Meghalaya result: क्रिश्चियन-बहुल मेघालय में बीजेपी का बढ़ा जनाधार ?
Meghalaya election result 2023: मेघालय विधानसभा चुनाव के बाद यही कहा जा सकता है कि क्रिश्चियन बहुल राज्य में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ है, लेकिन बीजेपी उभर रही है

Meghalaya election result 2023: मेघालय विधानसभा चुनावों के नतीजों से लग रहे हैं कि एकबार फिर से भाजपा की समर्थन वाली नेशनल पीपुल्स पार्टी की सरकार बनने जा रही है। बीजेपी को पिछली विधानसभा के मुकाबले ज्यादा सीटें मिले हैं। जबकि वह पहली बार राज्य की सभी सीटों पर अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ रही थी। इसके ठीक विपरीत कांग्रेस जो पिछले चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, उसे काफी नुकसान हुआ है। एक क्रिश्चियन बहुल राज्य में बीजेपी के लिए यह बड़ी सफलता मानी जा सकती है। अलबत्ता वह दावा अपने दम पर सरकार बनाने की कर रही थी, जो चुनावी जुमलेबाजी साबित हुई है।

मेघालय में भाजपा के समर्थन वाली एनपीपी सरकार के आसार!
मेघालय विधानसभा चुनाव के लिए वोटों की गिनती होने से एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री कोनार्ड संगमा और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की बंद कमरे में हुई मुलाकात की खबरें क्रिश्चियन बहुल राज्य में दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के उभार की कहानी कह रही थी। बहुत सारे एग्जिट पोल ने पहले ही संकेत दिया था कि मेघालय में पिछली बार की तरह ही त्रिशंकु विधानसभा के आसार हैं। हालांकि, भाजपा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के दावे कर रही थी। लेकिन, उसे भी कहीं न कहीं अंदाजा था कि कम से कम इस चुनाव में ऐसा होना तो मुश्किल है। लेकिन, वोटों की गिनती के बाद संगमा और सरमा की मुलाकात के मतलब खुद निकलकर सामने आ रहे हैं। जानकारियां तो यहां तक हैं कि दोनों नेताओं ने दोनों पार्टियों के विधायकों से भी बहुमत का आंकड़ा नहीं पूरे होने पर बाकी विकल्पों पर भी विचार कर लिए हैं। अगर इन हालातों में देखें तो निश्चित तौर पर बीजेपी मेघालय में फिर से सत्ता में भागीदार बनती दिख रही है।

मेघालय में अकेले सभी सीटों पर लड़ी बीजेपी
भाजपा मेघालय में यह सातवां विधानसभा चुनाव लड़ रही है। 1993 के चुनाव में पार्टी पहली बार शामिल हुई थी। लेकिन, 2013 के चुनाव तक सीट और वोट शेयर के मामले में उसका प्रदर्शन कोई खास प्रभावी नहीं रहा। पार्टी ने सबसे ज्यादा 47 सीटों पर चुनाव 2018 के विधानसभा में चुनाव लड़ थे। पार्टी को ना सिर्फ 2 सीटें मिलीं, बल्कि 9.63% वोट भी हासिल हुए। पार्टी ने अपना आधार बढ़ाने के लिए इस बार सभी 59 (एक पर चुनाव नहीं हुआ है) सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और उसका प्रभाव नजर भी आ रहा है। इतनी सीटों पर चुनाव मैदान में होने के बावजूद पार्टी ने अपना वोट शेयर कायम रखा है।

भाजपा को अभी और लंबा रास्ता चलना है
मेघालय में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला बीजेपी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है। क्योंकि, ऐसे राज्य में जहां हमेशा से क्षेत्रीय दलों का प्रभाव ज्यादा रहा है, उसमें इस तरह का प्रदर्शन करके दिखाना काफी चुनौतीपूर्ण है। कांग्रेस का इस राज्य में कभी अच्छा प्रभाव था, लेकिन अब उसका संगठन काफी कमजोर हो चुका है। इसमें टीएमसी ने काफी नुकसान पहुंचाया है। यही वजह है कि भाजपा ने उस सत्ताधारी एनपीपी के साथ चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया, जिसके साथ वह पिछले पांच साल से गठबंधन में थी। भाजपा की तरह ही कांग्रेस ने भी अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। परंपरागत तौर पर कांग्रेस अकेली राष्ट्रीय पार्टी है, जो यहां क्षेत्रीय दलों से मुकाबला करती रही है। इस मोर्चे पर बीजेपी ने क्रिश्चियन बहुल राज्य में कांग्रेस के मुकाबले में राष्ट्रीय दल के रूप में इस चुनाव में खुद को पेश कर दिया है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना है।

सीएम संगम को भी भाजपा प्रत्याशी ने दिया टक्कर
प्रदेश में भाजपा के बढ़े हुए जनाधार का अंदाजा दक्षिण तुरा विधानसभा सीट से ही मिल जाता है। जहां बीजेपी के प्रत्याशी बेरनार्ड एन मारक ने मुख्यमंत्री कोनार्ड संगमा को कांटे की टक्कर दी है। इस सीट पर संगमा को पहले राउंड से ही बढ़त मिल गई थी, लेकिन बहुत ही मामूली। सबसे बड़ी बात की यहां मुकाबाला भाजपा और एनपीपी के बीच सीधा रहा है और कोई भी पार्टी बहुकोणीय चुनाव की स्थिति पैदा करने में असफल रही है। जबकि, चुनाव से पहले तक संगमा की सरकार को भाजपा का भी समर्थन था।
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कांग्रेस के घटते प्रभाव में भाजपा को बढ़त
2018 के विधानसभा चुनाव में मेघालय में भाजपा सिर्फ 2 सीटें जीती थी। जबकि, कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और उसे 21 सीटें मिली थी। एनपीपी तब दूसरे नंबर की पार्टी थी और उसे 19 सीटें मिली थीं। लेकिन, तृणमूल कांग्रेस ने पहले कांग्रेस के ज्यादातर विधायकों को अपने साथ जोड़ लिया और कांग्रेस के पास गिनती के विधायक बच गए। कांग्रेस का पूरा सफाया तो नहीं हुआ है, लेकिन पांच साल तक सरकार में रहने के बावजूद बीजेपी एक क्रिश्चियन बहुल राज्य में सभी सीटों पर लड़कर अपनी सीटें बढ़ाने में सफल रही। इसे कांग्रेस की भविष्य की राजनीति के लिए नुकसानदेह और भाजपा के लिए सकारात्मक माना जा सकता है।
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