गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का राष्ट्र के नाम संदेश
नयी दिल्ली। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित किया। अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति ने राजनीति, समाज, महिला सुरक्षा, स्वच्छता, रक्षा हर मुद्दे पर बात कही। संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि ‘पिछला साल खास रहा, क्योंकि 30 साल बाद देश की जनता ने एक पूर्ण बहुमत की सरकार चुनीं।

राष्ट्रपति का संबोधन
प्यारे देशवासियों,
66वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर मैं भारत और विदेशों में बसे सभी भारतीयों को हार्दिक बधाई देता हूं। मैं हमारी सशस्त्र सेनाओं, अर्धसैनिक बलों और आंतरिक सुरक्षा बलों के सदस्यों को अपनी विशेष बधाई देता हूं। छब्बीस जनवरी का दिन हमारे देश की स्मृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि यही वह दिन है जब आधुनिक भारत का जन्म हुआ था। महात्मा गांधी के नैतिक और राजनीतिक नेतृत्व के अधीन राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेजी राज से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हुए दिसंबर, 1929 में पूर्ण स्वराज का संकल्प पारित किया था। 26 जनवरी, 1930 को, गांधीजी ने पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस के रूप में राष्ट्रव्यापी समारोहों का आयोजन किया था। उसी दिन से, देश तब तक हर साल इस दिन स्वतंत्रता संघर्ष को जारी रखने की शपथ लेता रहा जब तक हमने इसे प्राप्त नहीं कर लिया। इसके ठीक 20 साल बाद, 26 जनवरी 1950 को हमने आधुनिकता के अपने घोषणापत्र, संविधान को अंगीकार किया।
यह विडंबना थी कि गांधीजी दो साल पूर्व शहीद हो चुके थे, परंतु आधुनिक विश्व के सामने भारत को आदर्श बनाने वाले संविधान के ढांचे की रचना उनके ही दर्शन पर की गई थी। इसका सार चार सिद्धांतों पर आधारित है जिनमें लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और गरीबी के जाल में फंसे लोगों का आर्थिक उत्थान। इन्हें संवैधानिक दायित्व बना दिया गया था। देश के शासकों के लिए गांधीजी का मंत्र सरल और शक्तिशाली था, ‘जब भी आप किसी शंका में हों। तब उस सबसे गरीब और सबसे निर्बल व्यक्ति का चेहरा याद करें जिसे आपने देखा हो और फिर खुद से पूछें कि क्या ऐसे भूखे और आध्यात्मिक क्षुधा से पीड़ित लाखों लोगों के लिए स्वराज आएगा।' समावेशी विकास के माध्यम से गरीबी मिटाने का हमारा संकल्प उस दिशा में एक कदम होना चाहिए।
प्यारे देशवासियों,
पिछला साल कई तरह से खास रहा है। खासतौर पर इसलिए कि तीन दशकों के बाद जनता ने स्थाई सरकार के लिए, एक अकेले दल को बहुमत देते हुए, सत्ता में लाने के लिए मतदान किया है और इस प्रक्रिया में देश के शासन को गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों से मुक्त किया है। इन चुनावों के परिणामों ने चुनी हुई सरकार को, नीतियों के निर्माण और इन नीतियों के क्रियान्वयन के लिए कानून बनाकर जनता के प्रति अपनी वचनबद्धता को पूरा करने का जनादेश दिया है। मतदाता ने अपना कार्य पूरा कर दिया है, अब यह चुने हुए लोगों का दायित्व है कि वह इस भरोसे का सम्मान करे। यह मत एक स्वच्छ, कुशल, कारगर, लैंगिक संवेदनायुक्त, पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक अनुकूल शासन के लिए था।
प्यारे देशवासियों,
एक सक्रिय विधायिका के बिना शासन संभव नहीं है। विधायिका जनता की इच्छा को प्रतिबिंबित करती है, यह ऐसा मंच है जहां शिष्टतापूर्ण संवाद का उपयोग करते हुए, प्रगतिशील कानून के द्वारा जनता की आकांक्षाओं को साकार करने के लिए सुपुर्दगी-तंत्र की रचना की जानी चाहिए। इसके लिए भागीदारों के बीच मतभेदों को दूर करने और बनाए जाने वाले कानूनों पर आम सहमति लाने की जरूरत होती है। बिना चर्चा कानून बनाने से संसद की कानून निर्माण की भूमिका को धक्का पहुंचता है। इससे, जनता द्वारा व्यक्त विश्वास टूटता है। यह न तो लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही इन कानूनों से संबंधित नीतियों के लिए अच्छा है।
प्यारे देशवासियों,
पंडित नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुब्रह्मण्य भारती और अन्य बहुत से लोगों के तरीके और नजरिए भले ही अलग-अलग रहे हों, परंतु उन सभी ने केवल राष्ट्र भक्ति की ही भाषा बोली। हम अपनी आजादी के लिए राष्ट्रीयता के इन महान योद्धाओं के ऋणी हैं। हम उन वीरों को भी नमन करते हैं जिन्होंने भारत माता की आजादी के लिए अपनी कुर्बानी दी। परंतु मुझे यह देखकर दु:ख होता है कि जब महिलाओं की हिफाजत की बात होती है तब उसके अपने बच्चों द्वारा ही भारत माता का सम्मान नहीं किया जाता। दुष्कर्म, हत्या, सड़कों पर छेड़छाड़, अपहरण और दहेज हत्याओं जैसे अत्याचारों ने महिलाओं के मन में अपने घरों में भी भय पैदा कर दिया है। रवीन्द्रनाथ टैगोर महिलाओं को न केवल घर में प्रकाश करने वाली देवियां मानते थे वरन् उन्हें स्वयं आत्मा का प्रकाश मानते थे। माता-पिता, शिक्षकों और नेताओं के रूप में, हमसे कहां चूक हो गई है कि हमारे बच्चे सभ्य व्यवहार और महिलाओं के प्रति सम्मान के सिद्धांतों को भूल गए हैं। हमने बहुत से कानून बनाए हैं, परंतु जैसा कि बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक बार कहा था, ‘न्याय का उद्देश्य तब तक पूर्ण नहीं होगा जब तक कि वे लोग भी उतने ही क्षुब्ध नहीं महसूस करते जो भुक्तभोगी नहीं हैं जितना कि वे, जो भुक्तभोगी हैं।' हर एक भारतीय को किसी भी प्रकार की हिंसा से महिलाओं की हिफाजत करने की शपथ लेनी चाहिए। केवल ऐसा ही देश वैश्विक शक्ति बन सकता है जो अपनी महिलाओं का सम्मान करे और उन्हें सशक्त बनाए।
प्यारे देशवासियों,
भारतीय संविधान लोकतंत्र की पवित्र पुस्तक है। यह ऐसे भारत के सामाजिक-आर्थिक बदलाव का पथप्रदर्शक है, जिसने प्राचीन काल से ही बहुलता का सम्मान किया है, सहनशीलता का पक्ष लिया है और विभिन्न समुदायों के बीच सद्भाव को बढ़ावा दिया है। परंतु इन मूल्यों की हिफाजत अत्यधिक सावधानी और मुस्तैदी से करने की जरूरत है। लोकतंत्र में निहित स्वतंत्रता कभी-कभी उन्मादपूर्ण प्रतिस्पर्धा के रूप में एक ऐसा नया कष्टप्रद परिणाम सामने ले आती है जो हमारी परंपरागत प्रकृति के विरुद्ध है। वाणी की हिंसा चोट पहुंचाती है और लोगों के दिलों को घायल करती है। गांधीजी ने कहा था कि धर्म एकता की ताकत है, हम इसे टकराव का कारण नहीं बना सकते।
प्यारे देशवासियों,
भारत की सौम्य शक्ति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है। परंतु इस तरह के अंतरराष्ट्रीय परिवेश में, जहां बहुत से देश धर्म आधारित हिंसा के दलदल में फंसते जा रहे हैं, भारत की सौम्य शक्ति का सबसे शक्तिशाली उदाहरण धर्म और राज-व्यवस्था के बीच संबंधों की हमारी परिभाषा में निहित है। हमने सदैव धार्मिक समानता पर अपना भरोसा जताया है, जहां हर धर्म कानून के सामने बराबर है और प्रत्येक संस्कृति दूसरे में मिलकर एक सकारात्मक गतिशीलता की रचना करती है। भारत की प्रज्ञा हमें सिखाती है: एकता ताकत है, प्रभुता कमजोरी है।
प्यारे देशवासियों,
विभिन्न देशों के बीच टकराव ने सीमाओं को खूनी हदों में बदल दिया है और आतंकवाद को बुराई का उद्योग बना दिया है। आतंकवाद और हिंसा हमारी सीमाओं से घुसपैठ कर रहे हैं। यद्यपि शांति, अहिंसा और अच्छे पड़ोसी की भावना हमारी विदेश नीति के बुनियादी तत्त्व होने चाहिए, परंतु हम ऐसे शत्रुओं की ओर से गाफिल रहने का जोखिम नहीं उठा सकते जो समृद्ध और समतापूर्ण भारत की ओर हमारी प्रगति में बाधा पहुंचाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। हमारे पास, अपनी जनता के विरुद्ध लड़ाई के सूत्रधारों को हराने के लिए ताकत, विश्वास और दृढ़ निश्चय मौजूद है। सीमारेखा पर युद्ध विराम का बार-बार उल्लंघन और आतंकवादी आक्रमणों का, कारगर कूटनीति और अभेद्य सुरक्षा प्रणाली के माध्यम से समेकित जवाब दिया जाना चाहिए। विश्व को आतंकवाद के इस अभिशाप से लड़ने में भारत का साथ देना चाहिए।
प्यारे देशवासियों,
आर्थिक प्रगति लोकतंत्र की परीक्षा भी है। साल 2015 उम्मीदों का साल है। आर्थिक संकेतक बहुत आशाजनक हैं। बाह्य सेक्टर की मजबूती, राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की दिशा में प्रगति, कीमतों के स्तर में कमी, विनिर्माण क्षेत्र में वापसी के शुरुआती संकेत और पिछले साल कृषि उत्पादन में कीर्तिमान, हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत हैं। 2014-15 की पहली दोनों तिमाहियों में, पांच प्रतिशत से अधिक की विकास दर की प्राप्ति, 7-8 प्रतिशत की उच्च विकास दर की दिशा में शुरुआती बदलाव के स्वस्थ संकेत हैं।
किसी भी समाज की सफलता को, इसके मूल्यों, संस्थाओं और शासन के उपादानों के बने रहने और उनके मजबूत होने, दोनों से मापा जाता है। हमारी राष्ट्रीय गाथा को इसके अतीत के सिद्धांतों और आधुनिक उपलब्धियों से आकार मिला है और यह आज अपनी प्रच्छन्न शक्ति को जाग्रत कर भविष्य को अपना बनाने के लिए तत्पर है।
प्यारे देशवासियों,
हमारी राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा, भारतीय जनता के जीवन स्तर को तेजी से ऊंचा उठाना और ज्ञान, देशभक्ति, करुणा, ईमानदारी और कर्तव्य बोध से संपन्न पीढ़ियों को तैयार करना है। थॉमस जैफरसन ने कहा था, ‘सारी जनता को शिक्षित और सूचना संपन्न बनाएं।। केवल वे ही हमारी आजादी की रक्षा के लिए हमारा पक्का भरोसा हैं।' हमें अपनी शैक्षिक संस्थाओं में सर्वोच्च गुणवत्ता के लिए प्रयास करने चाहिए ताकि हम निकट भविष्य में 21वीं सदी के ज्ञान क्षेत्र के अग्रणियों में अपना स्थान बना सकें। मैं, विशेषकर, यह आग्रह करना चाहूंगा कि हम पुस्तकों और पढ़ने की संस्कृति पर विशेष जोर दें, जो ज्ञान को कक्षाओं से आगे ले जाती है और कल्पनाशीलता को तात्कालिकता और उपयोगितावाद के दबाव से आजाद करती है। हमें, आपस में एक दूसरे से जुड़ी हुई असंख्य विचारधाराओं से संपन्न सृजनात्मक देश बनना चाहिए। हमारे युवाओं को ऐसे ब्रह्मांड का, प्रौद्योगिकी और संचार में पारंगतता की दिशा में नेतृत्व करना चाहिए, जहां आकाश सीमारहित पुस्तकालय बन चुका है और आपकी हथेली में मौजूद कंप्यूटर में, महत्त्वपूर्ण अवसर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। 21वीं सदी भारत की मुट्ठी में है।
प्यारे देशवासियों,
यदि हम हानिकारक आदतों और सामाजिक बुराइयों से खुद को निरंतर स्वच्छ करने की अपनी योग्यता का उपयोग नहीं करते तो भविष्य हमारे सामने मौजूद होते हुए भी हमारी पकड़ से दूर हो। पिछली सदी के दौरान, इनमें से बहुत सी समाप्त हो चुकी हैं, कुछ निष्प्रभावी हो चुकी हैं परंतु बहुत सी अभी मौजूद हैं। हम, इस साल दक्षिण अफ्रीका से गांधीजी की वापसी की सदी मना रहे हैं। हम कभी भी महात्मा जी से सीख लेना नहीं छोड़ेंगे। 1915 में उन्होंने जो सबसे पहला कार्य किया था वह था अपनी आंखें खुली रखना और अपना मुंह बंद रखना। इस उदाहरण को अपनाना अच्छा होगा। जबकि हम, 1915 की बात कर रहे हैं, जो कि उचित ही है, तब हमें संभवत: 1901 में, जिस साल वह अपनी पहली छुट्टी में घर लौटे थे, गांधीजी ने जो कार्य किया था उस पर एक नजर डालनी चाहिए। कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन उस साल कलकत्ता में आयोजित हुआ था जो उस समय ब्रिटिश भारत की राजधानी था। वह एक बैठक के लिए रिपोन कॉलेज गए थे। उन्होंने देखा कि बैठक में भाग लेने वाले लोगों ने सारे स्थान को गंदा कर दिया है। यह देखकर स्तब्ध हुए गांधीजी ने सफाईकर्मी के आने का इंतजार नहीं किया। उन्होंने झाड़ू उठाई और उस स्थान की सफाई कर डाली। 1901 में उनके उदाहरण का किसी ने अनुकरण नहीं किया था। आइए, 114 साल बाद हम उनके उदाहरण का अनुकरण करें और एक महान पिता के सुयोग्य बच्चे बनें। जय हिंद!












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