लोकसभा में NDA का आंकड़ा 300 पार होते ही INDIA गठबंधन में बेचैनी? अब इस पार्टी को मनाने में जुटे विपक्षी
लोकसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की बढ़ती ताकत ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद जिस राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास 293 सीटें थीं, वह अब सहयोगियों की मदद से तेजी से बढ़ते हुए 300 का आंकड़ा पार कर चुका है। एनडीए के इस बढ़ते कुनबे ने विपक्षी खेमे यानी INDIA गठबंधन की नींद उड़ा दी है।
विपक्षी खेमे में इस वक्त सबसे बड़ी चिंता अपने पुराने और मजबूत साथी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम (DMK) को बचाए रखने की है, जो फिलहाल कुछ नाराज दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि संसद में बदलते समीकरणों के बीच इंडिया गठबंधन अपने पुराने सहयोगी की नाराजगी दूर करने में जुट गया है।

कैसे बढ़ा NDA का कुनबा और बदला नंबर गेम?
विपक्षी खेमे में मची इस खलबली के पीछे असली वजह सीटों का गणित है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने एक अलग गुट 'नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' बनाकर NDA को अपना समर्थन दे दिया, जिससे आंकड़ा सीधे 313 पर पहुंच गया। इसके ठीक बाद उद्धव ठाकरे गुट के 6 और सांसद पाला बदलकर शिंदे गुट के साथ आ गए, जिससे एनडीए की ताकत 319 तक जा पहुंची।
अब अगर लोकसभा में 22 सांसदों वाली DMK भी मुद्दों के आधार पर सरकार का साथ देती है, तो यह संख्या 341 हो जाएगी। संसद के निचले सदन में दो तिहाई बहुमत के लिए वैसे तो 362 सीटें चाहिए, लेकिन 3 सीटें खाली होने की वजह से यह जादुई आंकड़ा फिलहाल 360 का है। बजट सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर सरकार को 298 सांसदों का साथ मिला था, जो जरूरी आंकड़े से 62 कम था। यही वजह है कि एनडीए अब नए साथियों को जोड़ने में लगा है।
स्टालिन के बयान से बढ़ी टेंशन, कांग्रेस करने लगी मान-मनौव्वल
इस पूरे फेरबदल के बीच डीएमके के मुखिया एमके स्टालिन के एक बयान ने INDIA गठबंधन को भारी टेंशन में डाल दिया है। स्टालिन ने हाल ही में कहा था कि उनकी पार्टी चुनावी गठबंधन की जरूरतों को लेकर नए सिरे से विचार करेगी। इसके बाद से ही कांग्रेस और विपक्ष के बाकी बड़े नेता डीएमके को मनाने में जुट गए हैं।
कांग्रेस की तरफ से डीएमके को वामपंथी (लेफ्ट) पार्टियों का उदाहरण दिया जा रहा है कि कैसे वे मुद्दों पर मतभेद के बावजूद गठबंधन का हिस्सा बनी हुई हैं। राज्यसभा में भी डीएमके के पास 8 सांसद हैं, जिसके चलते उनका रुख दोनों सदनों में बेहद मायने रखता है।
राज्यसभा में भी बदल रहे हैं समीकरण (Rajya Sabha Equation)
केवल लोकसभा ही नहीं, बल्कि राज्यसभा में भी विपक्ष को करारे झटके लगे हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) के राघव चड्ढा समेत 7 सांसद भाजपा के पाले में जा चुके हैं। वहीं, टीएमसी के 4 सांसदों के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीटों पर भाजपा आसानी से जीत हासिल कर सकती है। हालिया चुनाव में एनडीए को 19 सीटों पर जीत मिली थी और मिजोरम के इकलौते सांसद ने भी सरकार को साथ देने का भरोसा दिया है।
इसके अलावा, शरद पवार की पार्टी के सांसदों के भी दूसरी एनसीपी के संपर्क में होने की चर्चाएं हैं। उधर, उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के भीतर टूट की अटकलें लगाई जा रही हैं, हालांकि सपा इन दावों को पूरी तरह खारिज कर रही है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के 3 और आम आदमी पार्टी के 3 लोकसभा सांसदों पर भी सबकी नजरें टिकी हैं। अगले सत्र से पहले शह और मात का यह खेल और तेज होने की उम्मीद है।
अभी भी आसान नहीं है दो-तिहाई बहुमत (Two-Third Majority Challenge)
बजट सत्र के दौरान महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम विधेयकों पर सरकार को करीब 298 सांसदों का समर्थन मिला था। दो-तिहाई बहुमत के लिए इससे कहीं ज्यादा संख्या की जरूरत होगी। इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिर्फ 300 का आंकड़ा पार करना पर्याप्त नहीं है। सरकार को आगे भी कई क्षेत्रीय दलों का सहयोग जुटाना पड़ सकता है।
इसी वजह से डीएमके, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), आम आदमी पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे दलों की भूमिका आने वाले समय में और अहम हो सकती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को लेकर भी दलों के भीतर संभावित बदलाव














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