मोदी सरकार को क्यों चाहिए लोकसभा में 362 सांसद? अभी कितनी हैं BJP की सीटें और कितने जुटाने हैं? क्या है एजेंडा
भारतीय राजनीति के गलियारों में इस समय विपक्षी सांसदों की पाला-बदल नीति को लेकर जबरदस्त हलचल मची हुई है। लोकसभा की राजनीति में इन दिनों एक संख्या सबसे ज्यादा चर्चा में है 362। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि मोदी सरकार के कई बड़े राजनीतिक और संवैधानिक एजेंडों की चाबी माना जा रहा है। पिछले कुछ महीनों में विपक्षी दलों के सांसदों के पाला बदलने नए राजनीतिक गठबंधनों और बगावत की खबरों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है।
पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों का एक गुमनाम पार्टी NCPI में विलय और फिर शिवसेना (उद्धव गुट) के 9 में से 6 सांसदों की बगावत ने दिल्ली के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। सिर्फ लोकसभा ही नहीं, बल्कि राज्यसभा में भी आम आदमी पार्टी (AAP) के 10 में से 7 सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए एनडीए (NDA) का दामन थाम लिया है।

इस राजनीतिक उठापटक के बीच आम नागरिक के जेहन में एक ही सवाल कौंध रहा है कि आखिर बहुमत का आंकड़ा होने के बावजूद मोदी सरकार को लोकसभा में 362 सांसदों का साथ क्यों चाहिए? भारतीय जनता पार्टी और NDA इस जादुई नंबर को हासिल करने के लिए इतनी बेचैन क्यों है? आइए समझते हैं।
362 का आंकड़ा क्यों भाजपा के लिए है जरूरी? (Why Modi Govt Needs Two Third Majority)
दरअसल, देश की संसद में साधारण कानून पास कराने के लिए तो सामान्य बहुमत (272+ सीटें) ही काफी होता है, लेकिन जब बात देश के संविधान को बदलने की आती है, तो सरकार को 'विशेष बहुमत' की जरूरत पड़ती है। संविधान के मुताबिक किसी भी संविधान संशोधन विधेयक (Constitution Amendment Bill) को पास कराने के लिए सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई (Two-Third) समर्थन अनिवार्य है।
अगर लोकसभा के सभी 543 सांसद सदन में मौजूद रहकर वोटिंग करें, तो इस दो-तिहाई के नियम के हिसाब से सरकार को 362 वोटों की जरूरत होती है। हाल ही में अप्रैल 2026 में मोदी सरकार लोकसभा में एक ऐसा ही संविधान संशोधन बिल (131वां संशोधन) लेकर आई थी, जिसका मकसद साल 2029 के चुनावों तक महिला आरक्षण कानून को जमीन पर उतारना और लोकसभा की अधिकतम सीटों को 550 से बढ़ाकर 850 करना था।
उस दौरान सदन में 528 सांसद मौजूद थे और बिल पास कराने के लिए 352 वोटों की दरकार थी, लेकिन सरकार के पक्ष में सिर्फ 298 वोट पड़े और विपक्ष के 230 विरोध मतों के कारण यह अहम बिल 54 वोटों से गिर गया। इसी हार के बाद बीजेपी ने मानसून सत्र से पहले इस आंकड़े को हर हाल में दुरुस्त करने की रणनीति बनाई है।
परिसीमन और 'वन नेशन-वन इलेक्शन' का असली एजेंडा
मोदी सरकार के इस पूरे चक्रव्यूह के केंद्र में दो सबसे बड़े एजेंडे शामिल हैं। पहला एजेंडा है 'परिसीमन बिल' (Delimitation Bill)। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी (TDP) प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने भी इस बात की पुष्टि की है कि केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र में परिसीमन बिल को दोबारा पेश करने की तैयारी में है। महिला आरक्षण को लागू करने के लिए देश में लोकसभा सीटों का दोबारा निर्धारण (परिसीमन) होना बेहद जरूरी है, जिसके लिए संविधान के आर्टिकल 81 और 82 में संशोधन करना पड़ेगा।
सरकार का दूसरा बड़ा और लॉन्ग-टर्म एजेंडा 'वन नेशन-वन इलेक्शन' (एक देश-एक चुनाव) बिल को पारित कराना है। इस कानून के आने के बाद पूरे देश में लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकेंगे।
दिसंबर 2024 में सरकार इस बिल को संसद में लेकर आई थी, जिसे बाद में जेपीसी (JPC) को सौंप दिया गया था। इस महा-कानून को पास कराने के लिए लोकसभा और विधानसभाओं के कार्यकाल, उन्हें भंग करने और राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने से जुड़े संविधान के आर्टिकल 83, 85, 172, 174 और 356 में बड़े बदलाव करने होंगे, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत होना अनिवार्य शर्त है।
संसद में अभी क्या है NDA का मौजूदा समीकरण?
अगर वर्तमान में संसद के दोनों सदनों में मोदी सरकार के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर कुछ इस तरह दिखाई देती है।
लोकसभा का गणित: साल 2024 के आम चुनाव में बीजेपी को अपने दम पर 240 सीटें मिली थीं, जबकि गठबंधन के सहयोगियों (TDP-16, JDU-12, शिवसेना शिंदे गुट-7, LJP-5 और अन्य) को मिलाकर यह आंकड़ा 292 पर था।
इसके बाद 14 जून को टीएमसी के 20 बागी सांसदों के एनडीए समर्थित धड़े से जुड़ने के बाद यह संख्या 312 हो गई। अब यदि महाराष्ट्र में उद्धव गुट के 6 और सांसद पाला बदलते हैं, तो लोकसभा में एनडीए का आंकड़ा 318 सांसदों तक पहुंच जाएगा। यानी दो-तिहाई के आंकड़े (362) से सरकार अब भी 44 सीटें दूर है।

राज्यसभा का गणित: राज्यसभा की कुल 244 सीटों में से एनडीए के पास शुरुआत में 138 सीटें थीं। इसके बाद आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के टूटने से बीजेपी की व्यक्तिगत संख्या 106 से बढ़कर 113 हुई और एनडीए 145 पर पहुंचा।
जून में हुए राज्यसभा चुनावों में मिली अतिरिक्त जीतों और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 3 सांसदों के इस्तीफे के बाद खाली सीटों को जीतने की उम्मीद को मिलाकर राज्यसभा में एनडीए का आंकड़ा 154 सीटों तक पहुंचने की संभावना है, जो दो-तिहाई बहुमत से महज 10 सीट कम है।

बाकी बचे सांसदों का जुगाड़ कहां से करेगी बीजेपी? (How Will BJP Manage Missing Seats)
लोकसभा में 44 सीटों और राज्यसभा में 10 सीटों के इस फासले को पाटने के लिए बीजेपी की नजर कुछ खास क्षेत्रीय दलों और विपक्षी खेमे में सेंधमारी कर सकती है।
लोकसभा के लिए रणनीति: बीजेपी की नजर तमिलनाडु की डीएमके (DMK - 22 सांसद) और झारखंड की जेएमएम (JMM - 3 सांसद) पर टिकी है। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, डीएमके को साधने का जिम्मा चंद्रबाबू नायडू और पवन कल्याण को सौंपा गया है। इसके अलावा, विपक्षी सांसदों की अनुपस्थिति (वोटिंग के दिन सदन से गायब रहना) भी सरकार के लिए मददगार साबित होती है, क्योंकि इससे वोट करने वालों की कुल संख्या कम हो जाती है और दो-तिहाई का जरूरी आंकड़ा अपने आप नीचे आ जाता है।
राज्यसभा के लिए रणनीति: राज्यसभा में बीजेपी को वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP - 4 सीटें) और बीजू जनता दल (BJD - 5 सीटें) जैसी न्यूट्रल पार्टियों के समर्थन की उम्मीद है। हालांकि, नवंबर में उत्तर प्रदेश से रिटायर हो रहे 10 राज्यसभा सांसदों के चुनाव में समाजवादी पार्टी अपनी मजबूत स्थिति के चलते एनडीए का खेल थोड़ा उलझा सकती है।
क्या भाजपा के होने वाले हैं चुनावी फायदा?
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन बिल पास होने के बाद अगर देश में लोकसभा की सीटें बढ़कर 850 हो जाती हैं, तो इसका सबसे बड़ा फायदा बीजेपी को अपने कोर वोट बैंक वाले राज्यों में मिलेगा। इसे हम दो अलग-अलग परिस्थितियों से समझ सकते हैं:
बेस्ट केस सिनैरियो (अगर 2019 जैसा प्रदर्शन रहा): परिसीमन के बाद बहुमत के लिए 426 सीटों की जरूरत होगी। साल 2019 में बीजेपी ने हिंदी भाषी राज्यों (काउ बेल्ट) की 55% सीटें जीती थीं। नए परिसीमन के बाद इसी प्रदर्शन के दम पर बीजेपी अकेले इन 8 हिंदी भाषी राज्यों से ही 299 सीटें निकाल लेगी, जो बहुमत का करीब 70% होगा। इसके साथ ही गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल और कर्नाटक को जोड़कर पार्टी आसानी से अकेले दम पर बहुमत पार कर जाएगी।
वर्स्ट केस सिनैरियो (अगर 2024 जैसा प्रदर्शन रहा): साल 2024 के कमजोर प्रदर्शन के आधार पर भी अगर गणना की जाए, तो परिसीमन के बाद हिंदी भाषी राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ने के कारण बीजेपी को इन 8 राज्यों से ही लगभग 210 सीटें मिल जाएंगी, जो नए बहुमत के आंकड़े का आधा हिस्सा अकेले दम पर पूरा कर देगा।
यही वजह है कि बीजेपी लॉन्ग-टर्म प्लानिंग के तहत क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को सीमित करने और 2029 की चुनावी पिच को अपने अनुकूल तैयार करने के लिए संसद में हर हाल में दो-तिहाई बहुमत का किला फतह करना चाहती है।
फिलहाल 362 का आंकड़ा मोदी सरकार के लिए सिर्फ गणित नहीं, बल्कि कई बड़े राजनीतिक लक्ष्यों का आधार माना जा रहा है। महिला आरक्षण, परिसीमन और वन नेशन-वन इलेक्शन जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने के लिए सरकार को व्यापक समर्थन की जरूरत होगी। आने वाले महीनों में संसद के भीतर और बाहर होने वाली राजनीतिक हलचल इसी लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे सकती है।












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