Personal Data Protection Bill: विपक्ष के 7 सांसदों ने किन मुद्दों पर जताई असहमति ? जानिए
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विपक्षी सांसदों ने समिति की रिपोर्ट से जताई असहमति
लगभग सभी विपक्षी सांसदों ने पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल,2019 के उन प्रावधानों पर आपत्ति जताई है, जिससे केंद्र सरकार को अपने दायरे में किसी भी एजेंसी को इस कानून से बाहर रखने की छूट देता है। उन्होंने इस विधेयक और इसको लेकर तैयार संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट को लेकर कुछ और आपत्तियां भी जताई हैं। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने अपनी असहमति वाली टिप्पणी में इसकी धारा 35 पर सवाल उठाया है और कहा है कि 'किसी भी एजेंसी को पूरे अधिनियम से बाहर रखने के लिए केंद्र सरकार को निरंकुश अधिकार देता है।' उन्होंने धारा 12 (ए) (आई) को लेकर कहा है कि 'सहमति के प्रावधानों को लेकर सरकारों और सरकारी एजेंसियों के लिए कुछ अपवाद है....।' वहीं जानकारी के मुताबिक कांग्रेस के ही एक और सांसद मनीष तिवारी ने पूरे बिल का ही यह कहकर विरोध किया है कि इसकी डिजाइन में ही जन्मजात खामी है।

विधेयक के प्रावधानों पर तरह-तरह की आपत्ति
कांग्रेस के एक और सांसद गौरव गोगोई की नजर में भी समिति में दो साल की चर्चा के बावजूद इस विधेयक से जुड़े कुछ दोष दूर नहीं हो पाए हैं। जानकारी के मुताबिक उन्होंने भी धारा 12 और 35 के तहत सरकार और सरकारी एजेंसियों को मिली छूट पर सवाल उठाए हैं। उन्हें यह भी लगता है कि सर्विलांस से होने वाले नुकसान पर पूरा ध्यान नहीं दिया गया है और ना ही मॉडर्न सर्विलांस नेटवर्क स्थापित करने की कोशिश की गई है। यही नहीं उन्हें लगता है कि इसमें संसदीय निरीक्षण की कमी है और यह जुर्माना बढ़ाने में भी नाकाम है। बताया जाता है कि पार्टी सांसद विवेक तनखा ने भी असहमति नोट दिया है। अपने एक ट्वीट में जयराम रमेश ने लिखा है, 'सरकारों और सरकारी एजेंसियों को एक अलग विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के रूप में माना गया है, जिनका कार्य और गतिविधियां हमेशा सार्वजनिक हित में होती हैं और व्यक्तिगत गोपनीयता संबंधी विचार गौण हैं।'

टीएमसी सांसद निजता के अधिकार को लेकर चिंतित
टीएमसी सांसदों डेरेक ओ ब्रायन और महुआ मोइत्रा ने पार्टी की ओर से साझा असमति टिप्पणी लगाई है और जानकारी के अनुसार उनको लगता है कि विधेयक में डाटा प्रिंसिपल के तहत निजता के अधिकार की पर्याप्त सुरक्षा के उपायों का अभाव है। दूसरे शब्दों में इसमें व्यक्ति, कंपनी और कोई भी संस्था जिसकी सूचना जुटाई गई है, उनको लेकर पर्याप्त सुरक्षा के उपाय नहीं किए जा सके हैं। सातवें सांसद जिन्होंने इस विधेयक को लेकर अपनी ओर से असमति जताई है, वे हैं बीजेडी के अमर पटनायक।

संसद के शीतकालीन सत्र में पेश होगी रिपोर्ट
ऐसा माना जा रहा है कि मनीष तिवारी ने तर्क दिया है कि यह विधेयक दो समानांतर दुनिया बनाएगा - एक निजी क्षेत्र के लिए जहां यह पूरी कठोरता के साथ लागू होगा। दूसरी तरफ सरकार के लिए जहां उसे कई तरह की छूट मिलेगी और उसके बच निकलने और भागने के भी प्रावधान हैं। जानकारी के मुताबिक उन्होंने यह भी कहा है कि विभिन्न श्रेणी के कंटेंट या डाटा के लिए बच्चों की परिभाषा अलग होनी चाहिए। टीएमसी सांसदों ने समिति के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाया है कि इसने विचार-विमर्श के लिए सबको पर्याप्त समय और अवसर नहीं दिया गया है। माना जा रहा है कि उन्होंने नन-पर्सनल डटा को विधेयक के दायरे में शामिल करने की रिपोर्ट पर भी आपत्ति जताई है। यह रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जाएगा।












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