कश्मीर में ‘दुश्मन’मिले ताकि ना बने हिन्दू मुख्यमंत्री
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला)जम्मू कश्मीर में सरकार के गठन की कोशिशों के बीच यह संकेत और संदेश दिया जा रहा है कि वहां का मुख्यमंत्री किसी भी सूरत में हिन्दू ना हो। मुख्यमंत्री सिर्फ मुसलमान होना चाहिए।

पूछा जा सकता है आखिर यह आवाज किस बात का संकेत है?
पहली बार
जानकार मानते हैं कि राज्य में सरकार के ताजा गतिरोध के मूल में प्रमुख कारण यही है। भारत में इस तरह की मुखर आवाज पहली बार आई है।
क्यों ना हिन्दू सीएम
जानकार कहते हैं कि यह मांग है कि वहां कोई हिन्दू मुख्यमंत्री नहीं हो सकता बेहद गंभीर है। इसके खिलाफ देश को खड़ा होना होगा।
वरिष्ठ चिंतक संजय अग्रवाल कहते हैं कि जम्मू कश्मीर किसी एक मजहब की जागीर नहीं हो सकती। वह भारत की विविधता का ही अंग है। उसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। आश्चर्य की बात है कि वहां के निर्वाचित जन प्रतिनिधि ऐसी बातें बोल रहे हैं।
सेक्यूलरवाद का झंडा
इस बीच, संजय अग्रवाल यह भी पूछते हैं कि भारत में सेक्यूलरवाद का झंडा उठाए लोग कहां हैं? क्यों नहीं इस बात का विरोध कर रहे हैं ? क्या भाजपा विरोध के नाम पर ऐसे खतरनाक विचारों का समर्थन भी सेक्यूलरवाद है?
ताकि हिन्दू मुख्यमंत्री ना बन सके
वरिष्ठ लेखक अवधेश कुमार को हैरानी इस बात पर हो रही है कि अब नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी अपना स्वर बदला है। इस बात को समझा जा सकता है कि उसके विधायकों ने अपने जानी दुश्मन पीडीपी को समर्थन देने का ऐलान क्यों कर दिया है? सिर्फ इसलिए ताकि हिन्दू मुख्यमंत्री ना बन सके।
अलगाववादी सोच की ही राजनीतिक अभिव्यक्ति है?
इस आवाज के पीछे सोच क्या है? यह वस्तुतः अलगाववादी सोच की ही राजनीतिक अभिव्यक्ति है? अलगववादियों में से जो पाकिस्तान में विलय के समर्थक हैं उनका यही तर्क है कि मुस्लिम बहुल होेने के कारण इसे भारत का अंग नहीं होना चाहिए। इसलिए ये अलगाववादी आंदोलन करते हैं, लोगों को भड़काते हैं। आतंकवादी भी इसे इस्लामी राज्य मानकर पाकिस्तान का भाग बनाने के लिए संघर्ष करते हैं।
खोखली अपील
इससे यह भी पता चलता है जो लोग कश्मीरी पंडितों के वहां आने की अपील करते हैं वह दिल से किया गया अपील नहीं हो सकता।












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