1857 के विद्रोह की पहली गोली चलाई थी मंगल पांडे ने : विवेचना
19वीं सदी के मध्य में कलकत्ता से 16 मील दूर बैरकपुर एक शाँत सैनिक छावनी हुआ करती थी. पूर्वी भारत में सबसे अधिक भारतीय सैनिक यहीं पर तैनात थे और अंग्रेज़ गवर्नर जनरल का निवास स्थान भी यहीं था. 1857 की शुरुआत में कोई ये कल्पना भी नहीं कर सकता था इस छावनी से ही अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह का पहला बिगुल बजाया जाएगा.
29 मार्च, 1857 को रविवार था. लेकिन रविवार की दोपहर की शाँति को भंग किया था एक सैनिक मंगल पांडे ने.
मशहूर इतिहासकार रुद्रांशु मुखर्जी अपनी किताब 'डेटलाइन 1857 रिवोल्ट अगेंस्ट द राज' में लिखते हैं, 'उस समय मंगल पांडे ने अपनी रेजिमेंट का कोट तो पहन रखा था लेकिन पतलून की जगह उन्होंने धोती पहनी हुई थी. वो नंगे पैर थे और उनके पास एक भरी हुई बंदूक थी. उन्होंने चिल्ला कर वहाँ पहुंच चुके सैनिकों को बहन की गाली देते हुए कहा, फिरंगी यहाँ पर हैं. तुम तैयार क्यों नहीं हो रहे हो? इन गोलियों को काटने भर से हम धर्मभृष्ट हो जाएंगे. धर्म के ख़ातिर उठ खड़े हो. तुमने मुझे ये सब करने के लिए उकसा तो दिया लेकिन अब तुम मेरा साथ नहीं दे रहे हो.'
नई रायफ़ल के कारतूस बने विद्रोह की वजह
मंगल पांडे के बगावती तेवर की वजह थी अंग्रेज़ सेना में इनफ़ील्ड पी - 53 रायफ़लों में इस्तेमाल की जाने वाली गोलियाँ. 1856 से पहले भारतीय सिपाही ब्राउन बीज़ नाम की बंदूक का इस्तेमाल करते थे.
1856 में भारतीय सैनिकों के इस्तेमाल के लिए एक नई बंदूक लाई गई लेकिन इस बंदूक को लोड करने से पहले कारतूस को दाँत से काटना पड़ता था.
भारतीय सिपाहियों के बीच ये अफवाह फैल गई कि इन राइफ़लों में इस्तेमाल किए जाने वाले कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी का इस्तेमाल किया गया है. सिपाहियों का मानना था कि इससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं.
भारतीय सैनिकों के बीच ये आम राय भी बन गई थी कि अंग्रेज़ो ने ऐसा जानबूझ कर भारतीय सैनिकों को नीचा दिखाने के लिए किया है. इसके पीछे एक कहानी और भी थी.
लेफ़्टिनेंट जे ए राइट ने मंगल पांडे के मुकदमे में गवाही देते हुए इसका ज़िक्र किया था, 'एक बार एक निम्न जाति के खलासी ने एक ब्राह्मण सिपाही के लोटे से पानी पीने की इच्छा प्रकट की. उस सिपाही ने ये कहते हुए उसे पानी पिलवाने से इंकार कर दिया कि इससे उसका लोटा दूषित हो जाएगा. इस पर उस निम्न जाति के व्यक्ति ने जवाब दिया, जल्द ही तुम्हारी जाति का अस्तित्व ही नहीं रहेगा क्योंकि तुम्हें सुअर और गाय की चर्बी से बने कारतूसों को काटना पड़ेगा. जल्द ही ये ख़बर आग की तरह फैल गई कि सरकार उनकी जाति और धर्म को भृष्ट करने पर आमादा है.'
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सिपाहियों ने नए कारतूसों का इस्तेमाल करने से किया इंकार
2 फ़रवरी, 1857 को बैरकपुर में शाम की परेड के दौरान सेकेंड नेटिव इंफैंट्री के सिपाहियों ने इनफ़ील्ड राइफ़लों में इस्तेमाल के जा रहे कारतूसों के प्रति अपनी असहमति दिखाई.
गोरे अफ़सरों के प्रति वफ़ादार सैनिकों ने इसकी मुख़बरी करते हुए उन्हें ख़बर दी कि भारतीय सैनिक रात में मिलकर अंग्रेज़ अफ़सरों को मारने की योजना बना रहे हैं. सबसे गंभीर विरोध बुरहानपुर में तैनात 19 नेटिव इंफ़ेंट्री के सैनिकों की तरफ़ से आया.
जब उन्होंने नए कारतूसों का इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया तो उनके विरोध पर काबू करने के लिए अंग्रेज़ों को अपने तोपख़ाने को बुलवाना पड़ा.
उन्हीं दिनों इन सैनिकों ने बैरकपुर में एक टैलिग्राफ़ दफ़्तर को जला दिया और अंग्रेज़ अफ़सरों के घरों पर आग लगे तीर छोड़े गए.
जे डब्लू के ने अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ द सिपॉय वॉर' में लिखा, 'शायद इसका संबंध उस ज़माने में बहुप्रचलित इस अफवाह से भी था कि प्लासी की लड़ाई के सौ साल बाद यानि 1857 में भारत में ब्रिटिश राज का अंत हो जाएगा.'
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मंगल पाँडे ने लेफ़्टिनेंट बो पर पहली गोली चलाई
मंगल पांडे 22 वर्ष की आयु में 1949 में ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल की सेना में शामिल हुए थे. 15 से 27 मार्च के बीच मंगल पांडे ने लगातार हनुमान और शिव की अर्चना की.
29 मार्च को शाम 5 बज कर 10 मिनट पर जैसे ही मंगल पांडे ने हंगामा शुरू किया परेड ग्राउंड पर लेफ़्टिनेंट बी एच बो पहुंच गए.
मंगल पांडे ने देखते ही उन पर गोली चलाई जो उनके घोड़े के पैर पर लगी. घोड़ा गिर गया और धराशाई बो ने खड़े होते हुए मंगल पांडे पर गोली चलाई जो उन्हें नहीं लगी. बो के पीछे सार्जेंट मेजर हिउसन भी आ गए.
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पीजीओ टेलर ने अपनी किताब 'वाट रियली हैपेन्ड ड्यूरिंग द म्यूटिनी' में लिखा, 'हालात देखते हुए हिउसन और बो दोनों ने अपनी अपनी तलवारें निकाल लीं. उनके पास तलवारों के अलावा उनकी पिस्टल भी थीं. मंगल पांडे ने बो और हिउसन दोनों पर अपनी तलवार से हमला किया. वहाँ मौजूद सभी भारतीय सैनिक ये तमाशा देखते रहे उनमें से कोई भी अंग्रेज़ अफ़सरों की मदद के लिए नहीं आया सिवाए शेख़ पलटू के. उसने मंगल पाँडे की कमर को पीछे से पकड़ लिया.' नतीजा ये हुआ कि दोनों अंग्रेज़ अफ़सर बच निकलने में कामयाब हो गए.
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भारतीय सिपाहियों ने भी अंग्रेज़ अफ़सर को धक्का दिया
बाद में हिउसन ने गवाही देते हुए कहा, 'मंगल पाँडे का वार पूरे ज़ोर से मेरे ऊपर नहीं पड़ा. नतीजा ये हुआ कि मुझे एक खरोंच भर आई. मंगल के सीधे हमले का निशाना बने लेफ़्टिनेंट बो. उनकी जैकेट ख़ून से सनी हुई थी. लेकिन इस बीच एक सिपाही ने आगे बढ़कर मेरी पीठ पर बंदूक से एक या दो प्रहार किए जिससे मैं नीचे गिर गया.
मैं उस सैनिक को पहचान नहीं पाया लेकिन मैं देख सकता था कि उसने रेजिमेंट की वर्दी पहनी हुई थी. गिर कर उठने के साथ ही मैंने अपने बांए हाथ से मंगल के कोट का कॉलर पकड़ लिया. मैंने अपनी तलवार से उस पर कई प्रहार किए. उसने भी मुझ पर तलवार चलाई और मैं घायल होकर फिर नीचे गिर गया. मंगल ने अपने बांए हाथ का इस्तेमाल हमें धक्का देने और दाहिने हाथ का इस्तेमाल हम पर प्रहार करने के लिए किया.'
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मंगल पाँडे ने खुद को गोली मारी
इतने में घटनास्थल पर 34 नेटिव इंफ़ेंट्री के कमांडिंग अफ़सर कर्नल एस जी वेलर भी पहुंच गए. उन्होंने वहाँ मौजूद सैनिकों से मंगल पाँडे को गिरफ़्तार करने के लिए कहा लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया.
रुद्रांशु मुखर्जी लिखते हैं, 'बाद में वेलर ने गवाही देते हुए कहा कि मैं अपने आप को मजबूर महसूस कर रहा था. उसी समय डिवीजन के कमांडिंग अफ़सर मेजर जनरल हियरसे भी अपने दोनों बेटों के साथ वहाँ पहुंच गए. जब हियरसे मंगल पांडे की तरफ़ बढ़ रहे थे तो किसी ने चिल्ला कर कहा, उसके पास भरी हुई बंदूक है. जब उनके बड़े बेटे ने उन्हें आगाह किया कि वो आप पर निशाना साध रहा है, हियरसे ने कहा, जॉन अगर मैं मर जाउं तो तुम आगे बढ़ कर उस शख़्स को ख़त्म कर देना.'
इस बीच हियरसे क्वार्टर गार्ड पर अपनी पिस्टल लहराते हुए पहुंचे और उन्होंने उन्हें आदेश दिया, मेरी बात सुनो. अगर मेरे आदेश पर किसी सैनिक ने मार्च नहीं किया तो मैं उसे उसी समय गोली से उड़ा दूँगा. इस बार उनके हुक्म का उल्लंघन नहीं हुआ लेकिन जैसे ही सब सैनिक मंगल पांडे की तरफ़ बढ़े उन्होंने अपनी बंदूक की नाल अपने सीने की तरफ़ कर अपने पैर की उंगली से बंदूक का घोड़ा दबा दिया.
गोली उनके सीने, कंधे और गर्दन को घायल करती हुई निकल गई और उनके कोट में आग लग गई. मंगल पेट के बल नीचे गिरे. एक सिख सैनिक ने उनके शरीर के नीचे से उनकी रक्तरंजित तलवार निकाली. मंगल को तुरंत गिरफ़्तार कर अस्पताल भेज दिया गया.
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शेख़ पलटू की पदोन्नति
शेख़ पलटू ने मंगल को पीछे से पकड़ तो लिया था लेकिन वो उनका हाथ पकड़ने में नाकामयाब रहा. एक बार जब उसने ऐसा करने की कोशिश की तो मंगल ने अपनी कोहनी से उसे चोट पहुंचाई.
मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल शुरू होने से पहले ही पलटू की पदोन्नति कर दी गई.
मुक़दमे के दौरान मंगल पाँडे ने स्वीकार किया कि इस पूरे मामले में उनका कोई साथी नहीं था.
इस सवाल पर कि क्या आप गोली चलाते समय नशे में थे मंगल ने कहा कि वो पिछले कुछ समय से भाँग और अफ़ीम का सेवन करते रहे हैं.
उन्होंने कहा, 'मुझे पता नहीं कि मैंने किसको मारा है और किसको नहीं.'
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मंगल पांडे को दी गई फाँसी
उस ज़माने में गोरे अफ़सर पर हमला करना एक तरह से अपनी मौत के वॉरंट पर दस्तख़त करना था.
सिपाही नंबर 1446 मंगल पांडे को इसके लिए मौत की सज़ा सुनाई गई और 8 अप्रैल, 1857 को सुबह साढ़े पाँच बजे उनके सैनिक साथियों के सामने उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया. किसी भी अंग्रेज़ अफ़सर से उसके आचरण के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा गया.
पहले मंगल की फाँसी की तारीख़ 18 अप्रैल निर्धारित की गई थी लेकिन अंग्रेज़ो को लगा कि कहीं ये विद्रोह दूसरे इलाकों में न फैल जाए इसलिए उन्होंने मंगल को दस दिन पहले ही फाँसी पर लटका दिया. 1857 के विद्रोह में जान देने वाले मंगल पांडे पहले भारतीय थे.
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जमादार ईश्वरी प्रसाद भी लटकाए गए फाँसी पर
रुद्रांशु मुखर्जी लिखते हैं, 'अगर इसके पीछे कोई षडयंत्र न भी हो, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि शेख़ पलटू के अलावा कोई भी भारतीय सैनिक अंग्रेज़ अफ़सरों की मदद और मंगल पांडे को रोकने के लिए आगे नहीं आया, जबकि उस समय करीब 400 सैनिक इस घटना को प्रत्यक्ष रूप से देख रहे थे.
जब सार्जेंट मेजर ने वहाँ मौजूद जमादार ईश्वरी प्रसाद से पूछा कि मंगल को अब तक क्यों नहीं गिरफ़्तार किया गया है, उसका जवाब था, मैं क्या कर सकता हूँ मैं लाचार था. उनके इस कथन के कई अर्थ लगाए जा सकते हैं. नंबर एक कि वो भी इस योजना में मिले हुए थे. दूसरे वो चाहते थे कि सभी गोरे अफ़सर घटनास्थल पर पहुंच जाएं और तीसरे उन्हें पता था कि मंगल पांडे को बाकी सैनिकों का समर्थन मिला हुआ था और उन पर नियंत्रण पाना आसान नहीं होगा. अंग्रेज़ो ने उनकी लाचार होने की दलील को नहीं माना और उन्हें भी 21 अप्रैल, 1857 को फाँसी पर चढ़ा दिया गया.'
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मंगल पांडे को साथी सैनिकों का समर्थन
इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि मंगल पांडे को वहाँ मौजूद भारतीय सैनिकों का समर्थन हासिल था. वहाँ बड़ी संख्या में सैनिक मौजूद थे, लेकिन उनमें से कोई भी अनुशासन बनाए रखने के नाम पर अंग्रेज़ों की मदद के लिए नहीं आगे आया.
अमरेश मिश्रा अपनी किताब 'मंगल पाँडे द ट्रू स्टोरी ऑफ़ एन इंडियन रिवोल्यूशनरी' में लिखते हैं, 'भारतीय सैनिकों ने खुलेआम विद्रोह भले ही न किया हो लेकिन उनकी सामूहिक निष्क्रियता बताती है कि वो विरोध और अवज्ञा का मूड बना चुके थे. उनके इस काम का यही मतलब निकाला जा सकता है कि मंगल पांडे जो कुछ भी कर रहे थे, उन्हें उनका पूरा समर्थन प्राप्त था. जब हियरसे ने उनसे पूछा कि क्या तुम भरी हुई बंदूक से डर रहे हो तो वो सभी चुप रहे. ये भी नहीं भूलना चाहिए कि एक अज्ञात सैनिक ने हिउसन पर अपनी बंदूक की बट से प्रहार किया था.'
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एक महीने बाद असहमति और नफ़रत की ये भंगिमा उत्तर भारत की कई सैनिक छावनियों में विद्रोह के रूप में परिलक्षित हुई और अंग्रेज़ सैनिकों ने विद्रोही सिपाहियों को मंगल पांडे के जाति नाम 'पैंडीज़' से संबोधित करना शुरू कर दिया.
मंगल पांडे की मौत पर कलकत्ता से पटना और पूरे गंगा के दौआबे में शोक मनाया गया.
10 मई में मेरठ में विद्रोह के बाद मंगल पांडे के दोस्त नकी अली ने उनकी अस्थियाँ उनके गाँव जाकर उनकी माँ को सौंपीं.
बाद में जब मंगल पांडे की 34 वीं रेजिमेंट को सामूहिक सज़ा के तौर पर अप्रैल, 1857 में भंग किया गया तो उसके सभी सैनिकों ने परेड ग्राउंड से निकलने से पहले विरोधस्वरूप अपनी टोपियों को ज़मीन पर फेंक कर उन्हें कुचल दिया.
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