क्या स्टालिन बनेंगे मोदी सरकार के सीक्रेट पार्टनर? विजय सरकार पर नया खतरा! संसद में BJP खोज रही 360 का आंकड़ा
MK Stalin NDA support BJP: तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां चेन्नई की हलचल सीधे दिल्ली की सत्ता समीकरणों को प्रभावित करती दिख रही है। राज्य में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) की सत्ता जाने और टीवीके (TVK) प्रमुख थलपति विजय के मुख्यमंत्री बनने के बाद सिर्फ सरकार नहीं बदली, बल्कि राजनीतिक रिश्तों का पूरा नक्शा बदलता नजर आ रहा है।
सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब कांग्रेस ने डीएमके से दूरी बनाकर विजय सरकार के साथ जाने का फैसला किया। इस कदम ने डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन को राजनीतिक तौर पर अलग-थलग कर दिया। अब चर्चा इस बात की है कि क्या बीजेपी इसी मौके का फायदा उठाकर डीएमके को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के करीब लाने की तैयारी कर रही है? और अगर ऐसा हुआ तो क्या विजय सरकार की स्थिरता पर असर पड़ेगा?

🔷तमिलनाडु में सत्ता बदली, तो दिल्ली का खेल भी बदल गया (Tamil Nadu Power Shift)
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस बार समीकरण पूरी तरह बदल गए। टीवीके प्रमुख थलपति विजय के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़ दिया और विजय सरकार को समर्थन दे दिया।
कांग्रेस के इस फैसले को सिर्फ राज्य स्तर का राजनीतिक बदलाव मानना बड़ी भूल होगी। इसके असर सीधे संसद तक दिखाई दे रहे हैं। डीएमके ने नाराज होकर विपक्षी इंडिया ब्लॉक से दूरी बना ली और लोकसभा में कांग्रेस से अलग बैठने के लिए स्पीकर को पत्र तक भेज दिया।
यहीं से बीजेपी की रणनीति शुरू होती दिख रही है। पार्टी को लग रहा है कि डीएमके अब विपक्षी राजनीति में पहले जैसी आक्रामक भूमिका में नहीं है और यही मौका उसे संसद में अपने बड़े एजेंडे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
🔷BJP की नजर डीएमके के सांसदों पर क्यों? (Why BJP Needs DMK MPs)
सूत्रों के मुताबिक बीजेपी की असली दिलचस्पी तमिलनाडु की राज्य राजनीति से ज्यादा संसद के नंबर गेम में है। डीएमके के पास लोकसभा में 22 सांसद और राज्यसभा में 8 सांसद हैं।
अगर ये समर्थन सीधे या मुद्दों के आधार पर एनडीए को मिल जाता है, तो बीजेपी संसद में उस ताकत के बेहद करीब पहुंच सकती है जिसकी उसे लंबे समय से तलाश है यानी दो-तिहाई बहुमत।
दरअसल केंद्र सरकार के सामने आने वाले समय में कई ऐसे बड़े विधेयक और संवैधानिक बदलाव हैं, जिनके लिए सिर्फ साधारण बहुमत काफी नहीं होगा।
इनमें सबसे ज्यादा चर्चा इन मुद्दों की है:
- वन नेशन-वन इलेक्शन
- परिसीमन विधेयक
- महिला आरक्षण लागू करने से जुड़े संवैधानिक प्रावधान
- न्यायिक सुधार
- चुनावी सुधार
इन सभी मामलों में संविधान संशोधन की जरूरत पड़ सकती है और उसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है।

🔷दो-तिहाई बहुमत BJP के लिए इतना अहम क्यों?
लोकसभा में साधारण बहुमत से सरकार चल सकती है, लेकिन संविधान बदलने या बड़े ढांचागत सुधार लागू करने के लिए स्थिति अलग होती है। संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन चाहिए। कई मामलों में कुल सदस्य संख्या का बहुमत भी जरूरी होता है।
हाल के महीनों में परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर हुई चर्चाओं के दौरान बीजेपी को यह एहसास हुआ कि एनडीए के पास सरकार चलाने लायक संख्या तो है, लेकिन बड़े संवैधानिक बदलावों के लिए जरूरी 'मैजिक नंबर' अभी दूर है। यही वजह है कि बीजेपी अब उन दलों के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है, जो औपचारिक रूप से एनडीए में नहीं हैं, लेकिन मुद्दों के आधार पर समर्थन दे सकते हैं।
🔷क्या डीएमके NDA में शामिल होगी? (Will DMK Join NDA)
यही सबसे बड़ा सवाल है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डीएमके का सीधे एनडीए में शामिल होना आसान नहीं दिखता। इसकी सबसे बड़ी वजह डीएमके की वैचारिक राजनीति है। सनातन धर्म, हिंदी विरोध और केंद्र की कई नीतियों पर डीएमके लगातार बीजेपी के खिलाफ आक्रामक रही है। ऐसे में औपचारिक गठबंधन दोनों दलों के कोर वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकता है।
लेकिन राजनीति में 'स्थायी दुश्मन' जैसी कोई चीज नहीं होती। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में डीएमके एनडीए का हिस्सा रह चुकी है। इसलिए पूरी संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता। फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं, उनमें बीजेपी सीधे गठबंधन से ज्यादा "इश्यू बेस्ड सपोर्ट" के मॉडल पर काम करती दिख रही है। यानी डीएमके बाहर से कुछ अहम विधेयकों पर सरकार का समर्थन कर सकती है।
🔷विजय सरकार पर खतरा कितना बड़ा?
फिलहाल तमिलनाडु में विजय सरकार को तत्काल गिरने का खतरा नजर नहीं आता। कांग्रेस का समर्थन उसके साथ है और जनता में भी सत्ता परिवर्तन के बाद शुरुआती उत्साह बना हुआ है।
लेकिन असली चुनौती राजनीतिक स्थिरता से ज्यादा नैरेटिव की है। अगर डीएमके और बीजेपी के बीच किसी तरह की नजदीकी बढ़ती है, तो विजय सरकार पर दबाव बढ़ सकता है।
कारण साफ है। विजय की राजनीति खुद को "पुराने द्रविड़ बनाम नई राजनीति" के विकल्प के तौर पर पेश करती रही है। अगर डीएमके केंद्र की बीजेपी सरकार के करीब जाती है, तो तमिलनाडु की राजनीति में नए ध्रुवीकरण की शुरुआत हो सकती है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस भी लंबे समय तक विजय के साथ कितनी मजबूती से खड़ी रहेगी, यह देखने वाली बात होगी।
🔷बीजेपी का 'साउथ मिशन' अब नए चरण में?
बीजेपी लंबे समय से दक्षिण भारत में मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है। कर्नाटक और तेलंगाना में पार्टी ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, लेकिन तमिलनाडु अभी भी सबसे मुश्किल राजनीतिक जमीन माना जाता है।
ऐसे में अगर बीजेपी डीएमके जैसे बड़े द्रविड़ दल से किसी स्तर पर सहयोग हासिल कर लेती है, तो यह सिर्फ संसद की संख्या का खेल नहीं होगा, बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति में बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव भी माना जाएगा।
यही वजह है कि दिल्ली से लेकर चेन्नई तक हर राजनीतिक हलचल पर नजर रखी जा रही है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह सिर्फ रणनीतिक बातचीत है या भारतीय राजनीति में किसी बड़े पुनर्गठन की शुरुआत।















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