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2024 में केजरीवाल देंगे मोदी को टक्कर, इस दावे में है कितना दम?

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नई दिल्ली- दिल्ली विधानसभा में लगातार दूसरी बार आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत ने अभी से 2024 के आम चुनावों पर चर्चा को मौका दे दिया है। कई तरह की बातें हो रही हैं। विपक्ष के नेताओं ने केजरीवाल की जीत को जिस तरह से हाथों-हाथ लिया है, उससे ऐसे भी दावे किए जाने लगे हैं कि 2024 में प्रधानमंत्री मोदी को टक्कर देने के लिए विपक्ष को असली नेता हाथ लग गया है। ऊपर से जिस तरह से रविवार को होने वाले केजरीवाल के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए ये तमाम विपक्षी सूरमा जिस तरह से लार टपका रहे हैं, उससे इस तरह के कयासों को बल मिलना बड़ा ही स्वाभाविक भी है। लेकिन, सवाल उठता है कि क्या इस तरह के दावों का कोई जमीनी आधार भी है ? या दिल्ली के मतदाताओं ने कुछ ऐसा परिणाम दे दिया है, जिसे हम दिल्ली से बाहर राष्ट्रीय स्तर पर अभी देखने की कोशिश ही नहीं कर पा रहे हैं? यहां हमने दिल्ली चुनाव को दिल्ली की राजनीति से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर आंकने की कोशिश की है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि इन दावों में कोई दम भी लगता है या ये महज सियासी शिगूफा साबित होने वाले हैं ?

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    2024 में केजरीवाल देंगे मोदी को टक्कर ?

    2024 में केजरीवाल देंगे मोदी को टक्कर ?

    दिल्ली विधानसभा चुनाव में शाहीन बाग और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए विरोध-प्रदर्शनों को मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विपक्षी दलों को निशाना बनाने की कोशिश की। खुद अमित शाह ने चुनाव की कमान संभाली थी और करीब 50 जनसभाएं और रैलियां कीं, वोटरों के घर-घर गए, उन्हें रिझाने-समझाने की कोई कोशिश बाकी नहीं रहने दिया। पार्टी के नए अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन, फिर भी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दम भरने वाली भाजपा, दुनिया की सबसे छोटे सत्ताधारी दल में से एक आम आदमी पार्टी को हिला नहीं पाई। जाहिर है कि इन तथ्यों ने राजनीतिक विश्लेषकों को अपने-अपने विचारों के मुताबिक इसका अलग-अलग विश्लेषण करने का मौका दे दिया है। दिल्ली में पत्रकारों (वरिष्ठ) की ऐसी फौज की कमी भी नहीं है, जो अब अरविंद केजरीवाल को विपक्षी दलों के कुनबे के सामने भविष्य के सबसे प्रभावशाली नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश करेंगे। यहां भविष्य से हमारा मतलब 2024 के आम चुनाव से है, जिसमें केजरीवाल को मोदी के लिए बड़ी चुनौती के तौर पर पेश करने के दावों की भनक भी सुनाई पड़ने लगी है।

    कांग्रेस की हार में छिपा है मोदी की जीत का रास्ता?

    कांग्रेस की हार में छिपा है मोदी की जीत का रास्ता?

    अगर हम दिल्ली के चुनाव परिणाम को राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के मद्देनजर सोचें तो इस नतीजे ने असल में प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए 2024 के चुनाव में एक बेहतरीन मौका पेश कर दिया है। इसका मुख्य कारण है, कांग्रेस का सफाया, जो कि आज भी राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। दिल्ली के चुनाव में लगातार दूसरी बार कांग्रेस को एक भी सीट पर सफलता तो नहीं ही मिली है, उसके वोट प्रतिशत में भी आधे से ज्यादा की गिरावट आई है। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी को लेकर भी बतौर राजनीतिक दल सबसे ज्यादा उसी ने पूरे देश में बवाल काटा है, लेकिन दिल्ली के नतीजे बताते हैं कि इसके बावजूद उसका वोट शेयर 2015 के 9.7 फीसदी से गिरकर मात्र 4.26 फीसदी रह गया है। दिल्ली में कांग्रेस की यह गिरावट दिल्ली के बाहर भाजपा के लिए एक बहुत बड़ी उम्मीद बनकर आई है। वजह साफ है कि केंद्र की राजनीति में सिर्फ कांग्रेस ही बीजेपी के डर का कारण बन सकती है, जिसकी लुटिया दिल्ली में डुबो दी गई है। आगे हम इसपर भी बात करेंगे कि इससे 2024 के लिए मोदी और भाजपा का रास्ता कैसे साफ हो चुका है?

    बिहार चुनाव में क्या करेंगे केजरीवाल?

    बिहार चुनाव में क्या करेंगे केजरीवाल?

    दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगातार तीसरी बार दिल्ली की सत्ता पर भले ही काबिज हो रहे हों, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के बाहर उनकी सियासत की पूछ होने की उम्मीद कहीं से भी नजर नहीं आती। ज्यादा से ज्यादा दिल्ली में रहने की वजह से मीडिया में उनके दल को प्रभावी हेडलाइन बनने लायक कवरेज जरूर मिलती रह सकती है, लेकिन जब बात राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के खिलाफ विपक्ष को नेतृत्व देने की आएगी तो केजरीवाल उसमें फिट बैठ पाएंगे, इसका फिलहाल न तो कोई जमीनी आधार है और न ही उनकी या उनकी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में अभी ऐसी हैसियत ही है। जरा सोचिए कि इस साल के आखिर में और अगले साल की शुरुआत में बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे दो अहम राज्यों में चुनाव होने हैं, इनमें केजरीवाल या उनकी आम आदमी पार्टी क्या कर पाएगी? क्या बिहार में नीतीश कुमार की परफॉर्मेंस को केजरीवाल अपनी परफॉर्मेंस से टक्कर देने की हालत में होंगे? तथ्य ये भी है कि 2014 के बाद विपक्ष नीतीश को ही मोदी को चुनौती देने के लिए चेहरा बनाने की फिराक में था, लेकिन खुद नीतीश ने ही मोदी के नेतृत्व को स्वीकार करने में भलाई समझी थी। वैसे भी यहां फिलहाल जेडीयू-भाजपा गठबंधन काफी मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है।

    बंगाल में क्या करेंगे अरविंद केजरीवाल?

    बंगाल में क्या करेंगे अरविंद केजरीवाल?

    पश्चिम बंगाल में भी बिहार की तरह न तो अरविंद केजरीवाल का कोई जनाधार है और न ही ऐसा लगता है कि वो वहां ममता बनर्जी को चुनौती देने के बारे में सोच भी सकते हैं। ममता बनर्जी अबतक केजरीवाल की खूब वाहवाही करती आई हैं, लेकिन अगर 'आप' का एक टोपी वाला कार्यकर्ता बंगाल में दिख भी गया तो फिर दीदी का रुख क्या होगा, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। उलटे मोदी-शाह की जोड़ी 2021 में ममता बनर्जी को बंगाल में ममता की धरती पर उन्हें सियासी पटखनी देने की कोई कसर नहीं छोड़ने वाली। पिछले लोकसभा चुनाव में दीदी को इसका अहसास कराया भी जा चुका है। ऐसे में जब दिल्ली के बाहर इन बड़े राज्यों में केजरीवाल अपनी कोई राजनीतिक दावेदारी दिखाने की स्थिति में ही नहीं होंगे तो विपक्षी दलों का कोई भी गठबंधन उन्हें 2024 में मोदी के खिलाफ प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में भला क्यों स्वीकार करेगा? जबकि, विपक्षी एकता का इतिहास यही रहा है कि उसमें गिनती में दलों की संख्या से ज्यादा प्रधानमंत्री पद के दावेदार होते हैं।

    ममता-पवार की चुनौती कितनी बड़ी ?

    ममता-पवार की चुनौती कितनी बड़ी ?

    तथ्य ये है कि राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के विस्तार को टक्कर देने के लिए आज भी कांग्रेस ही सबसे मुख्य विपक्षी दल है, जिसके बारे में ऊपर भी बात हो चुकी है। आज भी कांग्रेस में ही वह क्षमता है कि वह पचासों विपक्षी दलों को मोदी-विरोध में एकजुट कर सकती है। मसलन, टीएमसी मुखिया ममता बनर्जी कितना भी हाथ-पैर मारेंगी, वह पश्चिम बंगाल से बाहर बीजेपी का कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगी। इसी तरह एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने भले ही पारिवारिक रिश्तों का मोलम्मा देकर अभी उद्धव को फुसला लिया हो, लेकिन उनका भी महाराष्ट्र के बाहर की राजनीति में कोई प्रभावकारी वजूद नहीं है, जो कि भाजपा या मोदी को रोकने के लिए विपक्षी दलों को नेतृत्व दे सके।

    (ऊपर की तस्वीर- प्रतीकात्मक)

    केजरीवाल के नाम पर मानेंगे कांग्रेसी ?

    केजरीवाल के नाम पर मानेंगे कांग्रेसी ?

    मतलब साफ है कि आज भी राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस ही बीजेपी और नरेंद्र मोदी की सबसे मुख्य चुनौती है। 2019 में पार्टी की मिट्टी पलीद होने के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्षता जरूर छोड़ दी थी, लेकिन सच्चाई ये भी है कि उनकी मां सोनिया गांधी उन्हीं के लिए कुर्सी संभालकर बैठी हैं। क्योंकि, भले ही राहुल अध्यक्ष नहीं हैं, लेकिन उनकी बातों से अंदाजा लग सकता है कि उनके इशारे के बिना कांग्रेस में पत्ता भी नहीं हिल सकता। क्योंकि, अध्यक्ष की कुर्सी घर में ही है और इसी तरह जब 2024 आएगा तो एक बार फिर से पीएम उम्मीदवार के तौर पर 50 बसंत देख चुके परिवार के इस वारिस का ही एकाधिकार होगा, ऐसा लगभग तय है। यानि, भले ही पी चिंबरम जैसे नेता दिल्ली में कांग्रेस की सियासी बर्बादी के बावजूद केजरीवाल की जीत में मदहोश हो चुके हैं, वे भी पीएम उम्मीदवार के तौर पर कभी केजरीवाल को स्वीकार कर लेंगे, इसकी फिलहाल तो दूर-दूर तक कोई गुंजाइश नहीं दिखती। मतलब चिदंबरम तो बानगी भर हैं, कांग्रेस की आलाकमानी परंपरा के बारे में ज्यादा बताने की आवश्यकता भी नहीं होनी चाहिए।

    केजरीवाल की जीत में छिपा है, 2024 के लिए मोदी का रास्ता

    केजरीवाल की जीत में छिपा है, 2024 के लिए मोदी का रास्ता

    कांग्रेस और उसके नेता राहुल 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने कोई चुनौती बनकर खड़े होंगे, उससे पहले कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां खुद खड़ी रहने की आशंका है। मसलन, 2018-19 में कांग्रेस ने राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड में भाजपा को सत्ता से बेदखल किया। जब, 2024 का चुनाव आएगा तबतक उसे इन सारे राज्यों में एंटी-इंकम्बेंसी का सामना करना पड़ रहा होगा। इन राज्यों में लोकसभा की कुल 127 सीटें हैं और प्रधानमंत्री मोदी पिछले 6 वर्षों में एंटी-इंकम्बेंसी से वोट बटोरने वाले सबसे बड़े नेता साबित हुए हैं। सौ बात की एक बात ये है कि दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल की बड़ी जीत और कांग्रेस के सफाए से ही 2024 में मोदी के लिए दिल्ली का रास्ता निकल सकता है, जहां उसके वोट इस विधानसभा चुनाव में भी बढ़े हैं और पिछले दो लोकसभा चुनावों से दिल्ली सिर्फ मोदी को वोट दे रही है।

    इसे भी पढ़ें- दिल्ली में जो सीट AAP ने छीनी,वहां BJP उम्मीदवार को एक राउंड में मिले महज 5 वोट

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    English summary
    Kejriwal will compete with Modi in 2024,how much merit does such claims have?
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