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Mughal Queen Nur Jahan: बेहद शातिर थी यह मुगल रानी, सल्तनत पर राज करने के लिए बन गई थी अपनी ही बेटी की सास

Mughal Queen Nur Jahan: मुगल इतिहास में कई ताकतवर महिला किरदार रही हैं। इनमें से कुछ महिलाओं ने रनिवास से लेकर दरबार के फैसलों तक को प्रभावित किया है। अकबर की हिंदू पत्नी जोधाबाई हों या फिर जहांगीर की बेगम नूरजहां। नूरजहां मुगल इतिहास के सबसे दिलचस्प किरदारों में से एक हैं। बादशाह के खास सहयोगी की पत्नी रहीं नूरजहां ने पति की मौत के बाद जहांगीर से शादी की थी। अफगानिस्तान में पैदा हुई नूरजहां को रूप के साथ ही अपनी बुद्धिमत्ता और फैसले लेने की ताकत की वजह से भी जाना जाता है।

नूरजहां के बारे में इतिहासकारों की राय अलग है। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि वह एक फेमिनिस्ट किरदार थीं जबकि कुछ उन्हें शातिर रानी के तौर पर भी देखते हैं। नूरजहां मुगल बादशाह जहांगीर की बीसवीं और अंतिम पत्नी थीं। उनका असली नाम मेहरून्निसा था और बादशाह से शादी के बाद उन्हें नूरजहां नाम और ओहदा दिया गया।

Mughal Queen Nur Jahan

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Mughal Queen Nur Jahan: दिलचस्प थी इस मुगल रानी की जिंदगी

इतिहासकार रूबी लाल का कहना है कि नूरजहां के किरदार को आज के दौर में समझने की जरूरत है। वह सिर्फ खूबसूरत या जहांगीर की पसंदीदा रानी भर नहीं थी। सच्चे अर्थों में एक फेमिनिस्ट किरदार थीं। उन्हें शिकार करना आता था, वह महल के फैसलों में अपनी भागीदारी निभाती थीं। यहां तक कि जहांगीर के सभी अहम फैसले आखिरी दौर में नूरजहां की सहमति से ही होते थे। नूरजहां की ताकत का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, जब उन्होंने शादी के बाद अपना पहला शाही फरमान जारी किया था, तो उसमें लिखा था 'नूरजहां बादशाह बेगम!'

साल 1617 में चांदी के सिक्के जारी किए गए जिन पर जहांगीर के बगल में नूरजहां का नाम छपा था। इतिहासकार रूबी लाल की किताब एंप्रेस: द अस्टोनिशिंग रेन ऑफ़ नूरजहां में लिखा गया है कि साल 1617 में ही वह पहली बार शाही बरामदे के उस हिस्से में आईं थीं जो सिर्फ पुरुषों के लिए ही आरक्षित था।

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नूरजहां ने अपनी बेटी की शादी कराई थी जहांगीर के बेटे से

नूरजहां मुगल सल्तनत और दरबार में अपनी ताकत बनाए रखना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने अपनी पहली शादी से हुई बेटी लाडली बेगम की शादी शहजादा शहरयार से हुई थी, जो जहांगीर के बेटे थे। नूरजहां चाहती थी कि शहरयार को ही जहांगीर का उत्तराधिकारी बनाया जाए, लेकिन सत्ता संघर्ष में शाहजहां ने बाजी मार ली। जहांगीर की मौत के बाद नूरजहां का प्रभाव कम होता गया और अपनी जिंदगी के आखिरी दिन उन्होंने लाहौर में सादगी से बिताए। अपने आखिरी दिनों में वह साहित्य पढ़कर, कशीदाकारी कर और कविताएं लिख अपना समय बिताती थीं।

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