जानिए, तेल की कीमतों में भारी गिरावट का लाभ भारत क्यों नहीं उठा पा रहा है?
नई दिल्ली। अमेरिका में क्रूड ऑयल की कीमतें सोमवार को कोरोना वायरस से प्रेरित डिमांड में कमी और भविष्य में उपयोग के लिए तेलों के भंडारण में असमर्थता के कारण ऐतिहासिक शून्य से भी नीचे यानी -37.63 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया। विशेषज्ञों का कहना है कि कीमतें इसका भारतीय अर्थव्यवस्था और ईंधन की कीमतों पर बहुत मामूली प्रभाव ही पड़ेगा।

माना जा रहा है कि इसका मुख्य कारण भारतीय तेल कंपनियां हैं, जो मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां है और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) बेंचमार्क इंडेक्स पर निर्भर नहीं हैं। चूंकि भारतीय कंपनियां अपनी जरूत की अंधिकाश तेल की खरीद मध्य पूर्व और मुख्य रूप से दुबई और ओमान एक्सिस से करती ह, जो कि ब्रेंट क्रूड बेंचमार्क कीमतों पर आधारित हैं।

गौरतलब हैं बेंट क्रूड बेंचमार्क में प्रति बैरल तेल की नवीनतम कीमत 22.41 डॉलर है जबकि भारतीय प्रति बैरल 20.56 की कीमत पर खरीदता है। ब्रेंट क्रूड बेंचमार्क पर मध्य पूर्व के ओपेक-प्लस देशों का वर्चस्व है, जिसमें रूस शामिल है, जिसने कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के लिए पहले ही उत्पादन में लगभग 10 फीसदी कटौती की घोषणा कर रखी है।


भारतीय तेल कंपनिया जोखिम भरे वायदा हेजिंग में ज्यादा इंगेज नहीं हैं
इंडिया प्राइसवाटरहाउसकूपर्स (PwC) में ऑयल एंड गैस इंडस्ट्री प्रैक्टिस लीडर दीपक माहुरकर कहते हैं, "पहले से ही लॉकडाउन के कारण हमारी मांग नहीं है और हमारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) जैसे बीपीसीएल, एचपीसीएल और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) जोखिम भरे वायदा हेजिंग में ज्यादा इंगेज नहीं हैं और महज छह महीने से एक साल के अनुबंध के लिए जाते हैं, जबकि वैश्विक मानदंड लगभग तीन महीने का है।

लॉकडाउन के कारण तेल की मांग में 40 फीसदी से अधिक की गिरावट
भारत में लॉकडाउन के कारण तेल की मांग में 40 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है, क्योंकि पेट्रोल और विमानन ईंधन की खपत बहुत कम है, और केवल डीजल कुछ बिक्री है, जो आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई के काम आ रही है । उन्होंने कहा कि देश में एमसीएक्स सीसीएल ट्रेडिंग एक्सचेंज पर वायदा तेल व्यापार भी 'बहुत नगण्य' है।

भारत में ईंधन की खुदरा कीमतें वैश्विक कीमतों पर नगण्य असर डालती हैं
भारत में ईंधन की खुदरा कीमतें वैश्विक कीमतों पर नगण्य असर डालती हैं, क्योंकि खुदरा कीमतों के प्रमुख हिस्से में राज्यों और केंद्र के कर शामिल हैं। भारत में खुदरा ईंधन की कीमतें हफ्तों तक अपरिवर्तित रही हैं, क्योंकि मांग लगभग एक जैसा बना हुआ है और सरकार कीमत में गिरावट के लाभों का एहसास नहीं कर पा रही है।

कच्चे तेल की कीमतें लगभग 20 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क सकती हैं
आईसीआरए में कॉरपोरेट रेटिंग के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और समूह प्रमुख के रविचंद्रन ने कहा कि अगले कुछ हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें लगभग 20 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क सकती हैं, लेकिन न तो सरकार और न ही ओएमसी इससे लाभ उठा सकते हैं, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर है कि भारत पूर्ण लॉकडाउन से कैसे बचता है।

भारतीय तेल रिफाइनर रिफाइनिंग कैपेसिटी से बहुत नीचे चल रहे हैं
के रविचंद्रन के मुताबिक पहले से ही भारतीय तेल रिफाइनर अपनी रिफाइनिंग कैपेसिटी से बहुत नीचे चल रहे हैं और टैंकर समुद्र में बर्थ की प्रतीक्षा कर रहे हैं, क्योंकि स्टोरेज टैंक भरे हुए हैं। भले ही हम गिरती कीमतों का लाभ उठाने के लिए रणनीतिक भंडारण के बारे में सोचते हैं।

भारत में तेल कीरिजर्व क्षमता 5.3 मीट्रिक टन से अधिक नहीं है
उन्होंने बताया कि चूंकि भारत में तीन महीनों के लिए रिजर्व क्षमता 5.3 मिलियन टन (मीट्रिक टन) से अधिक नहीं है, जो कि हमारे कुल 200 मीट्रिक टन प्लस खरीद का एक छोटा हिस्सा है। जब कोई मांग नहीं है और स्टोरेज तेल से भरे हुए हैं, तो ताजा कच्चा कौन खरीदेगा?

US में तेल कीमतों में गिरावट मई WTI वायदा अनुबंधों की समाप्ति है
उन्होंने कहा कि अमेरिकी तेल की कीमतों में गिरावट एक अस्थायी मुद्दा है, जिसका मुख्य कारण मई डब्ल्यूटीआई वायदा अनुबंधों की समाप्ति है। बाजार में कोई खरीदार नहीं हैं और विक्रेता अपने पूर्ण भंडारण टैंक को खाली करने के लिए उन्हें स्टॉक लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

महामारी के कारण दुनिया भर में तेल की खपत तेजी से गिर गई है
दरअसल, कोरोना वायरस महामारी के कारण दुनिया भर में तेल की खपत तेजी से गिर गई है और कई देश लॉकडाउन में हैं। हालांकि अधिकांश देशों में ईंधन की लॉजिस्टिक और आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई है और तेल उत्पादन कुओं को बंद करना भी आसान नहीं है।












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