Omicron वेरिएंट - कोरोना वायरस की तीसरी लहर के लिए भारत कितना तैयार है?

सभी वयस्क भारतीयों के 80% हिस्से को कम से कम एक कोविड वैक्सीन डोज़ दी जा चुकी है.
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सभी वयस्क भारतीयों के 80% हिस्से को कम से कम एक कोविड वैक्सीन डोज़ दी जा चुकी है.

भारत कोरोना की तीसरी लहर के लिए कितना तैयार है और इसके लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए, ये बता रहे हैं महामारी विशेषज्ञ चंद्रकांत लहरिया-

भारत के उत्तरी राज्यों की यात्रा कर रहे किसी भी शख़्स को यह सोचने के लिए माफ़ किया जा सकता है कि महामारी समाप्त हो चुकी है.

छोटे शहरों में कुछ ही लोग मास्क पहन रहे हैं और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं और कोविड-19 का मुद्दा उनकी बातचीत में कम ही चर्चा का विषय होता है. यहां पर कोरोना वायरस को लेकर चेतावनी सिर्फ़ पोस्टर और बिलबोर्ड्स से मिल पाती है जहां पर राजनेताओं को वायरस से लड़ने के लिए शुक्रिया कहा गया है.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अधिकतर लोग मास्क में दिखेंगे क्योंकि यहां पर नियम बने हुए हैं. लेकिन शहर में एक बार फिर बाज़ारों में भीड़ बढ़ गई है, रेस्टॉरेंट भरे हुए हैं.

लगातार कम आते मामले (भारत में रोज़ाना 10,000 के आसपास नए कोविड मामले दर्ज हो रहे हैं) और जारी टीकाकरण की रफ़्तार (94 करोड़ वयस्क आबादी के 80% हिस्से को कम से कम एक वैक्सीन की डोज़ लगी है) ने ऐसा लगता है कि इस साल अप्रैल और मई में आई दूसरी लहर की भयानक यादों को कम ज़रूर कर दिया है.

क्या कोरोना वायरस समाप्त हो गया है?

लेकिन तथ्य यह है कि महामारी समाप्त नहीं हुई है. यूरोप में फिर एक बार मामले बढ़ रहे हैं जिस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा है कि 'यह चिंता करने वाला' है.

नए वेरिएट B.1.1.529 जिसे WHO ने 'ओमीक्रोन' नाम दिया है वो चिंता की दूसरी वजह है. हालांकि, यह कितना ख़तरनाक है इस पर और शोध की ज़रूरत है.

तो अब यह सवाल पूछना बहुत ज़रूरी हो जाता है: क्या कोविड-19 की तीसरी लहर आने वाली है? अगर ऐसा है तो भारत कितना तैयार है?

भारत में संक्रमण के मामलों में शायद अधिक तेज़ी देखने को न मिले क्योंकि शोध बताते हैं कि अधिकतर भारतीयों में वर्तमान में हावी डेल्टा वेरिएंट के ख़िलाफ़ एंटीबॉडीज़ मौजूद हैं और हर वयस्क में चौथे-पांचवें व्यक्ति का आंशिक रूप से टीकाकरण हुआ है.

लेकिन सिर्फ़ इतना ही ख़ुश होने के लिए काफ़ी नहीं है.

हाल ही में कई राज्यों में डेंगू वायरस के फैलने से भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुल गई, इसने दिखा दिया कि सिस्टम लगातार उभरती बीमारियों से निपटने के लिए तैयार नहीं है.

डेंगू से लड़ाई के दौरान अस्पतालों का हाल देखा जा चुका है.
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डेंगू से लड़ाई के दौरान अस्पतालों का हाल देखा जा चुका है.

और यहीं पर समस्या है. 2020 की शुरुआत में जब महामारी पहुंची थी तो उम्मीद जताई गई थी कि कड़ाई से लागू किया गया लॉकडाउन सरकार को कम स्टाफ़ और कम बजट वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य सिस्टम को मज़बूत करने का मौक़ा देगा.

शीर्ष राजनेता और वरिष्ठ स्वास्थ्य नीति निर्माता बार-बार दोहराते रहे हैं कि पहले लॉकडाउन का एक उद्देश्य था.

सरकारी नीति

एक साल गुज़र चुका है दूसरी कोविड लहर ने भारत को बर्बाद कर दिया, जिस दौरान अस्पतालों में बेड, दवाएं और ऑक्सीजन की कमी को दुनिया ने देखा. असमान इंश्योरेंस कवरेज के साथ मेडिकल बिल भी दिखाई दिए और लोगों को इसके भुगतान के लिए पैसे उधार लेने पड़े या अपनी संपत्तियां बेचनी पड़ीं.

इसके बाद जुलाई 2021 में सरकार ने दूसरे कोविड-19 पैकेज की घोषणा की ताकि स्वास्थ्य ढांचे को मज़बूत किया जा सके. लेकिन कुछ लोगों का कहना था कि यह राशि बहुत कम है और सरकार के एक्शन में कोई तेज़ी नज़र नहीं आती है.

भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की घोषणा 2017 में की गई थी जिसमें 2025 तक स्वास्थ्य पर सरकार का ख़र्च कुल जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया गया था. लेकिन उसके बाद से इस मद में बेहद कम बढ़ोतरी देखी गई है.

2022 के वित्त वर्ष के अंत तक जीडीपी का 1.3% ही ख़र्च करने का लक्ष्य रखा गया है और यह साफ़तौर से लक्ष्य को पूरा करते नहीं दिख रहा है.

सरकार अक्सर दावा करती रही है कि उसकी आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में से एक है. लेकिन कई न्यूज़ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यह योजना उन बहुत कम ही लोगों की मदद कर पा रही है जिन्हें इसकी बेहद ज़रूरत है.

चुनौती इससे भी बहुत बड़ी है और यह महामारी के बाद भी जारी रहेगी.

जब अधिकतर स्वास्थ्य सिस्टम कोविड-19 से लड़ने पर केंद्रित था तब दूसरी सेवाओं पर असर पड़ा. इन्हीं वजहों में से एक वजह है कि भारतीय राज्यों को डेंगू के मामलों से निपटने में भी संघर्ष करना पड़ा

महामारी के दौरान टीबी मरीज़ों को इलाज के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा.
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महामारी के दौरान टीबी मरीज़ों को इलाज के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा.

WHO ने अक्तूबर में कहा था कि महामारी ने 'टीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई की वैश्विक प्रगति को सालों पीछे धकेल दिया है' क्योंकि लोगों को इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ा है.

WHO का कहना था कि 2019 से 2020 के दौरान विश्व भर में जो कुल मामलों में गिरावट देखी गई उसमें से 41% सिर्फ़ भारत में ही थी.

ग़ैर-संचारी रोग से जूझ रहे लोगों को भी इलाज के लिए मुश्किलें झेलनी पड़ी हैं.

तो भारत को क्या करना चाहिए?

पहला काम सरकार को करना चाहिए कि वो स्वतंत्र विशेषज्ञों का एक आयोग गठन करे जो महामारी के ख़िलाफ़ काम का एक निष्पक्ष मूल्यांकन करे.

दूसरा काम यह है कि भारत को दोबारा यह वादा करना चाहिए कि उसे अपने स्वास्थ्य सिस्टम को मज़बूत करने की ज़रूरत है अगर इस वादे पर अगले पांच सालों में केंद्र और राज्य सरकारें काम करती हैं तो देश स्वास्थ्य सिस्टम में बेहद मज़बूत होगा.

तीसरा काम सरकार को यह करना चाहिए कि सभी नीति-निर्माता, स्वास्थ्य और तकनीकी विशेषज्ञ को विज्ञान संचार में ऐसा प्रशिक्षित किया जाए ताकि ग़लत सूचनाओं और डर को फैलने से रोका जा सके.

चौथे काम के तहत भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को महामारी के लिए तैयार करना चाहिए.

पांचवें काम में भारत को सभी स्तरों पर स्वास्थ्य कार्यबल के ख़ाली पदों को तुरंत भरने की ज़रूरत है और ग्रामीण एवं शहरी इलाक़ों में ज़रूरत के आधार पर एक विस्तृत योजना बनाने की ज़रूरत है और उन जगहों को अहमियत दी जाए जहां पर स्वास्थ्य कर्मचारियों की अधिक ज़रूरत है.

विभिन्न स्तरों पर आराम-परस्ती और मेहनत के कारण कोविड-19 के हिसाब से व्यवहार करने, वयस्कों के टीकाकरण और यहां तक की जीनोम निगरानी में भी गिरावट दर्ज की गई है.

ओमीक्रोन वेरिएंट के उभरने को एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए जिसमें देश की तैयारी को देखने की ज़रूरत है कि कैसे देश में कोविड टेस्टिंग, जीनोम सीक्वेंसिंग और वयस्कों का टीकाकरण हो रहा है.

ओमीक्रोन के आने के बाद सरकार सचेत है
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ओमीक्रोन के आने के बाद सरकार सचेत है

लेकिन यहां पर सतर्क रहने की भी ज़रूरत है, नए वेरिएंट के आने के कारण वैक्सीन डोज़ के इंटरवल्स, बूस्टर्स या स्कूलों के खोलने-बंद करने को लेकर कोई फ़ैसला तुरंत नहीं किया जाना चाहिए.

इन सभी फ़ैसलों को वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर आकलन करने के बाद ही लिया जाना चाहिए.

भारत अगली कोविड लहर का सामना करेगा या नहीं करेगा लेकिन इस महामारी के बाद बाक़ी लहरें और महामारियां एक हक़ीकत बना जाएंगी जैसे कि वो पहले थीं.

अगर कोई देश किसी बीमारी की लहर को रोकने और उससे बचने में तैयार रहता है तो वो किसी भी महामारी के लिए तैयार है.

इसलिए हर बीमारी की मार से लड़ने के लिए तैयार होना चाहिए.

15 राज्यों में डेंगू की लहर से लड़ने के संघर्ष ने दिखा दिया कि भारत तैयार नहीं है.

अभी काम किए जाने की ज़रूरत है और सिर्फ़ यही उम्मीद की जा सकती है कि हमें कोई सुन रहा है.

चंद्रकांत लहरिया दिल्ली में महामारी विशेषज्ञ चिकित्सक हैं और साथ ही सार्वजनिक नीति और स्वास्थ्य प्रणाली के जानकार हैं.

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