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छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावः बाग़ी उम्मीदवारों से कांग्रेस-बीजेपी परेशान

By Bbc Hindi
कांग्रेस के झंडे
Getty Images
कांग्रेस के झंडे

छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 सीटों पर होने वाले चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के बाग़ी उम्मीदवारों ने पार्टी की नींद उड़ाकर रख दी है.

पिछले चुनाव में महज़ 0.75 प्रतिशत के अंतर से जीत कर सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी की इन बाग़ियों के कारण चौथी बार सरकार बनाने की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है.

वहीं, हार-जीत के अंतर को ख़त्म कर 15 सालों के बाद सरकार में वापसी की कांग्रेस पार्टी की जी-तोड़ कोशिश को बाग़ियों के कारण झटका लग सकता है.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के प्रभारी पीएल पुनिया मानते हैं कि पार्टी में कई जगह बाग़ी उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं और उनके कारण थोड़ी मुश्किल भी हो सकती है.

पुनिया कहते हैं, "बड़ा परिवार है तो थोड़ी खटर-पटर होती ही है. हमने अधिकांश लोगों को समझा-बुझा लिया है. अब जो चुनाव लड़ने पर ही आमादा हैं तो उनका क्या किया जा सकता है?"

दो चरणों में होने वाले चुनाव के लिए नाम वापस लेने की अंतिम तारीख़ के बाद 1338 उम्मीदवार मैदान में बचे रह गए हैं.

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव, पीएल पुनिया
Getty Images
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव, पीएल पुनिया

बाग़ियों की उम्मीदवारी

इनमें सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा बसपा, छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, सीपीआई, सीपीएम, छत्तीसगढ़ समाज पार्टी जैसे राजनीतिक दलों के उम्मीदवार तो हैं ही बल्कि कई सीटों पर दोनों बड़े राजनीतिक दलों के नेता निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोक कर खड़े हैं.

राज्य भर से दोनों ही पार्टियों के दफ़्तर में तोड़फोड़ और प्रदर्शन की कई घटनाएं सामने आईं. कहीं मान-मनौव्वल हुआ तो कहीं आंखें तरेरी गईं.

बस्तर में कांग्रेस की विधायक देवती कर्मा के ख़िलाफ़ उनके बेटे ही मैदान में उतरने पर आमादा हो गए थे.

पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष भूपेश बघेल बड़ी मुश्किल से उन्हें समझा पाए.

इसी तरह वैशाली नगर में भाजपा की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पांडेय के भाई राकेश पांडेय और भाभी चारुलता पांडेय ही भाजपा प्रत्याशी के ख़िलाफ़ मैदान में उतर गए.

भाजपा में बग़ावत

चारुलता पांडेय कहती हैं, "पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने कई-कई बार फोन किया, जिसके बाद मैंने अपना नाम वापस ले लिया."

लेकिन सारे बाग़ी दबाव, प्रलोभन या नैतिकता के कारण अनुशासन की डोर में बंध गए हों, ऐसा नहीं है.

सोमवार को नाम वापसी के अंतिम दिन दोनों ही पार्टियों को कुछ सीटों पर बाग़ियों को मनाने में ज़रूर सफलता मिली लेकिन रूठने-मनाने, चेताने और बाहर का रास्ता दिखाने का सिलसिला अब भी जारी है.

दुर्ग ज़िले में जब भाजपा में बग़ावत की ख़बर आई तो वहां पहले से तैनात भारतीय जनता पार्टी के पर्यवेक्षक शेषनाथ पाठक अपनी विवशता दर्शाने लगे.

उन्होंने कहा, "हम लोग चुनाव में सहयोग करने आए हैं. न हम टिकट देने आए हैं, न लेने आए हैं, न काटने आए हैं, न कटवाने आए हैं. बड़ी पार्टी है. परिवार में जब मतभेद होता है तो पार्टी में भी हो सकता है."

बग़ावत से मुश्किल

छत्तीसगढ़ में इस बार बसपा और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का गठबंधन भी चुनाव मैदान में है.

बसपा को पिछले चुनाव में 4.27 प्रतिशत वोट मिले थे.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अजीत जोगी की पार्टी और बसपा का गठबंधन इस चुनाव में कम से कम 10 फ़ीसदी वोटों में सेंध लगा सकता है.

राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर विक्रम सिंघल कहते हैं, "पिछली बार केंद्र सरकार के एंटी इनकम्बेंसी का नुकसान छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी को उठाना पड़ा था. इस बार कम से कम चार फ़ीसदी वोटों का लाभ कांग्रेस को हो सकता है लेकिन ये बात तो तय है कि अजीत जोगी का गठबंधन इस बार दोनों ही पार्टियों को नुक़सान पहुंचाएगा."

ज़ाहिर है, पिछले चुनाव में जब कांग्रेस और भाजपा की हार-जीत के बीच महज 0.75 प्रतिशत का अंतर रहा हो और अब जोगी-बसपा का गठबंधन भी सेंध लगाने में जुटा हो तो कोई भी पार्टी बाग़ी उम्मीदवारों का झटका झेलने के लिए तैयार नहीं होगी.

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव
Reuters
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव

निर्दलीयों की कामयाबी

छत्तीसगढ़ में महासमुंद के विमल चोपड़ा जैसे उदाहरण भी हैं.

पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर चोपड़ा ने निर्दलीय चुनाव लड़ा था और दोनों ही पार्टियों को पटखनी देकर जीत हासिल की थी.

विमल चोपड़ा फिर से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं.

लेकिन 2003 में रायगढ़ से भारतीय जनता पार्टी के विधायक चुने गए विजय अग्रवाल के समर्थकों का दावा है कि इस बार महासमुंद जैसा इतिहास रायगढ़ में लिखा जाएगा.

विजय अग्रवाल को जब इस बार भारतीय जनता पार्टी से टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में कूद गए हैं.

उनके समर्थन में भाजपा के आधा दर्जन से अधिक पार्षदों ने भी पार्टी छोड़ दी है.

'वोट कटवा' की भूमिका

यही हाल रामानुजगंज, बसना, साजा, बिलाईगढ़ जैसी सीटों का है, जहां भारतीय जनता पार्टी के प्रभावशाली नेता निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में आ गए हैं.

दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी भी इस मुश्किल से दो-चार हो रही है. डौंडी लोहारा से लेकर बिंद्रानवागढ़ तक कई कांग्रेसी निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं.

ये नेता प्रभावशाली तो हैं और इसलिए कम से कम 'वोट कटवा' की भूमिका तो निभा ही सकते हैं.

यूं भी इन दमदार बाग़ियों के कारण पिछले चुनाव में कई विधानसभा सीटों पर कांग्रेस या भाजपा तीसरे नंबर पर पहुंच गई थी.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल कहते हैं, "पार्टी में कई जगहों पर अधिकृत प्रत्याशी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने की ख़बर मिली थी. लेकिन,अधिकांश जगहों पर अब कोई विवाद नहीं है. कांग्रेस का एक-एक कार्यकर्ता जी जान से जुटा हुआ है और छत्तीसगढ़ में अगली सरकार हमारी बनने वाली है."

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English summary
Madhya Pradesh Assembly election 2018: Rebellion Become headache for BJP and Congress

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