मुलायम सिंह यादव: मुझे एक वोट और एक नोट दें, आपको सूद समेत लौटाऊंगा

सैफई मंगलवार को ग़मगीन था. शहर को जाने वाले सड़कों पर गाड़ियों का रेला था. दुकानें बंद थीं और कई घरों पर ताले लटके थे. हज़ारों की तादाद में लोग अपने नेता जी मुलायम सिंह यादव को आख़िरी विदाई देने पहुँचे थे.

जगह-जगह पर झुंड बनाकर लोग नेताजी के बारे में चर्चा कर रहे थे. बीच-बीच में एक नारा गूंज रहा था...''जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है.''

साल 1939 में उत्तर प्रदेश के जिस इटावा ज़िले के सैफ़ई क़स्बे में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का जन्म हुआ, वहीं कल उनका अंतिम संस्कार हुआ.

उन्हें अलविदा कहने उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों से लोग जमा हुए थे. सबके पास नेता जी के बारे में कोई न कोई दिलचस्प क़िस्सा था.

ऐसे ही कुछ क़िस्से कहानियां सैफ़ई के मेला मैदान में जुटे लोगों में से कुछ न बीबीसी हिंदी के साथ भी साझा कीं.

ओमप्रकाश इटावा के लखना शहर से आए थे. उनके साथ कुछ भी चल रही थीं.

वे कहते हैं, ''जिसने जीना सिखाया, उसके बारे में क्या बोलें. पूरा सैफई उन्हीं का है. उनके जैसा न कोई हुआ, न होगा.''

गेस्ट हाउस कांड जिसने बढ़ा दी थी मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच तल्ख़ी

नम आंखों से विदाई

थोड़ी ही दूर पर नेताजी के अंतिम दर्शन कर के लौट रही मिटिला देवी और दुरा देवी ने बताया कि नेताजी के देहांत की ख़बर आने के बाद से गांव के ज़्यादातर घरों में चूल्हा नहीं जला है. रात तक नेताजी के आवास के बाहर लोगों की ख़ासी भीड़ थी. कई समर्थकों की सुबह उनके घर के दरवाज़े पर ही हुई.

ओमप्रकाश और उनके साथ की बाक़ी महिलाएं सुबह करीब साढ़े चार किलोमीटर की पैदल यात्रा कर, मेला मैदान पहुंची थीं ताकि 'सैफई के लाल' को अपनी अंतिम विदाई दे सकें.

सैफई का ये मेला मैदान मुलायम सिंह यादव के घर से क़रीब पांच सौ मीटर दूर है. इस मैदान के तस्वीरें और वीडियो पहले भी ख़ूब देखे-दिखाए गए हैं. कुछ साल पहले तक यहीं पर सैफ़ई महोत्सव' का आयोजन होता था.

बॉलीवुड के तमाम दिग्गज इसमें हिस्सा लेते थे, मंगलवार को मुलायम सिंह यादव का अंतिम संस्कार इसी मैदान में किया गया. भारी संख्या में आम लोगों के अलावा, नेताओं से लेकर बॉलीवुड के सितारे भी सैफई पहुँचे.

यहाँ पहुँचने वाले इनमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के पूर्व और छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ और भूपेश बघेल, बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, योग गुरु बाबा रामदेव, सपा की राज्यसभा सांसद जया बच्चन, बॉलीवुड अभिनेता अभिषेक बच्चन, उद्योगपति अनिल अंबानी आदि शामिल रहे.

मुलायम सिंह यादव के पाँच बड़े फ़ैसले, जिन्होंने भारत की राजनीति पर छोड़ी गहरी छाप

सैफई की मिट्टी का लाल

मुलायम सिंह यादव का निधन सोमवार सुबह गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में हुआ था. बीते दो सालों से वे ब्लड प्रेशर, यूरीन इंफेक्शन जैसी बीमारियों से जूझ रहे थे. अस्पताल में भर्ती रहे उन्हें पचास दिन से ऊपर हो गया था. सोमवार को निधन के बाद, नेताजी के पार्थिव शरीर को सीधा उनकी जन्म और कर्म स्थली सैफई के लिए रवाना कर दिया गया.

साल 1967 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में नेता जी उम्मीदवार बनना चाहते थे पर उनके पास चुनाव अभियान के लिए पैसे नहीं थे.

उन्हें अंतिम विदाई देने आए एक शख़्स ने इस चुनाव का ज़िक्र कुछ यूँ किया, "एक दिन नेताजी के घर की छत पर गांव के लोगों की बैठक हुई. सबने इस बैठक में तय किया कि यदि वे दिन में एक टाइम का खाना छोड़ देते हैं, तो मुलायम की गाड़ी आठ दिनों तक बिना किसी रुकावट चुनाव प्रचार में चल सकती है.''

गांव के लोगों की ये कोशिश सफल हुई और मुलायम सिंह पहली बार इटावा ज़िले की जसवंतनगर विधानसभा सीट से विधायक चुन लिए गए.

उस चुनाव के दौरान मुलायम सिंह मंच से अक्सर कहते रहते थे, "आप मुझे एक वोट और एक नोट दें. अगर विधायक बना तो सूद समेत वापस लौटाऊंगा.''

नेताजी ने विधायक बनने के बाद सैफई में विकास के काम करने शुरू किए. सड़क, शिक्षा, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं दुरुस्त करने के साथ ही बाद में उन्होंने यहाँ एक वर्ल्ड क्लास स्टेडियम भी बनवाया.

सैफई में अब हवाई पट्टी है, एम्स की तर्ज पर बना एक मेडिकल कॉलेज है और भारत में अपने क़िस्म एकमात्र जंगल सफारी भी है. एक गांव से सैफई अब अच्छा-ख़ास क़स्बा है. शायद इतने विकसित क़स्बे भारत में कम ही हैं.

मुलायम सिंह यादव: सियासी अखाड़े के बड़े खिलाड़ी, जिन्होंने कई सरकारें बनाईं और बिगाड़ीं

एक दोस्त की याद में...

राधे श्याम
BBC
राधे श्याम

मैनपुरी के राधेश्याम यादव ख़ुद को मुलायम सिंह यादव का साथी बताते हैं.

वे कहते हैं, ''हिंदुस्तान में मुलायम सिंह जैसा सरल नेता न आज तक हमने देखा है और न देख पाएंगे. हज़ारों की भीड़ में वो हाथ देकर मुझसे पूछते थे कि राधेश्याम तुम भी राजनीति में आ जाओ और मैं झेंपकर कहता था कि नेताजी आप में ही मैं ख़ुद को देखता हूं.''

नेताजी से जुड़ा एक किस्सा सुनाते हुए वे भावुक हो जाते हैं.

राधेश्याम बताते हैं कि एक बार नेता जी ने आर्थिक रूप से कमज़ोर एक ब्राह्मण परिवार की पांच लड़कियों की शादी करवाई थी. इस परिवार की स्थिति इतनी नाज़ुक थी कि बच्चियों की मां आत्महत्या करने जा रही थी. नेताजी ने उन्हें ढाढस बंधाया और पांचों लड़कियों की शादी करवाई.

नेताजी के पहलवानी के दिनों को याद करते हुए वे कहते हैं, ''उनका चरखा दाव बहुत प्रसिद्ध था. आगे चलकर इसी दाव के सहारे उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को भी चित किया.''

नीतीश कुमार के सामने यह तेजस्वी का सरेंडर है या उत्तराधिकारी बनने की डील

अपने हिंदी टीचर को याद करता एक छात्र

{image-" सख़्त मिज़ाज के शिक्षक थे. कक्षा में पूरी फुर्ती के साथ चलते-फिरते हुए पढ़ाते थे. बाद में भी वे मुझे पहचान जाते, हाल-चाल पूछते. जो वादा कर देते उसे पूरा कर के ही मानते थे.", Source: रामस्वरूप, Source description: मुलायम सिंह के छात्र रहे, Image: hindi.oneindia.com}

पहलवानी के बाद नेताजी बतौर हिंदी शिक्षक जैन इंटर कॉलेज में बच्चों को पढ़ाते थे. अलविदा कहने आए लोगों में 1967 में मुलायम सिंह के छात्र रहे रामस्वरूप भी थे.

गुरु को श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे रामस्वरूप ने बीबीसी को बताया, "मैं मॉर्निंग वॉक करने निकला था जब मुझे मेरे गुरु जी के देहांत की सूचना मिली. वास्तव में ऐसा लगा जैसे घर का कोई अभिभावक हमें छोड़कर चला गया है.''

''नेताजी हमें हिंदी पढ़ाते थे और उनकी पढ़ाने की शैली बहुत अच्छी थी. सख़्त मिजाज़ के शिक्षक थे. कक्षा में पूरी फुर्ती के साथ चलते-फिरते हुए पढ़ाते थे. जब राजनीति में चले गए तो अक्सर उनके भाषण सुनने मैं जाया करता था. एक अलग तरह का लगाव था. वे भी मुझे पहचान जाते, हाल-चाल पूछते. जो वादा कर देते उसे पूरा कर के ही मानते थे.''

रामस्वरूप कहते हैं, "मेरे भाई के देहांत के बाद भतीजे की सरकारी नौकरी अटकी हुई थी, इस सिलसिले में जब उनसे मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा, 'बच्चू अब तुम न आना, तुम्हारा काम हो जाएगा'.''

रामस्वरूप की बेटी बीना यादव इस बातचीत के दौरान वहीं मौजूद थीं. वे बताते हैं कि उनकी बेटी ने कल से कुछ खाया नहीं है.

BBC SPECIAL: क्या आपको पता है गांधी का धर्म क्या था?

नई पीढ़ी और नेताजी

बीना यादव

बीना यादव से हमने नेताजी के प्रति उनके लगाव की वजह जाननी चाही तो वे बोलीं, ''मैं जैन इंटर कॉलेज से पढ़ी हूं, जहां नेताजी शिक्षक रहे थे. उनके सहपाठी थे एक रामरूप जी, उन्होंने हमें हिंदी पढ़ाई है. वे क्लास में केवल नेताजी की बातें करते थें इसलिए बचपन से मेरा उनसे बेहद लगाव रहा. कल जब उनके देहांत की ख़बर पता चली तो मन दुखी हो गया.''

रामरूप ने नेताजी से जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा बीना यादव को सुनाया था, ''रामरूप जी ने एक बार हमें बताया था, नेताजी एक दिन कक्षा में ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिख रहे थे तभी कुछ बच्चों ने मिलकर उनकी कुर्सी खींच दी. नेताजी जब बैठने को आए तो नीचे गिर गए. इस बात पर बच्चों को डांटने फटकारने की बजाए नेताजी ख़ुद हंसने लगे.''

अयोध्या के टूटते-ढहते मंदिरों का सच - ग्राउंड रिपोर्ट

क्या पार्टी को होगा नुकसान?

मुलायम सिंह यादव के जाने पर पार्टी को कितना नुकसान होगा और क्या अखिलेश अपने पिता की तरह ही पार्टी और परिवार को एकजुट रख पाएंगे? इस सवाल पर हमें लोगों से काफ़ी बंटे हुए जवाब मिले.

ज़्यादातर लोगों का कहना था कि पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा, अखिलेश और सब मिलकर इसे आगे ले जाएंगे.

लेकिन कुछ लोगों का मानना था कि मुलायम सिंह जैसा कोई दूसरा नेता नहीं आएगा. अखिलेश पढ़े-लिखे हैं, राजनीति करने की उनकी शैली अलग है लेकिन नेताजी की जो समझ और लोगों पर जो पकड़ थी वो अखिलेश में नहीं है.

हालांकि सभी एक स्वर से इस बात को दोहराते हैं कि वो समाजवादी पार्टी को कभी बूढ़ा नहीं होने देंगे.

और फिर सुनाई देता है एक और नारा ''नेताजी के सपने अधूरे, भैयाजी करेंगे पूरे''.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+