ओमिक्रॉन भले गंभीर न हो, लेकिन इससे ये तमाम जोखिम जुड़े हैं, नजरअंदाज करना पड़ेगा भारी
नई दिल्ली, 4 जनवरी: ओमिक्रॉन वेरिएंट के ज्यादातर मरीजों में अभी तक ज्यादा गंभीर लक्षण नहीं दिख रहे हैं। इसलिए डॉक्टर मानकर चल रहे हैं कि यह डेल्टा की तरह घातक नहीं है। कम से कम दिल्ली और यूपी के मुख्यमंत्री भी विशेषज्ञों की राय के आधार पर इसी तरह के दावे कर चुके हैं। लेकिन, कोरोना के इस संक्रामक वेरिएंट ने यूरोप और अमेरिका में जहां ज्यादा कहर मचाया है, उनके एक अनुभव से सीख लेने की जरूरत है। भले ही यह वेरिएंट ज्यादा खतरनाक न दिख रहा हो, लेकिन इसने यदि भयावह रूप लिया तो यह सिस्टम को जरूर चौपट कर सकता है। इसकी पुख्ता वजहे हैं।

जंगल की आग की तरह फैल रहा है ओमिक्रॉन
एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि ओमिक्रॉन वेरिएंट जंगल की आग की तरह फैल रहा है। हालांकि, डॉक्टरों का यह भी मानना है कि ज्यादातर मरीज हफ्ते भर में ठीक हो जा रहे हैं। अधिकतर मरीजों में या तो लक्षण भी नहीं होते या फिर हल्के लक्षण ही होते हैं। लेकिन, यह ओमिक्रॉन वेरिएंट के प्रकोप का एक पहलू भर है। लेकिन, इसकी संक्रामकता बहुत ही भयावह है और इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। अमेरिका और ब्रिटेन समेत यूरोप के कई देश इसे भुगत भी रहे हैं। भारत में भी हालात दिनों-दिन खराब होती जा रही है। शोध में यह भी सामने आ चुका है कि कोरोना वायरस के मूल रूप और डेल्टा वेरिएंट से यह 70 गुना ज्यादा तेजी से फैलता है। यानी बहुत ज्यादा संक्रामक है। एक्सपर्ट मान रहे हैं कि इसके संक्रमण की गति की वजह व्यवस्था के चरमराने का खतरा बढ़ सकता है, खासकर भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में।

मैनपावर का शुरू हो चुका है संकट
ओमिक्रॉन के चलते कोविड के ज्यादा तेजी से संक्रमण की वजह से संभावित व्यवस्था संकट को भारत में सामने आ रहे कुछ उदाहरणों से समझना आसान हो सकता है। पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में हेल्थवर्कर कोरोना की चपेट में आ गए हैं, जिसके चलते वहां मैनपावर का संकट छा गया है। पूरे बंगाल खासकर कोलकाता में बड़ी संख्या में अस्पतालों के डॉक्टर और दूसरे स्टाफ कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। इसके चलते स्वास्थ्य सेवाओं के भट्ठा बैठने की चिंता सताने लगी है। इसकी वजह से राज्य सरकार हेल्थकेयर वर्करों की 10 दिनों के अनिवार्य आइसोलेशन की व्यवस्था को घटाकर 5 दिन करने पर विचार करने को मजबूर हुई है।

अमेरिका और यूके झेल रहे हैं यह संकट
यूके में यह व्यवस्था पहले से मजबूरन अपनानी पड़ी है और अमेरिका के सीडीसी ने भी उनके लिए आइसोलेशन 5 दिन करने का सुझाव दिया है, जिन्हें अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं है। द नेशनल न्यूज ने यॉर्कशायर इलाके की एंबुलेंस सर्विस के हवाले से लिखा है, 'कोविड-19 से संबंधित कर्मचारियों की अनुपस्थिति की अतिरिक्त चुनौती... हमारे फ्रंटलाइन संचालन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल रही है।' बिहार में भी आईएमए के एक कार्यक्रम में शामिल 100 से ज्यादा डॉक्टर संक्रमित हुए हैं, जिसमें से 84 तो सिर्फ एक नालंदा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के हैं। लखनऊ के मेदांता अस्पताल में भी डॉक्टर समेत 40 हॉस्पिटल स्टाफ के संक्रमित होने की बात सामने आई है। ध्यान रखिए, यह सिर्फ एक संकेत हो सकताहै! भविष्य में आने वाली बड़ी चुनौती का।

पूरी व्यवस्था बिगड़ने का है खतरा
अगर ब्रिटेन का उदाहरण लें तो ओमिक्रॉन की वजह से वहां सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं के सामने ही स्टाफ के संक्रमित होने की वजह से अव्यवस्था का संकट पैदा नहीं हुआ है। बल्कि, पब्लिक डीलिंग में लगी कई और सेवाएं भी ठप होने के कगार पर हैं। वहां, कोविड संक्रमण की वजह से उद्योगों के सामने स्टाफ की किल्लत है। रेलवे, बस सेवाएं और ट्यूब लाइंस सर्विस बाधित हो चुकी हैं। क्योंकि, संक्रमण की वजह से भले ही लक्षण गंभीर नहीं हों, संक्रमित स्टाफ को खुद को अलग करके रहना पड़ रहा है। इसी वजह से आइसोलेशन की मियाद घटाने की नौबत आई है।

इन्हें नजरअंदाज करना पड़ेगा भारी
संपूर्ण लॉकडाउन के दौरान आवश्यक सेवाओं को आवाजाही की छूट मिली हुई थी। इसलिए देश में लोगों तक जरूरी सामग्री पहुंचाने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। लेकिन, ओमिक्रॉन के बारे में जानकारों की राय भिन्न है। इसके बारे में कहा जा रहा है कि संक्रमित के संपर्क में थोड़ी देर के लिए भी आना, संक्रमण को बुलावा है। ऐसे में बैंक हो या एटीएम सेवा या फिर मेडिकल कारोबार, या फिर कोई भी सार्वजनिक कार्यालय या फिर होम डिलिवरी व्यवसाय। अगर संक्रमण की वजह से मैनपावर की कमी हुई तो एक अजीब हाहाकार की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए जो सरकारें सिर्फ ओमिक्रॉन के कम घातक होकर नीतियां बनाने में लगी हुई हैं, उन्हें इस संभावित संकट से भी मुंह नहीं फेरना चाहिए।












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