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Pranab Mukherjee: जब तीन बार हाथ से निकला देश का प्रधानमंत्री बनने का मौका

Pranab Mukherjee : जब तीन बार हाथ से निकला देश का प्रधानमंत्री बनने का मौका

नई दिल्ली। भारत के पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी का 31 अगस्‍त यानी आज सोमवार को निधन हो गया। पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न डॉ. प्रणब मुखर्जी की हालत पिछले कई दिनों से नाजुक बनी हुई थी। जिस वजह से उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था। प्रणब मुखर्जी के निधन से देश भर में शोक की लहर है। प्रणब मुखर्जी राजनीति के वो सितारें थे जिनका नाम विरोधी नेता भी बड़े ही सम्‍मान से लेते थे। अपनी काबलियत के दम पर प्रणब मुखर्जी ने एक बाबू की नौकरी से करियर की शुरुआत की फिर प्रोफेसर और बाद में दमदार राजनीतिक सफर तय करते हुए राष्‍ट्रपति बने।

Pranab Mukherjee
प्रणब मुखर्जी के राजनीति सफर में तीन बार ऐसे मौंके आए जब सबको लगा कि प्रणब मुखर्जी ही देश के प्रधानमंत्री बनेंगे लेकिन कुछ कारणों से प्रणब मुखर्जी पीएम की कुर्सी पर बैठने से चूक गए। प्रणब मुखर्जी के लिए तीन साल पहले मनमोहन ने कहा था- जब मैं प्रधानमंत्री बना, तब प्रणब मुखर्जी इस पद के लिए ज्यादा काबिल थे, लेकिन मैं कर ही क्या सकता था? कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी ने मुझे चुना था। जानिए उन तीनों मौकों के बारे में जब प्रणव मुखर्जी पीएम की कुर्सी पर विराजमान हो सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ?

पहली बार इंदिरा गांधी की मौत के बाद उनके करीबी प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री नहीं बन सके

पहली बार इंदिरा गांधी की मौत के बाद उनके करीबी प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री नहीं बन सके

इंदिरा केअनुरोध पर प्रणब मुखर्जी 1969 में पहली बार राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचे थे। इंदिरा गांधी राजनीतिक मुद्दों पर प्रणब मुखर्जी की समझ का लोहा मानती थी यही कारण था कि प्रणब मुखर्जी को कैबिनेट में नंबर दो का दर्जा दिया था। कैबिनेट में दूसरे दर्जे का कद होना इससलिए महत्‍वपूर्ण था क्योंकि इसी कैबिनेट में आर. वेंकटरामन, पीवीनरसिम्हाराव, ज्ञानी जैल सिंह, प्रकाश चंद्र सेठी और नारायण दत्त तिवारी जैसे कद्दावर नेता भी थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रणब का नाम भी चर्चा में था, लेकिन पार्टी ने राजीव गांधी को चुना। दिसंबर 1984 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 414 सीटों पर जीत हासिल की थी। कैबिनेट में प्रणब को जगह न मिलने के बाद में प्रणव ने दुखी होकर लिखा था जब मुझे पता लगा कि मैं कैबिनेट का हिस्सा नहीं हूं तो दंग रह गया। लेकिन, फिर भी मैंने खुद को संभाला और अपनी पत्‍नी के साथ टीवी पर शपथ ग्रहण समारोह देखा। इसी के दो वर्षो बाद 1986 में प्रणब मुखर्जी ने बंगाल में राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (आरएससी) का गठन किया। तीन साल बाद राजीव गांधी के साथ समझौता हुआ और आरएससी पार्टी कांग्रेस में विलय हो गई।

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    दूसरी बार भी प्रधानमंत्री बनने का मौका प्रणव मुखर्जी के हाथ से निकला

    दूसरी बार भी प्रधानमंत्री बनने का मौका प्रणव मुखर्जी के हाथ से निकला

    जब 1991 में राजीव गांधी की हत्या हो गई थी तब चुनाव के बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई। तब सभी ये ही मान रहे थे कि प्रधानमंत्री के मजबूत दावेंदारों में प्रणण्‍ मुखर्जी ही है दूसरा कोई नहीं है, लेकिन इस बार भी ये मौका प्रणब मुखर्जी चूक गए। इस बार नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया गया। प्रणब मुखर्जी को पहले योजना आयोग का उपाध्यक्ष और फिर 1995 में विदेश मंत्री बनाया गया लेकिन दोबारा प्रणव मुखर्जी पीएम नहीं बन सके।

    तीसरी बार सोनिया गांधी ने प्रणब मुखर्जी के बजाय मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया

    तीसरी बार सोनिया गांधी ने प्रणब मुखर्जी के बजाय मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया

    वर्ष 2004 में जब कांग्रेस को 145 और भाजपा को 138 सीटें मिलीं तब कांग्रेस सरकार बनाने के लिए कांग्रेस क्षेत्रीय दलों पर निर्भर थी। सोनिया गांधी के पास खुद प्रधानमंत्री बनने का मौका था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इस समय प्रधानमंत्री बनने के सबसे मजबूत दावेदार के तौर पर प्रणब मुखर्जी का नाम सुर्खियों में था, लेकिन इस बार भी उनको निराशा ही हाथ लगी। काग्रेंस की सोनिया गांधी ने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए चयनित किया। प्रणब मुखर्जी के लिए तीन साल पहले मनमोहन सिंह ने कहा था- जब मैं प्रधानमंत्री बना, तब प्रणब मुखर्जी इस पद के लिए ज्यादा काबिल थे, लेकिन मैं कर ही क्या सकता था?

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