Manipur: मणिपुर सरकार के हाथ से निकल रहा है समय, घर पूरा करने में क्या हैं चुनौतियां? जानिए

समय हाथ से निकलता जा रहा है और मणिपुर सरकार के सामने 3,000 परिवारों के लिए प्रीफैब्रिकेड घरों की पहली खेप तैयार करके देने का काम बचा ही हुआ है। इन घरों में वे लोग रहेंगे, जो राज्य में 3 मई से शुरू हुई जातीय हिंसा की वजह से अपने ही घरों से विस्थापित होकर अस्थायी सरकारी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं।

मणिपुर पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड के सुप्रिटेंडिंग इंजीनियर पी ब्रोजेंद्रो ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा है, '5 अलग-अलग जगहों पर 26 जून के बाद से कंस्ट्रक्शन शुरू हुआ था और राज्य सरकार की पहल को जितनी जल्दी संभव हो पूरा करके देने के लिए हम समय के खिलाफ दौड़ लगा रहे हैं।'

manipur prefabricated houses for displaced

20 अगस्त की है डेडलाइन
उनके मुताबिक इम्फाल पूर्वी जिले में सजीवा जेल के पास 200 घरों का निर्माण पूरा होने वाला है। हर घर में दो रूम होंगे और एक टॉयलेट होगा। जबकि, एक कतार के 10 घरों पर एक कॉमन किचन होगा। इन प्रीफैब्रिकेड घरों को तैयार करने की डेडलाइन 20 अगस्त है, इसलिए करीब 160 मजदूर पूरे जी-जान से जुटे हुए हैं।

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घरों के निर्माण में खड़ी हुई हैं कई चुनौतियां
उन्होंने कहा, 'इन घरों को तैयार करने में दीवारों के लिए पफ पैनल, खिड़कियों के लिए पाउडर-कोटेड एल्यूमीनियम फ्रेम और छतों के लिए पहले से पेंट की हुई सीआई शीट का इस्तेमाल किया जा रहा है।' उनके अनुसार, 'इन चीजों को मणिपुर तक लाने की सबसे बड़ी चुनौती लैंडलॉक्ड प्रदेश के हाइवे पर नाकेबंदी रही।' घर बनाने में असेंब्लिंग के काम के लिए मजदूरों को विमान से लाया गया, जबकि फाउंडेशन का काम स्थानीय श्रमिकों से कराया गया है।

इसी तरह थौबल जिले में यैथिबी लौकोल इलाके में कम से कम 400 परिवारों के लिए और बिष्णुपुर जिले के क्वाक्टा में अलग से 120 प्रीफैब्रिकेड घरों का निर्माण हो रहा है। वहीं इम्फाल पश्चिम के सेकमाई और इम्फाल पूर्वी के सॉओम्बुंग में भी ऐसे ही घर बनवाए जा रहे हैं।

क्वाक्टा में फायरिंग की घटनाओं के चलते मुश्किल
एक और वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 'खास करके क्वाक्टा में इन घरों को तैयार करने के काम को इसलिए झटका लगा है, क्योंकि अज्ञात लोगों और राज्य पुलिस के बीच लगातार फायरिंग होती रही है।' उन्होंने कहा कि 'पहाड़ी क्षेत्रों में जो कानून और व्यवस्था की मौजूदा स्थिति है, उसके चलते वहां प्रोजेक्ट को पूरा कर पाना बहुमत ही मुश्किल साबित हुआ है।'

अपने पुराने घरों में लौटना चाहते हैं कई लोग
वैसे अपने ही प्रदेश में विस्थापित होने को मजबूर हुए लोग घरों के निर्माण को तो अच्छा कदम बता रहे हैं, लेकिन उनकी असल ख्वाहिश उनके अपने घरों में ही लौटने की है, जहां से उन्हें दंगों की वजह से सबकुछ छोड़कर भागना पड़ा था।

मसलन, इम्फाल पूर्वी जिले की एक राहत शिविर में रहने वाले किशोरजीत पी ने कहा, 'मैं प्रीफैब्रिकेड घर में नहीं शिफ्ट करूंगा। मैं वापस चुराचंदपुर लौटना चाहता हूं, जहां से हमें भागना पड़ा था। सही है कि उचित सुरक्षा का इंतजाम करना होगा। मेरा जन्म और पालन पोषण चुराचंदपुर में हुआ और मुझे अपने पैतृक स्थान से एक भावनात्मक लगाव है।'

'नए जीवन के लिए कहीं से तो शुरू करना पड़ेगा'
हालांकि रंजीता एस नाम की एक और पीड़िता नए घर में जाने के इंतजार में बैठी हैं। वो कहती हैं, 'हमेशा के लिए राहत कैंपों में नहीं रह सकते। कहीं न कहीं से तो हमें फिर से शुरू करना होगा। नए जीवन के लिए ये प्रीफैब्रिकेड घर पहला कदम होंगे।'

क्यों शुरू हुई मणिपुर में हिंसा?
मणिपुर में 3 मई को पहाड़ी जिलों में मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने के विरोध में 'आदिवासी एकजुटता मार्च' के आयोजन किया गया था। इसके बाद भड़की हिंसा के बाद से अबतक 160 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। इस हिंसा की वजह से अनेकों लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा है और उनमें से कई तो पड़ोसी राज्यों में भी अस्थायी तौर पर रह रहे हैं। उनके घरों को तबाह किया जा चुका है।

मणिपुर में मैतेई समुदाय की आबादी करीब 53% है, जो कि मुख्य तौर पर इम्फाल घाटी में रहते हैं। जबकि, नागा और कुकी आदिवासी समुदाय के हैं, जिनकी कुल आबाद 40% से कुछ अधिक है और ये पहाड़ी जिलों में रहते हैं।

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