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#MentalHealth | 'माँ के डर, शक और दुनिया को भ्रम कहने वाली मैं कौन हूं'

दीपांजना सरकार
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एक रोज़ की बात है. रात के लगभग डेढ़ बज चुके थे. लेकिन काफ़ी समझाने-बुझाने और मिन्नतें करने के बाद भी मेरी माँ सोने का नाम नहीं ले रही थीं. वे दीवार पर पीठ टिकाकर चुप बैठी थीं. उनकी आँखें शून्य में देख रही थीं. एक तरह का ग़ुस्सा, शक और चिड़चिड़ाहट थी उनकी आँखों में. काफ़ी कोशिशों के बाद भी जब वह सोने के लिए तैयार नहीं हुईं तो मेरा सब्र का बांध टूट गया. माँ जिस कमरे में बैठी थीं मैं वहां से निकलकर दूसरे कमरे में गई और घंटों तक रोती रही. मुझे लगा कि अब तक तो माँ थककर सो चुकी होंगी. लेकिन मैं जब वापस गईं तो वो उसी स्थिति में बैठी थीं. उन्होंने ग़ुस्से में मेरी ओर देखकर कहा - तुम दूसरे कमरे में जाकर मेरे ख़िलाफ़ काला जादू कर रही थीं न...

ये मेरी कहानी है, प्यार की, मोहब्बत की, दर्द की और बेबसी की...

अगर मैं ठीक से याद करूं तो दिसंबर 2017 में पता चला कि मेरी माँ डिप्रेशन से जूझ रही हैं.

अविवाहित होने और उनके साथ रहते हुए उनकी देख-रेख करने की ज़िम्मेदारी मेरी ही थी.

इसकी शुरुआत कुछ इस तरह से हुई कि उनके बर्ताव से मुझे बहुत खीझ होती थी. उन्हें अपने आसपास हर घटना, हर चीज़, हर व्यक्ति पर शक होता था.

मेरी माँ बचपन में यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थीं. इस वजह से उनके लिए किसी पर भरोसा करना हमेशा से मुश्किल रहा था. लेकिन ये वो बात थी, जो उन्होंने मेरे साथ तब शेयर की, जब उनकी उम्र 74 बरस हो गई थी.

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बीमारी के दौरान उनकी दूसरों के प्रति अविश्वास की आदत और बढ़ गई. घर में हर वक़्त तनाव बना रहता था.

घर में कामवाली बाई की मौजूदगी से भी उन्हें परेशानी होती थी. डर लगता था. उन्होंने हमारे घर की उस कामवाली बाई पर भी यक़ीन करने से साफ़ इनकार कर दिया था जो बरसों से हमारे परिवार के साथ थीं. हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक माँ को क्या हो गया है.

उनकी बीमारी का पता चलने और फिर दिनों-दिन उनकी हालत बिगड़ने का तजुर्बा मेरे लिए हैरान करने वाला था.

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14 बरस पहले मेरे पिता के देहांत के बाद माँ की देख-रेख करने वाली मैं अकेली ही थी.

लेकिन, शारीरिक रूप से बीमार किसी इंसान और मानसिक परेशानी से जूझ रहे इंसान की देख-भाल में बहुत फ़र्क़ होता है. बीमारी की सूरत में ज़हनी हालत का बहुत असर होता है.

मानसिक बीमारी के शिकार किसी शख़्स की देख-रेख के दौरान कई जज़्बाती तजुर्बे होते हैं. कई बार बहुत डरावने और निराश करने वाले लम्हे भी आते हैं.

एक बार कुछ हुआ यूं कि मैं पूरे दिन काम करने के बाद बहुत थकी हुई थी. मेरी कमर में दर्द हो रहा था. उस दिन किसी तरह मुझे नींद आई. लेकिन रात में लगभग ढाई बजे मेरी माँ ने मुझे जगाकर कहा कि बेटा देखो, खिड़की पर कोई बैठा है. जब उन्होंने मुझे ये बताया तब मैं सो रही थी. दिमाग़ और मन तर्क गढ़ने की स्थिति में नहीं था. तो माँ से ये बात सुनकर मैं बुरी तरह डर गई.

ऐसी स्थिति में आप ख़ुद को बेबसी के दलदल में फँसा हुआ पाते हैं. आप को ग़ुस्सा भी आता है. आप को लगता है कि आप हार जाएंगे. कई बार आप ख़ुद को ही दोषी मानने लगते हैं.

डर, बेबसी और दुख

लेकिन, मानसिक बीमारी के शिकार किसी इंसान की देख-रेख के दौरान आप कई बार समर्पण, मोहब्बत, विशुद्ध हमदर्दी, ख़ुशी और तसल्ली के जज़्बातों से भी गुज़रते हैं.

मुझे ये स्वीकार करने में एक साल लग गया कि मेरी माँ अब पहले जैसी स्थिति में नहीं लौटेगी. मेरे लिए ये और भी हैरान करने वाली बात थी क्योंकि ख़ुद को ये बात समझाने के बाद से मेरे दिल से हिंसक जज़्बात बाहर हो गए.

इससे पहले मैं अपनी मां पर नाराज़ रहती थी. मैं सोचती थी कि, 'आख़िर कैसे मेरी माँ ख़ुद को ऐसे हालात में पहुंचा सकती है.'

चूंकि मैं और मेरी मां का मिज़ाज बिल्कुल अलग था.

हम दोनों में कई बातों पर बहुत फ़र्क़ था. और मैं ये सोच रही थी कि जिन विवादित बातों को मैं लंबे समय से नेपथ्य में डालती आई थी, वो मसले अब अनसुलझे ही रह जाएंगे, क्योंकि मेरी मां की मानसिक सेहत लगातार बिगड़ती ही जा रही थी.

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बीमारी के शुरुआती महीनों में हर सुबह उठने का मतलब होता था, दोधारी तलवार पर चलना. इसमें भयंकर अनिश्चितता होती थी. आगे क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता था. भारी झुंझलाहट होती थी.

कई बार तो मां उस घर को ही पहचानने से इनकार कर देती थीं, जिस में हम बरसों से रहते आए थे. कई महीनों तक तो ऐसा हुआ कि मेरी मां सारे कपड़े उतार कर पूरे घर में यूं ही घूमती रहती थी.

हम बार-बार कपड़े पहनाते थे और वो हज़ार बार उतार डालती थी. मेरे लिए ये देख-रेख करने से ज़्यादा एक बेटी का संघर्ष था.

बेटी होने का संघर्ष

हालांकि, मुझे कई लोगों ने कहा कि मुझे मां से ख़ुद को जज़्बाती तौर पर काट लेना चाहिए. लेकिन, कई बार आप के लिए ऐसा करना मुमकिन नहीं होता. आख़िर एक बेटी अपनी मां से भावनात्मक जुड़ाव कैसे ख़त्म कर सकती है. वो भी अगर मां ज़हनी तौर पर बीमार हो तो.

लेकिन, मेरे लिए उन्हें इस रूप में स्वीकार कर पाना मुश्किल हो रहा था. मैं उस वक़्त लाचारी में अक्सर चीख़ उठती थी, जब वो मेरे पिता को बड़ी शिद्दत से तलाशना शुरू कर देती थीं.

जबकि मेरे पिता की मौत तो 14 बरस पहले ही हो चुकी थी. मेरी मां, अपने पति यानी मेरे पिता की याद में बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रोती थी और मुझ से मिन्नतें करती थीं कि मैं उन्हें मेरे पिता और उनके पति के पास ले चलूं.

एक बार मैंने घर पर फ़ोन किया और फ़ोन पर उन्होंने मुझसे मिन्नतें करते हुए कहा कि बेटा तुमसे एक चीज़ मांगू, तुम दोगी क्या. इस पर मैंने कहा - हाँ, माँ कहो तो क्या चाहिए. इस पर उन्होंने कहा कि मुझे अपने पिता के पास ले चलो, मुझे समझ नहीं आ रहा है कि वो कहां चले गए हैं, उन्होंने खाना खाया भी होगा कि नहीं. मुझे प्लीज़ उनके पास ले चलो...

ऐसे लम्हों में मुझे समझ में नहीं आता था कि मैं क्या करूं और क्या कहूं.

मैं तब तक बुरी तरह लाचार महसूस करती थी, जब तक डिमेंशिया पर रिसर्च कर रहे एक शख़्स ने मुझे ऐसे हालात से निपटने का तरीक़ा बताया. उससे पहले मैं केवल अपनी मां के सो जाने की दुआएं मांगा करती थी. और ये उम्मीद लगाती थी कि कल का दिन नया होगा और वो पुरानी बातें याद नहीं रखेंगी.

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कई दिनों तक तो वो रात में जागती थीं और उन्हें दौरे जैसे पड़ जाते थे. वो दिन बहुत डरावने होते थे. लेकिन आख़िर में मैंने इन हालात से समझौता कर लिया. अक्सर मैं थक कर सो जाया करती थी.

मेरी मां एक कामकाजी महिला थीं और वो 22 साल पहले रिटायर हुई थीं. लेकिन अब ये बात उनके ज़हन से पूरी तरह मिट चुकी थी.

कई ऐसे दिन भी होते हैं कि वो दफ़्तर जाना चाहती हैं. और जब उन्हें बताया जाता कि वो तो लंबे समय पहले रिटायर हो गई थीं और उन्हें तो अब पेंशन मिल रही है, तो वो बहुत हिंसक हो जाती थीं.

मेरी मां को रोज़ाना नहलाना-धुलाना पड़ता था. क्योंकि वो एकदम भुलक्कड़ी हालत में रहती थीं. क्योंकि उनके ज़हन से ज़्यादातर पुरानी यादें मिट चुकी थीं.

धुंधली होती माँ की यादें

हालांकि, ये बहुत ही परेशानी भरी बात थी कि मां अब ज़्यादातर बातें भूलती जा रही थीं. लेकिन, अचानक ऐसा भी वक़्त आया कि मैं उनसे कोई उम्मीद लगाना ही छोड़ दिया.

अब यादें, मोहब्बत, उम्मीदें और निर्भरता, सब कुछ मेरे हाथ से निकलते जा रहे थे और मैं लाचार थी. कुछ भी कर पाने की हालत में नहीं थी. ये बहुत असहाय महसूस करने वाले लम्हे थे, जिन्हें समझाया नहीं जा सकता.

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लेकिन, मुझे ये भी महसूस हुआ कि इंसान के तौर पर हम कितने बौने और तुच्छ हैं. और इसीलिए आज ये ज़रूरी हो गया था कि हम धरातल पर ही रहें. एक साल से ज़्यादा वक़्त तक मेरी हालत ऐसी थी कि मैं या तो इस स्थिति से सोते हुए पार पाना चाहती थी. या फिर मैं इन सब मुश्किलों से दूर भाग जाना चाहती थी.

कई ऐसे दिन भी होते थे जब मैं रोती ही चली जाती थी और मेरा रोना रोके नहीं रुकता था. उस वक़्त मेरी मां ये सोचती थीं कि मैं अपने कमरे में कोई काला जादू कर रही होती हूं. लेकिन, सच तो ये था कि मैं शायद आराम करना चाहती थी, ताकि उनकी मानसिक परेशानी भरे लम्हों का सामना कर सकूं.

चुनौतियां और शिकायतें

इस में कोई दो राय नहीं कि किसी की देख-भाल करना बहुत मुश्किल है. लेकिन मैं इसे अपनी आध्यात्मिक जागरूकता का एक सफ़र तय करने जैसा मानती हूं.

इस तजुर्बे ने मुझे सिखाया कि कैसे कुछ शिकायतों को पीछे छोड़ देना चाहिए. मिले हुए मौक़ों ही नहीं चुनौतियों का भी सम्मान करना चाहिए और उन्हें स्वीकार करना चाहिए.

उन बातों को मंज़ूर कर लेना चाहिए, जो नियत हैं. ज़िंदगी के जितने भी रूप देखने को मिलें, उन से शिकवा करने के बजाय उनका मान रखना चाहिए. निराशा के समंदर में हम हर दिन खुद को खोकर बार-बार पाते हैं. हमें जब अहसास होता है कि हम क्यों निराश थे, क्यों बेबस थे तो हम अपने सामने खड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए एक बार फिर खुद को मजबूत पाते हैं. और इस तरह हम हर रोज़ बार बार जीवित होते हैं. हर एक अहसास एक पुनर्जन्म की तरह होता है.

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इस तजुर्बे ने मुझे ख़ामोशी की अहमियत का एहसास कराया. मुझे पता चला कि ख़ुद के साथ होना और उन के साथ होना क्या होता है, जो ख़ुद ही बहुत लाचार हो. ख़ुद को दोषी समझे कि उसने अपने कपड़े गंदे कर लिए हैं और इस बात का उस को ख़ुद ही अंदाज़ा नहीं है.

इस तजुर्बे ने मुझे इस ख़ूबसूरत एहसास से वाक़िफ़ कराया कि कैसे किसी की आंखों में प्यार से आंखे डाल कर देखते हैं और उसे ये भरोसा देते हैं कि कमज़ोर या किसी पर निर्भर होने में कोई बुराई नहीं है.

मैं ने शायद कभी भी ये अनुभव नहीं किया होगा कि केवल हाथ पकड़ कर मुस्कुरा देने से कितनी राहत मिलती है. हालांकि मैं महीनों तक ख़ुद को मुजरिम मानने के एहसास से गुज़री हूं,

जब भी मुझे ख्याल आया है कि इस सफ़र के दौरान मैंने हमेशा बहुत ख़ुशनुमा बर्ताव नहीं किया. लेकिन, मैं ख़ुद को दोषी मानने के उस दौर से बाहर आई, तो उसके लिए साहस और ताक़त मुझे इस अनुभव ने ही दी. मुझे अगर ऐसा तजुर्बा नहीं होता, तो मैं शायद कभी ये नहीं जान पाती कि उम्मीदों को त्याग कर किसी को बिना शर्त स्वीकार करना क्या होता है.

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ये ऐसी प्रक्रिया नहीं है, जो रातों-रात हो. और इसकी शायद यही बात सब से मुश्किल है. लेकिन, ये ख़ुद को आज़ाद करने का सबसे शानदार अनुभव भी है.

ये स्वीकार करना आसान नहीं है कि आप की मां शारीरिक तौर पर तो मौजूद हैं, लेकिन जज़्बाती और मानसिक तौर पर वो आप से दूर जा चुकी हैं.

जब माँ ने उठाई एक किताब

लेकिन, ये हक़ीक़त कि वो अभी भी शारीरिक तौर पर क़रीब हैं, बहुत राहत देती है. क्योंकि आपके पास थका देने वाले दिन के बाद घर लौटने पर उसके क़रीब आने का भरोसा तो होता है.

ख़ुशी वो है कि जब उन्हें ये याद हो कि मुझे मछली बहुत पसंद है और वो अपने हिस्से में से कुछ बचा कर मेरे लिए रखती हैं. ख़ुशी वो है जब मैं दफ़्तर से देर से आती हूं और ये देखती हूं कि वो साथ में खाना खाने के लिए मेरा इंतज़ार कर रही हैं.

और जब मैं जल्दी घर आ जाती हूं और मुझे देख कर मां मुस्कुराती हैं, तो उससे ख़ूबसूरत कोई और एहसास हो ही नहीं सकता. मैं कितना भी थकी क्यों न हूं, फिर भी मुझे काम करने की ताक़त मिलती है, जब मैं उनके लिए कोई ख़ास पसंदीदा डिश बनाती हूं और वो उसकी तारीफ़ करती हैं.

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मुझे उम्मीद जगती है, जब महीनों बाद मैं देखती हूं कि मां ने कोई किताब उठाई है और वो उसे पढ़ने की कोशिश करती हैं. या फिर पहले की तरह रोज़ शाम को टीवी देखने लगती हैं.

मैं इन दिनों तब बहुत ख़ुश हो जाती हूं जब वो किसी बात पर साफ़ तौर से अपनी नाख़ुशी का इज़हार करती हैं. ये बात कि वो अभी भी मज़बूती से अपनी बात कह सकती हैं, ख़ुशी देने के लिए पर्याप्त है.

घरेलू स्तर पर मां की देख-भाल करना मेरे अकेले का ही सफ़र रहा है. ये ऐसी लड़ाई थी, जो मैंने लड़ी, जिस में मैंने कई बार शिकस्त भी खाई, लाचारी भी महसूस की, ख़ुद को दोषी भी माना, खीझ भी हुई और कई बार तो मुझे समझ ही नहीं आता था कि मैं करूं तो आख़िर क्या करूं.

एक अलग दुनिया

हालांकि, मुझे अपने दोस्तों, मेरा भला चाहने वालों और ख़ुद को परिवार मानने वाले लोगों से काफ़ी सहयोग मिला. लेकिन, इस देख-भाल वाले तजुर्बे ने मुझे कई बातों का गहराई से एहसास कराया. मैं अगर इस सफ़र पर नहीं निकली होती तो शायद मैं ज़िंदगी के कई पहलुओं से अनजान ही रह जाती.

हालांकि, ये बेहद मुश्किल काम है कि आप जिस व्यक्ति का ख्याल रख रहे हों, उसके हिसाब से ख़ुद को ढालें. लेकिन, ये अनुभव आप को हौसला भी देता है, आप की तेज़ रफ़्तार को भी धीमा करता है. ये अनुभव आप को मौक़ा देता है कि आप ठहर कर कई ऐसी बातों पर ग़ौर करें, जिसकी आप आम तौर पर अनदेखी कर देते हैं.

मैंने ये सीखा कि ठहरना कितना अहम होता है. ये ऐसी चीज़ है जो हम अपनी भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में आम तौर पर नहीं करते. मुझे ये एहसास हुआ कि हमारे लिए ठहरना बहुत मुश्किल है क्योंकि हम सामाजिक रूप से इस के लिए ढले ही नहीं हैं.

शुरुआत में मां के पास रहना बहुत डरावना लगता था. ख़ास तौर से जब उन्हें दौरे पड़ते थे. लेकिन, तभी एक दिन मैं ने इस अनुभव के साथ क़दम ताल करने का फ़ैसला किया. मैं उनकी ख्याली दुनिया का हिस्सा बन गईं. आख़िर मैं होती कौन हूं उनकी दुनिया को ख्याली कहने वाली.

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देख-रेख करने के इस सफ़र ने मुझे अहसास कराया कि मैं कितनी बुरी तरह से ज़ख़्मी इंसान थी और मुझे ख़ुद को राहत देने की कितनी सख़्त ज़रूरत थी. और किसी को राहत तभी मिलती है, जब कोई उन ताज़ा ज़ख़्मों के साथ आगे बढ़ता है और उनका आंखों में आंखें डाल कर सामना करता है. हालांकि इसमें ख़ून बहता है. लेकिन, बहुत सारा ख़ून बह जाने के बाद ये ज़ख़्म भर भी जाते हैं.

मुझे लगता है कि मां की देख-भाल का ये सफ़र ज़िंदगी की तरफ़ से मुझे एक तोहफ़ा है, जिसका माध्यम मेरी मां बनीं. इससे मुझे जीवन के कई बेशक़ीमती सबक़ जो मिले. हो सकता है कि मैं थकी हूं.

लेकिन आज मैं निश्चित रूप से एक बेहतर इंसान हूं. जो ज़्यादा जागरूक है. जिसमें ज़्यादा सहनशक्ति है, ताक़त है, साहत है, चीज़ों को जस का तस स्वीकार करने की क्षमता है. जिस के अंदर दया है, हमदर्दी है. जिसको शिकायतें कम हैं. जो किसी के बारे में फौरन राय नहीं क़ायम करती और जिस में हिचक नहीं है.

अगर ये ज़िंदगी के इनाम माने जाते हैं, तो हां, ये सफ़र निश्चित रूप से बहुत फ़ायदेमंद और तसल्ली देने वाला रहा है. जहां मेरा दिल बार बार ख़ाली भी हुआ है और हर बार नई ऊर्जा और नई रोशनी से सराबोर भी हुआ है. ये ऐसा अनुभव था जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती.


(भारत में मानसिक सेहत एक ऐसा विषय है जिस पर खुलकर बात नहीं होती. बीबीसी की कोशिश लोगों को मेंटल हेल्थ के बारे में जागरुक करने की है. इस विशेष श्रृंखला में हम आपको सिलसिलेवार तरीके से बता रहे हैं कि आपको कब मेंटल हेल्थ के बारे में सोचने की ज़रूरत है. मिलिए कुछ ऐसे लोगों से जो अकेलेपन और डिप्रेशन या फिर अन्य किसी मानसिक बीमारी का शिकार रहे हैं या जिन्होंने अपने घर में मौजूद मानसिक रोगियों की देखभाल करते हुए डिप्रेशन आदि का सामना किया है. )

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

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