Manipur Violence: यौन उत्पीड़न के बाद मरने के लिए छोड़ा, जानिए कैसे बची मणिपुर की दो महिलाओं की जान

Manipur News: मणिपुर में जातीय हिंसा के दौरान दो महिलाओं संग अमानवीय व्यवहार किया गया। उनको निर्वस्त्र सड़क पर घुमाया गया। इस वीडियो के बाद राज्य के हालात और खराब होते गए।

Manipur News: मणिपुर में जातीय हिंसा ने भयानक रूप तब लिया, जब हिंसक भीड़ ने कुकियों समुदाय की दो महिलाओं को निर्वस्त्र सड़क पर घुमाया। उसके बाद महिलाओं को धान के खेत में नग्न अवस्था में मरने के लिए छोड़ दिया गया। लेकिन, दोनों महिलाओं ने खुद को भाग्य के सहारे नहीं छोड़ा और न ही हार मानी।

अंधेरा होने पर दोनों जख्मी महिलाएं नग्नावस्था में धान के खेत से किसी तरह गांव की ओर वापस भागीं। लेकिन, गांव वीरान हो चुका था। ऐसे में महिलाओं की हिम्मत नहीं टूटी। उन्होंने जंगल में शरण ली। फिर एक आदिवासी गांव में 7 दिन गुजारे। 18 मई को पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई। आइए जानते हैं मणिपुर महिलाओं की आपबीती...

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दर्दनाक रात याद कर कांप जाती है रूह

पीड़ित 21 और 42 साल की दो महिलाओं के मुताबिक, 4 मई को, पैतृक गांव से भागते वक्त उनके रिश्तेदारों के साथ उन्हें हिंसक भीड़ ने पकड़ लिया। हमारे समूह को पास के धान के खेतों में खींच लिया गया। हालांकि, एक पुलिस यूनिट ने भीड़ को रोका और समूह को उपद्रवियों के हाथों से बचाया। लेकिन, राहत अल्पकालिक थी। क्योंकि एक बड़ी भीड़ ने सुरक्षा को भेदते हुए कुकियों को पुलिस से अपने कब्जे में ले लिया। यह सब नोंगपोक सेकमाई पुलिस स्टेशन से लगभग 2 किमी दूर स्थित टूबुल नाम के स्थान पर हुआ।

आंखों के सामने परिवार को मार डाला

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों महिलाओं ने बताया कि पुलिस यूनिट की नजरों से कुछ दूर ले जाने के बाद भीड़ ने उनसे कपड़े उतारने के लिए धमकाया। बीच-बचाव में आए पिता, भाई को उनकी आंखों के सामने ही पीट-पीट कर मार डाला गया। उनके सिर पर भी घातक वार किए गए। भीड़ ने पहले 21 साल की कॉलेज छात्रा का यौन उत्पीड़न किया गया। वहीं, दूसरी महिला को धान के खेतों में मरने के लिए छोड़ दिया गया।

अंधेरे की आड़ में जान बचाकर भागीं

पीड़िताओं के मुताबिक, दोनों महिलाओं ने खुद को भाग्य के हवाले नहीं छोड़ा। हार न मानते हुए अंधेरे को आड़ बनाकर धान के खेत से दोनों महिलाएं भागीं। सबसे पहले अपने गांव पहुंची। लेकिन, गांव वीरान हो चुका था। इसके बाद वे इरोंग गांव के लिए रवाना हो गए और अज्ञात रहने के लिए जंगल में शरण ली।

इंसाफ की लड़ाई के लिए जोखिम भरा सफर

रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे उन्हें अपने कुछ ऐसे लोगों से मिलने में मदद मिली, जो जिंदा रहने के लिए इसी रणनीति का इस्तेमाल कर रहे थे। 5 मई को, वे कुछ घंटों भटकने के बाद एक गांव में पहुंचे। लेकिन, उन्हें वह जगह भी सुनसान पड़ी मिली। इसी तरह एक और दिन बीत गया। उन्हें अचानक एक आदिवासी नागा तांगखुल गांव मिला। जिसे छोड़ दिया नहीं गया था। वे एक सप्ताह तक यहां रहे। 18 मई को पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई।

ग्राम प्रधान ने महिलाओं को पुलिस स्टेशन तक पहुंचने के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने के लिए इलाके के नागा और कुकी गांवों के साथ संपर्क स्थापित किया। लेकिन, तब तक यात्रा करना और पुलिस स्टेशनों तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो गया था। क्योंकि, इन क्षेत्रों में जातीय झड़पें पूरी तरह से युद्ध में तब्दील हो चुकी थी।

शिकायत के इंतजार में बैठी रही पुलिस

शिकायत दर्ज कराने के लिए सब कुछ जोखिम में डालने के बावजूद, एफआईआर पर कार्रवाई के लिए वीडियो पर देशव्यापी आक्रोश की आवश्यकता थी। पुलिस कथित तौर पर शिकायत के इंतजार में बैठी रही। वीडियो इंटरनेट पर आने तक कोई कार्रवाई नहीं की।


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