हैसियत कम होने के बाद भी भाजपा में क्यों जमे हुए हैं मेनका और वरुण ?

नई दिल्ली, 13 अक्टूबर। लखीमपुर खीरी कांड ने भाजपा की राह में कांटे बिछा दिये हैं। इस बीच सांसद वरुण गांधी के बयान ने भाजपा के जख्मों पर नमक छिड़क दिया है। वरुण गांधी के बयान के बाद यह सवाल पूछा जा रहा कि वो कौन है जो इस घटना को हिंदू-सिख रंग देने की कोशिश कर रहा है ? क्या वरुण गांधी अपनी पार्टी (भाजपा) की जड़ खोदने में लगे हैं ?

Maneka Gandhi and Varun Gandhi like to be in BJP or not

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    पिछले कुछ समय से उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ मजबूत मोर्चा खोल रखा है। जब 2004 में वे भाजपा में शामिल हुए थे तब उन्होंने कहा था, "हर सही सोच रखने वाले भारतीय को उस पार्टी (भाजपा) को मजबूत करना चाहिए जिसने देश को आगे बढ़ाया है।" अब ऐसा क्या हो गया कि भाजपा उन्हें रास नहीं आ रही ? उनकी मां मेनका गांधी मोदी-1 सरकार में मंत्री थीं। इस बार उनका पत्ता कट गया। अब भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति से मेनका गांधी और वरुण गांधी बाहर कर दिया गया। मेनका गांधी जहां बचाव की मुद्रा में हैं वहीं वरुण गांधी आक्रामक रुख अख्तियार किये हुए हैं।

    मेनका गांधी ने क्यों कहा, वे भाजपा में रह कर भी खुश

    मेनका गांधी ने क्यों कहा, वे भाजपा में रह कर भी खुश

    भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिते से हटाये जाने के बाद मेनका गांधी ने कहा है, "किसी लिस्ट से बाहर होने का मतलब उसका कद कम होना नहीं है। मैं करीब बीस साल से भाजपा में हूं। भाजपा में रह कर ही मैं खुश हूं।" तमाम असहमतियों के बाद भी मेनका गांधी और वरुण गांधी भाजपा में हैं। अहमियत नहीं मिलने के बाद भी वे दोनों क्यों भाजपा में जमे हुए हैं ? 1980 का दौर देख चुके कुछ कांग्रेस नेताओं का कहना है, "जिन अपमानजनक परिस्थितियों में इंदिरा गांधी ने मेनका को अपने घर से निकाला था उसके सदमे से वे शायद ही कभी मुक्त हो सकें। चूंकि उनकी विरासत पर सोनिया गांधी ने कब्जा जमा लिया। इसलिए सोनिया गांधी का राजनीतिक पतन ही उनकी सबसे बड़ी तमन्ना है। मेनका उसी दल को अपने लिए मुनासिब मानती हैं जो सोनिया को सत्ता से दूर रख सके। 1988 में जब राजीव गांधी को सत्ता से बेदखल करने की राजनीतिक परिस्थितियां तैयार होने लगीं तो वे जनता दल में शामिल हो गयीं। जब भाजपा सोनिया गांधी को चुनौती देने की स्थिति में आ गयी तो उन्होंने भाजपा का दामन (2004) थाम लिया। वे अपने मकसद की राजनीति करती हैं किसी दल के लिए नहीं।"

    राजनीतिक महत्वाकांक्षा से शुरू हुई थी अनबन

    राजनीतिक महत्वाकांक्षा से शुरू हुई थी अनबन

    संजय गांधी से विवाह के बाद ही मेनका गांधी के मन में राजनीतिक महत्वाकांक्षा पनपने लगी थी। 1977 में हार के बाद मेनका ने अपनी पत्रिका सूर्या के माध्यम से कांग्रेस के लिए राजनीतिक लड़ाई लड़ी। कहा जाता है कि मेनका गांधी की मां अमतेश्वर आनंद ने उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को काफी बढ़ावा दिया जिसे इंदिरा गांधी बिल्कुल पसंद नहीं करती थीं। 1980 में सांसद बनने के छह महीने बाद ही संजय गांधी की विमान हादसे में मौत हो गयी थी। इस सदमे से मेनका गांधी के जीवन में उथल पुथल मच गयी। संजय गांधी की जगह राजीव गांधी को दे दी गयी थी। मेनका सिर्फ 23 साल की थीं और वैधव्य की पीड़ा झेल रहीं थीं। वरुण तब सिर्फ तीन महीने के थे। मेनका संजय गांधी की विरासत संभालना चाहती थीं। इस बात को लेकर मेनका और इंदिरा गांधी में अनबन शुरू हो गयी। संजय गांधी के निधन के बाद 1981 में अमेठी उपचुनाव हुआ। इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी को मैदान में उतार दिया। कहा जाता है कि इस बात से खफा मेनका तब राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी लोकसभा का उपचुनाव लड़ना चाहती थीं। लेकिन उम्र सीमा की शर्त पूरा नहीं कर पाने की वजह से वे चुनाव नहीं लड़ सकीं। उस समय उनकी उम्र 24 साल ही थी।

    अपमान की आग

    अपमान की आग

    कई कारणों से इंदिरा गांधी मेनका को नापसंद करती थीं। लेकिन सास-बहू का झगड़ा एक दायरे में था। बात तब बिगड़नी शुरू हो गयी जब मेनका संजय विचार मंच संगठन के जरिये सामाजिक कार्यों में सक्रिय़ हो गयीं। मेनका गांधी ने संजय गांधी के राजनीतिक विचारों के प्रचार प्रसार के लिए 1982 में यह संगठन बनाया था । यह कोई राजनीतिक दल नहीं था। फिर भी मेनका गांधी की सक्रियता ने इंदिरा गांधी के मन में संदेह के बीज बो दिये। इंदिरा गांधी को ये अंदेशा होने लगा कि मेनका संजय गांधी का नाम लेकर उनकी राजनीति को कमजोर करना चाहती हैं। इसके बाद इंदिरा गांधी के इशारे पर कई लोग मेनका पर नजर रखने लगे। कहा जाता है कि इनमें राजीव गांधी भी एक थे। मार्च 1982 में इंदिरा गांधी विदेश दौर पर लंदन गयीं थीं। इस बीच मेनका गांधी ने संजय विचार मंच का उद्गाटन समारोह आयोजित किया। इस मौके पर उन्होंने भाषण भी दिया। कहा जाता है कि राजीव गांधी ने मेनका के भाषण के मजमून को टेलीग्राम के जरिये इंदिरा गांधी के पास लंदन भेज दिया। टेलीग्राम पढ़ कर इंदिरा गांधी आगबबूला हो गयीं। 28 मार्च 1982 को जब वे दिल्ली लौंटी तो प्रधानमंत्री निवास की फिंजा बदल चुकी थीं। इंदिरा गांधी ने मेनका को भलाबुरा कहा। उन्होंने लंदन जाने के पहले ही मेनका को कह दिया था कि संजय विचार मंच का कार्यक्रम किसी भी हाल में नहीं होना चाहिए। लेकिन मेनका ने उनकी बात को अनसुना कर दिया था।

    भाजपा में बने रहने की वजह

    भाजपा में बने रहने की वजह

    अपनी बात की अवहेलना से इंदिरा गांधी आपे से बाहर हो गयीं। वे जोर जोर से चिल्लाने लगीं और मेनका गांधी पर बरस पड़ीं। उन्होंने मेनका को प्रधानमंत्री निवास से तुरंत बाहर निकल जाने का आदेश दिया। सास-बहू की इस लड़ाई में अपशब्दों का भी इस्तेमाल हुआ। प्रधानमंत्री निवास पर मौजूद कई लोगों ने यह गाली गलौज सुनी। इंदिरा गांधी इतने आक्रोश में थीं कि वे मेनका को गेटआउट ! गेटआउट ! कहते कहते नंगे पांव ही गेट तक दौड़ती चली आयीं। अपमान के कड़वे घूंट पी कर आखिरकार मेनका गांधी वरुण गांधी को लेकर पीएम हाउस से बाहर निकल गयीं। इस घटना को मेनका शायद ही कभी भूल पाएं। सोनिया गांधी के बाद अब इंदिरा गांधी की विरासत राहुल और प्रियंका संभाल रही हैं। इनके रहते मेनका कभी कांग्रेस में जाने के बारे में सोच भी नहीं सकती। कई बार वरुण गांधी के कांग्रेस में जाने की चर्चा निकल पड़ती है। लेकिन गांधी बनाम गांधी की लड़ाई में इतनी कड़वाहट घुल चुकी है कि मिठास के लिए शायद ही गुंजाइश बची है। इसलिए मेनका जब तक सोनिया विरोध की राजनीति करेंगी तब तक उन्हें भाजपा जैसे मजबूत संबल की जरूरत पड़ेगी।

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