Rahul Gandhi के मोदी सरकार को घेरने की प्लानिंग में थरूर-तिवारी लगा रहे सेंध, बागियों के सामने कांग्रेस बेबस!
Rahul Gandhi Monsoon Session: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत पर लगाए 25% टैरिफ को लेकर कांग्रेस मोदी सरकार पर हमलावर है। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत कई और नेता लगातार मोदी सरकार पर हमलावर हैं। राहुल गांधी ने तो ट्रंप के बयान का हवाला देते हुए भारत की अर्थव्यवस्था को ही डेड इकोनॉमी कह दिया है। हालांकि, कांग्रेस की सरकार को घेरने की आक्रामक रणनीति में सेंध लगाने का काम भी पार्टी के ही कुछ और दिग्गज नेता कर रहे हैं।
पार्टी में लगातार साइडलाइन किए जा रहे शशि थरूर, मनीष तिवारी और राजीव शुक्ला जैसे सांसद राहुल गांधी के बयान से अलग बयान देते नजर आ रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर सांसदों या नेताओं ने सार्वजनिक बयानबाजी की हो। कांग्रेस में पिछले 11 सालों में ऐसा कई बार हो चुका और इस सवाल का आज तक जवाब नहीं मिल सका है कि आखिर हाईकमान अपने बागियों के सामने बेबस क्यों है?

Rahul Gandhi के डेड इकोनॉमी बयान पर घमासान
दरअसल राहुल गांधी ने कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था एक वक्त में दुनिया की सबसे मजबूती इकोनॉमी थी, लेकिन पिछले 11 साल की नीतियों की वजह से यह डेड इकोनॉमी बन गई है। शशि थरूर और मनीष तिवारी जैसे कांग्रेस नेताओं ने इस बयान के उलट कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और यह बिल्कुल भी डेड नहीं है। राजीव शुक्ला ने भी इससे मिलता जुलता बयान दिया है। अब सवाल वही है कि आखिर राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के नेताओं को संभाल क्यों नहीं पा रहे हैं और उन तक अपनी बात क्यों नहीं पहुंचा रहे?
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पार्टी नेताओं और हाईकमान के बीच संवाद का अभाव?
कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पार्टी के अंदर कम्युनिकेशन का तरीका प्रभावी नहीं है। हाईकमान की पार्टी के नेताओं से बात बहुत कम होती है और पार्टी लाइन के बारे में भी सीधे ऊपर से कोई आदेश नहीं आता है। हर संवाद कई चैनल से होकर गुजरता है जिसकी वजह से निचले स्तर तक बातें संदर्भ के साथ नहीं पहुंचती हैं। इसके अलावा, पार्टी के कई नेता इस बात से भी नाराज हैं कि उनके कद और अनुभव के मुताबिक उन्हें तरजीह नहीं मिल रही है। शशि थरूर और मनीष तिवारी इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं।
कांग्रेस के लिए बीजेपी से निपटने से ज्यादा मु्श्किल अपने सांसदों को एकजुट रखना
कांग्रेस एक ओर दोनों सदन में जोरदार हमला करना चाहती है। विपक्षी पार्टियों से सदन के दोनों सदनों में कम से कम इस मामले में कांग्रेस को पूरा सहयोग मिल रहा है। उसकी मुख्य चुनौती अपने नाराज और बागी नेताओं को संभालना है।
मानसून सेशन के खत्म होते ही बिहार में चुनाव की तैयारियां बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएंगी। पार्टी को इस चुनाव में विरोध के लिए कुछ अहम मुद्दों पर एकजुट दिखना होगा, लेकिन जिस तरह की सिर फुटव्वल होती दिख रही है उससे ऐसा होना मुश्किल लगता है। कांग्रेस के अंदरुनी कलह का असर हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की विधानसभा चुनाव में देखने को मिला है।
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