LAC पर चीन की दगाबाजी से कैसे निपटारा चाहते हैं लद्दाख के लोग, जानिए
नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव को देखते हुए सेना को आपातकालीन खरीदारी का अधिकार दे दिया, जिससे कि वह अपना वॉर रिजर्व भर सके। हालांकि, भारत ने विवाद को दूर करने के लिए बातचीत की प्रक्रिया जारी रखी है, लेकिन जानकारी के मुताबिक सरकार मौजूदा स्थिति में किसी भी तरह का चांस नहीं लेना चाहती। खासकर सोमवार रात को हुई हिंसक घटनाओं को देखने बाद। जाहिर है कि चीन ने एक बार फिर भारत का भरोसा तोड़ा है, इसलिए इस बार भारत उसकी नापाक हरकतों को यूं ही बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन वह अपनी ओर से ऐसी भी स्थिति पैदा नहीं करना चाहता, जिससे कि मौजूदा गंभीर हालात पूरी तरह से दो बड़े पड़ोसियों के बीच युद्ध का शक्ल अख्तियार कर ले। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कोरोना वायरस को लेकर दुनियाभर में बेनकाब हुए चीन ने उसपर से ध्यान हटाने के लिए एलएसी पर जो हालात पैदा कर दिए हैं, उससे लद्दाख के लोग किस तरह से निपटना चाहते हैं।

एलएसी पर शांति चाहते हैं लद्दाख के लोग
भारतीय सेना के एक कर्नल संतोष बाबू समेत 20 जवानों की शहादत की घटना से लद्दाख के लोग बहुत ही परेशान हैं। वहां के लोगों को लगता है कि दोनों देशों के बीच पैदा हुए अविश्वास के इस माहौल को शांति और बातचीत के जरिए ही निपटाया जाना चाहिए। इलाके के सिविल सोसाइटी के सदस्यों और पार्षदों का कहना है कि सरकार को सार्थक संवाद के जरिए ही सीमा विवाद का स्थायी समाधान खोजना चाहिए। सोनमर्ग-लेह हाइवे पर आम लोगों के लिए यातायात मंगलवार से ही बाधित है, क्योंकि उसके जरिए सेना भारी हथियार लेह की ओर ले जा रही है। पूर्वी लद्दाख में भी रिजर्व सैनिकों और आर्टिलियरी को पैंगोंग त्सो और गलवान घाटी की ओर कूच किया जा रहा है। लेह में भी सेना के वाहनों की लगातार आवाजाही देखी जा रही है। कश्मीर में जम्मू-कश्मीर ट्रैफिक पुलिस के अधिकारियों ने मंगलावर को ही कह दिया था कि बुधवार को श्रीनगर से लेह की ओर सिर्फ आवश्यक वस्तुओं को ले जा रहे वाहनों को ही जाने दिया जाएगा।

चीन की नीयत पर लद्दाख के लोगों को संदेह
मतलब, एलएसी पर जो तनाव बरकरार है, उसका असर लद्दाख के आम जनजीवन पर भी पड़ रहा है। लद्दाख हिल डेवलपमेंट काउंसिल के कार्यकारी पार्षद कोनचोक स्टैंजिन का कहना है कि, 'हालात बहुत ही गंभीर हैं, क्योंकि हमने इस सीमा पर कभी हत्याएं नहीं देखी हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि बातचीत के जरिए हालात धीरे-धीरे शांत हो जाएंगे।' ये पूर्वी लद्दाख के चुशुल इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां पर भारतीय और चीनी सैनिक एक-दूसरे के सामने डटे हुए हैं। पूर्वी लद्दाख के ही कोरजोक निर्वाचन क्षेत्र के एक और पार्षद गुरमीत दोरजे कहते हैं, 'जिसने भी चल रही बातचीत के बीच में भरोसा तोड़ा है उसे सजा मिलनी चाहिए। इलाके के लिए हिंसा ठीक नहीं है। मुझे चीन की नीयत पर संदेह है और हम हथियार नहीं डाल सकते।'

सेना के साथ डटे हुए हैं लद्दाख के लोग
लद्दाख के ज्यादातर लोगों में एक बात देखने को मिल रही है कि वह हर हाल में शांति तो चाहते हैं, लेकिन चीन के दुस्साहस का माकूल जवाब भी चाहते हैं। जैसे लद्दाख बुद्धिस्ट काउंसिल के प्रेसिडेंट पीटी कुनजैंग का कहना है, 'हालात बहुत ही गंभीर हैं। स्थिति बदसूरत होने से पहले ही यह गतिरोध खत्म होना चाहिए। किसी भी स्थिति में हम अपनी सेना के साथ डटे रहेंगे।' वहीं लेह में अंजुमन-ए-मोइनुल इस्लाम के प्रेसिडेंट अब्दुल कयूब काह कहना है कि शांति ही आगे ले जाने का सिर्फ एक रास्ता है और जंग किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।

43 दिनों में मामूली झड़प खूनी संघर्ष में बदल गई
बता दें कि ये सारा विवाद 5-6 मई को पैंगोंग त्सो इलाके में शुरू हुआ जब दोनों ओर से सैनिकों के बीच भिड़ंत हुई। इसमें दोनों देशों के जवान हुए जख्मी हुए थे। 9 मई को उत्तर सिक्किम में नाकु ला भी दोनों देशों के जवान आपस में भिड़ गए, जिसमें दोनों ओर के ही लोग घायल हुए। इन घटनाओं के बाद ही भारत और चीन दोनों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास सेना की अतिरिक्त तैनाती करनी शुरू कर दी। दोनों ओर से सेना के बड़े स्तर पर भी बातचीत शुरू हुई, लेकिन चीन ने हर बार की तरह इस बार भी धोखा दिया। ऊपर-ऊपर वह बातचीत का दिखावा करता रहा और उसने गलवान वैली में नापाक हरकतें शुरू कर दी। इसके वजह से दोनों ओर से जवान डंडों और पत्थरों से ही आपस में भिड़ गए, जिसमें भारत के कर्नल समेत 20 सैनिक शहीद हो गए। जबकि, खबरों के मुताबिक चीनी सेना का भी एक कमांडर मारा गया और 40 से ज्यादा उसके भी जवान हताहत हो गए। (कुछ तस्वीरें प्रतीकात्मक और फाइल)












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