और लड़ाइयाँ

राणा सांगा का जीवन अनेक युद्धों और संघर्षों से भरा था। इनमें से कुछ प्रमुख युद्धों ने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

गागरोण की लड़ाई (1519): यह लड़ाई राणा सांगा और गुजरात-मालवा की संयुक्त सेना के बीच लड़ी गई थी। राणा सांगा की सेना ने इस युद्ध में विजय प्राप्त की और मालवा के अधिकांश हिस्सों पर कब्जा कर लिया। यह उनकी सैन्य क्षमता और रणनीतिक कौशल का एक प्रमुख उदाहरण था।

खानवा की लड़ाई (1527): खानवा की लड़ाई राणा सांगा और बाबर के बीच लड़ी गई थी। इस युद्ध में राणा सांगा की सेना के पास अधिक संख्या में सैनिक थे, लेकिन बाबर की तोपों और घातक हथियारों के कारण राजपूत सेना को हार का सामना करना पड़ा। राणा सांगा खुद इस युद्ध में घायल हुए थे और उनकी स्थिति खराब हो गई थी। बाबर ने इस युद्ध में विजय प्राप्त की, लेकिन राणा सांगा की वीरता और साहस ने उन्हें एक महान योद्धा के रूप में स्थापित किया।

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बयाना की लड़ाई: बयाना की लड़ाई में राणा सांगा ने बाबर की सेना को परास्त किया और बयाना किला जीत लिया। यह उनकी सैन्य रणनीति का एक प्रमुख उदाहरण था। इस युद्ध ने राणा सांगा की ख्याति को और बढ़ाया।

लोदी के खिलाफ युद्ध: राणा सांगा ने दिल्ली सुलतान इब्राहीम लोदी के खिलाफ कई युद्ध लड़े और उन्हें हराया। खतोली और बाड़ी की लड़ाई में इब्राहीम लोदी की सेना को बुरी तरह पराजित किया। इन युद्धों में राणा सांगा की रणनीतिक और सैन्य क्षमता का लोहा माना गया।

राणा सांगा के शरीर पर थे 80 घाव

राणा सांगा की वीरता और साहस की कोई तुलना नहीं की जा सकती। उन्होंने अपने जीवन में लगभग 100 युद्धों में भाग लिया। इन युद्धों में वे कई बार घायल हुए। उन्होंने अपनी एक आँख, एक हाथ, और एक पैर खो दिए थे, लेकिन उन्होंने कभी अपनी वीरता और संघर्ष की भावना को कम नहीं होने दिया। उनका शरीर लगभग 80 घावों से भरा हुआ था, इसीलिए उन्हें "सैनिकों का भग्नावशेष" कहा जाता था।

एक महत्वपूर्ण युद्ध में, उन्होंने मुगलों के खिलाफ अद्भुत साहस दिखाया। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि राणा सांगा का साम्राज्य बहुत शक्तिशाली था और उनके पास एक लाख घोड़े और 500 युद्ध हाथी थे। उनकी सेना में 7 राजाओं, 9 रावों और 104 छोटे सरदारों का समर्थन था।

राणा सांगा की मृत्यु 30 जनवरी 1528 को हुई

1527 में खानवा की लड़ाई के बाद राणा सांगा की स्थिति गंभीर हो गई थी। उनकी शारीरिक स्थिति खराब हो गई और वे अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाए। 30 जनवरी 1528 को उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु से पहले उन्होंने मेवाड़ राज्य की सुरक्षा और उन्नति के लिए जो कार्य किए, वे भारतीय इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।

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Who is Ramji Lal Suman MP SP: कौन हैं रामजी लाल सुमन, जिन्‍होंने राणा सांगा को बताया गद्दार

राणा सांगा को गद्दार बताने वाले रामजी लाल सुमन समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। रामजी लाल सुमन का जन्‍म 25 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के सादाबाद क्षेत्र के बहरदोई गांव में हुआ।

रामजी लाल सुमन और मुलायम सिंह यादव के बीच गहरी राजनीतिक और व्यक्तिगत करीबी रही है। सुमन को मुलायम का विश्वासपात्र माना जाता है।

रामजी लाल सुमन मात्र 26 साल की उम्र में जनता पार्टी के टिकट पर फिरोजाबाद लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। 1989 में जनता दल से फिरोजाबाद सीट जीती।

1991 में चंद्रशेखर सरकार में श्रम, कल्याण, महिला कल्याण और बाल विकास जैसे मंत्रालयों के केंद्रीय राज्य मंत्री रहे। 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन के बाद मुलायम सिंह यादव के करीबी सहयोगी बने और 1996 से लगातार सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद पर हैं।

1999 और 2004 में सपा के टिकट पर फिरोजाबाद से लोकसभा चुनाव जीते। 2014 में हाथरस सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। 2024 में सपा ने उन्हें राज्यसभा के लिए प्रत्याशी बनाया। वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं।

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