लोकसभा-राज्यसभा में जादुई नंबर से कितनी दूर है NDA? 'मिशन मोदी' का वो सच, जो उड़ा सकता है विपक्ष की नींद!
NDA Two Third Majority: देश की राजनीति में इन दिनों जो कुछ भी चल रहा है, उसने बड़े-बड़े सियासी पंडितों के सिर चकरा दिए हैं। दल-बदल, अंदरूनी बगावत और पाला बदलने का ऐसा खेल शायद ही पहले कभी देखा गया हो। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) से लेकर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) तक, हर तरफ जबरदस्त उथल-पुथल मची है। इस पूरे सियासी ड्रामे और विपक्षी दलों में हो रही टूट का सीधा फायदा केंद्र की सत्ता में बैठी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार को हो रहा है।
अब देश की सियासत का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का NDA गठबंधन संसद के दोनों सदनों लोकसभा-राज्यसभा में उस जादुई आंकड़े यानी दो-तिहाई बहुमत (Two-Third Majority) के करीब पहुंच रहा है, जो देश की पूरी चुनावी राजनीति का भूगोल और दिशा हमेशा के लिए बदल सकता है? आइए समझते हैं।

परिसीमन बिल पर वो हार और मोदी सरकार का नया प्लान (Delimitation Bill)
इस पूरे सियासी चक्रव्यूह को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा। कहानी की शुरुआत पिछले साल 17 अप्रैल 2025 को हुई थी। नरेंद्र मोदी की सरकार को अपने 12 साल के लंबे कार्यकाल में पहली बार संसद के भीतर किसी संवैधानिक संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment Bill) पर हार का सामना करना पड़ा था।
सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया था। इस ऐतिहासिक बिल का मकसद लोकसभा सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करना था, और देश में नए सिरे से परिसीमन (Delimitation) को 2011 की जनगणना से जोड़ना था। साथ ही सरकार यह अधिकार भी चाहती थी कि भविष्य के परिसीमन के लिए किस जनगणना का इस्तेमाल हो, यह तय करने का हक संसद को मिले।
लेकिन, संविधान संशोधन के लिए जिस दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, वह सरकार नहीं जुटा पाई। बिल के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। सरकार जादुई आंकड़े से महज 54 वोट दूर रह गई और बिल गिर गया। इसे मोदी सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना गया, लेकिन असली खेल इस बिल के गिरने के बाद शुरू हुआ। इसके बाद विपक्षी खेमे में ऐसी भगदड़ मची कि आम आदमी पार्टी (AAP), टीएमसी और शिवसेना में बगावत की चिंगारी भड़क उठी।

दलबदल का तूफान: विपक्षी किलों में कैसे लगी सेंध?
परिसीमन विधेयक गिरने के बाद देश के सियासी गलियारों में 'ऑपरेशन लोटस' और 'ऑपरेशन टाइगर' जैसे शब्द गूंजने लगे। विपक्षी दलों के किले एक-एक कर ढहने लगे:
- आम आदमी पार्टी (AAP) को झटका: बगावत का सिलसिला आम आदमी पार्टी से शुरू हुआ, जब राघव चड्ढा समेत 'आप' के 7 राज्यसभा सांसदों ने पाला बदल लिया और बीजेपी के साथ खड़े हो गए। चड्ढा का आरोप था कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से पूरी तरह भटक चुकी है।
- ममता के गढ़ TMC में हड़कंप: इसके बाद मई में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों के तुरंत बाद पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ बड़ी बगावत हो गई। टीएमसी के करीब 60 विधायक बागी हो गए और देखते ही देखते 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी का साथ छोड़ दिया। इनमें टीएमसी की पोस्टर गर्ल मानी जाने वाली सयानी घोष जैसी बड़ी नेता भी शामिल हैं।
- उद्धव की शिवसेना भी संकट में: संकट यहीं नहीं रुका, अब महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) के 9 में से 6 लोकसभा सांसद भी पाला बदलने और सरकार को समर्थन देने की पूरी तैयारी में हैं।
लोकसभा का नया गणित: जादुई आंकड़े से कितनी दूर है NDA? (Lok Sabha Seat Calculation)
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत यानी 360 सीटों के लक्ष्य को पाने के लिए एनडीए के पास क्या समीकरण हैं?
2024 का शुरुआती आंकड़ा: 2024 के आम चुनाव के तुरंत बाद एनडीए के पास कुल 293 सीटें थीं।
टीएमसी बागियों का साथ: टीएमसी के 20 बागी सांसदों के समर्थन के बाद यह ग्राफ सीधा उछलकर 313 तक पहुंच जाता है।
शिवसेना (UBT) के बागी: अगर उद्धव कैंप के 6 बागी सांसद भी जुड़ जाते हैं, तो एनडीए का कुनबा 319 तक पहुंच जाएगा।

यूपी और तमिलनाडु से मिल सकती है बड़ी राहत
उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने एक बड़ा दावा करके सनसनी फैला दी है कि समाजवादी पार्टी (SP) के 25 से 30 लोकसभा सांसद टूटने के लिए तैयार बैठे हैं।
अगर ऐसा होता है, तो एनडीए का आंकड़ा सीधे 350 के पार पहुंच जाएगा। उधर, तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके (DMK) भी कांग्रेस और इंडिया (INDIA) गठबंधन से नाराज चल रही है। चर्चा है कि डीएमके के 22 सांसद वोटिंग के दौरान संसद से नदारद (Abstain) रहकर परोक्ष रूप से एनडीए की राह को बेहद आसान बना सकते हैं।
राज्यसभा में भी बढ़ी ताकत, मिजोरम से मिला 'सरप्राइज' गिफ्ट (Rajya Sabha Seat Upgrades)
सिर्फ लोकसभा ही नहीं, बल्कि राज्यसभा (उच्च सदन) में भी एनडीए बिना कोई बड़ा चुनाव लड़े मजबूत होती जा रही है। हाल ही में हुए 27 सीटों के राज्यसभा चुनाव में एनडीए ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 19 सीटों पर कब्जा किया था। इसके बाद 245 सदस्यों वाले सदन में एनडीए का आंकड़ा 152 पर पहुंच गया था, जबकि पूर्ण बहुमत के लिए 164 सीटों की जरूरत होती है।
अब एनडीए को पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम से भी एक बड़ा सरप्राइज सपोर्ट मिल गया है। जोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) के नवनिर्वाचित सांसद के. लालतलुआंगकिमा ने केंद्र सरकार को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है, जिससे एनडीए की ताकत 153 हो गई है।

हालांकि लालतलुआंगकिमा ने साफ किया है कि उनकी पार्टी संसद में स्वतंत्र और न्यूट्रल रहेगी, लेकिन मिजोरम के विकास और जनकल्याण के मुद्दों पर वे सरकार का साथ देंगे। उन्होंने राज्यसभा चुनाव में कुल 36 वोटों में से 26 वोट हासिल कर मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) की जोथानसांगी ह्यार को हराया था। दिलचस्प बात यह रही कि इस वोटिंग से बीजेपी के दो और कांग्रेस का एक विधायक पूरी तरह दूर रहा था।
इसके साथ ही, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 4 राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीटों पर भी बीजेपी की जीत तय मानी जा रही है, जिससे सरकार की ताकत और ज्यादा बढ़ने वाली है।
मॉनसून सत्र में आएगा भूचाल! क्या दोबारा पेश होगा परिसीमन बिल? (Monsoon Session 2026)
इस पूरे जोड़-तोड़ और बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे मोदी सरकार का एक बहुत बड़ा और सोचा-समझा मिशन छिपा हुआ है। जानकार मान रहे हैं कि आगामी मॉनसून सत्र में संसद के भीतर एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है।
चूंकि अप्रैल में गिरा परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन बिल सिर्फ संख्या बल की कमी के कारण अटका था, इसलिए पीएम मोदी का पूरा फोकस उस दो-तिहाई बहुमत को हासिल करने पर है।
अगर एनडीए इन दलबदलुओं और नए सहयोगियों के दम पर लोकसभा में 360 और राज्यसभा में जरूरी संख्या बल का जुगाड़ कर लेती है, तो इस बेहद महत्वपूर्ण बिल को नए और बदले हुए रूप में दोबारा संसद के पटल पर रखा जा सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो देश की चुनावी सियासत का पूरा ढांचा ही बदल जाएगा।
आखिर मोदी का बड़ा मिशन क्या है? (What Is Modi's Bigger Political Goal)
राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह का मानना है कि सरकार का लक्ष्य सिर्फ वर्तमान बहुमत बनाए रखना नहीं है। असली चुनौती संसद में इतना मजबूत संख्या बल हासिल करना है कि बड़े संवैधानिक और संरचनात्मक बदलावों के लिए बार-बार सहयोगियों या विपक्ष पर निर्भर न रहना पड़े।
यही वजह है कि आज की राजनीति में हर सांसद, हर क्षेत्रीय दल और हर दलबदल की चर्चा राष्ट्रीय महत्व का विषय बन गई है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि संसद का यह नया गणित सिर्फ चर्चा तक सीमित रहता है या फिर भारतीय राजनीति में किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार करता है।














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