Germany Robot Cockroaches: जर्मनी ने तैयार की 'कॉकरोच साइबॉर्ग' की सेना, अब दुश्मन के अड्डों और मलबे में घुसकर
Germany Robot Cockroaches: क्या हो अगर कार्टून की दुनिया आपके सामने हकीकत में देखने को मिल जाए। भविष्य के युद्ध अब केवल टैंकों, मिसाइलों या बड़े ड्रोन्स से नहीं, बल्कि ऐसे जीवों से लड़े जाएंगे जिन्हें हम अक्सर अपनी रसोई में देखकर भगा देते हैं।
जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो किसी हॉलीवुड फिल्म 'माइनॉरिटी रिपोर्ट' या 'ब्लैक मिरर' की याद दिलाती है। यहां साधारण दिखने वाले कॉकरोच (तिलचट्टों) को 'बायो-रोबोट' या 'साइबॉर्ग' में बदला जा रहा है, ताकि वे सैन्य जासूसी और रेस्क्यू ऑपरेशनों को अंजाम दे सकें।

जर्मनी की स्टार्टअप कंपनी SWARM Biotactics ने इस क्रांतिकारी और थोड़ी डरावनी लगने वाली तकनीक को दुनिया के सामने रखा है जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह जाएगा।
SWARM Biotactics Bio-Robotics: क्या है 'कॉकरोच साइबॉर्ग' और कैसे होता है तैयार?
वैज्ञानिकों ने असली जीवित कॉकरोच के शरीर पर एक माइक्रो-बैकपैक (छोटा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण) लगाया है। यह कोई साधारण बैग नहीं है, बल्कि अत्याधुनिक सेंसर और कैमरों से लैस एक कंट्रोल यूनिट है। इलेक्ट्रॉनिक बैकपैक लगेगा जिससे इस छोटे से उपकरण में हाई-डेफिनिशन माइक्रो कैमरा, थर्मल सेंसर और कम्युनिकेशन सिस्टम लगा होता है।
वैज्ञानिक इन कीड़ों के नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) को हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजकर नियंत्रित कर सकते हैं। यानी दूर बैठा ऑपरेटर यह तय कर सकता है कि कॉकरोच को दाएं मुड़ना है या बाएं। AI की मदद से इन कीड़ों को एक समूह में भी काम पर लगाया जा सकता है, जिससे एक बड़ा इलाका कम समय में स्कैन किया जा सके।
How Does Work: कैसे काम करता है 'रोबोटिक कॉकरोच'?
इस तकनीक में कॉकरोच के शरीर पर एक छोटा सा माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक बैकपैक लगाया जाता है। इस बैकपैक में कई आधुनिक उपकरण फिट किए जाते हैं। इनमें हाई-टेक सेंसर, छोटा कैमरा, कम्युनिकेशन मॉड्यूल शामिल होते हैं। इन उपकरणों की मदद से कॉकरोच आसपास के माहौल का डेटा इकट्ठा कर सकता है और उसे रियल-टाइम में कंट्रोल सेंटर तक भेज सकता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि वैज्ञानिक इन कॉकरोच की मूवमेंट यानी दिशा भी नियंत्रित कर सकते हैं। इसके लिए हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजे जाते हैं, जिनकी मदद से ऑपरेटर दूर बैठकर भी यह तय कर सकता है कि कॉकरोच किस दिशा में जाए।
वैज्ञानिकों ने आखिर कॉकरोच ही क्यों चुना?
हजारों जीवों में से कॉकरोच को चुनने के पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण हैं। कॉकरोच को प्रकृति का सबसे 'टिकाऊ' जीव माना जाता है। ये बिना खाना के हफ्तों रह सकते हैं और रेडिएशन जैसी कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं। कोई भी ड्रोन या रोबोट इतना छोटा और लचीला नहीं होता कि वह ढही हुई इमारतों की दरारों या पाइपलाइनों के भीतर घुस सके। कॉकरोच यह काम आसानी से कर सकते हैं। ये जीव अपने शरीर के वजन के मुकाबले काफी भारी सेंसर (10 से 15 ग्राम) लेकर चलने में सक्षम हैं।
सैन्य जासूसी से लेकर रेस्क्यू मिशन तक काम आएगा अनोखा रोबोट
यह तकनीक न केवल युद्ध के मैदान में पासा पलटने की ताकत रखती है, बल्कि मानवता के लिए भी वरदान साबित हो सकती है। War Zone दुश्मन के बंकरों, संकरी सुरंगों और गुप्त ठिकानों के भीतर जाकर ये साइबॉर्ग वहां की लाइव वीडियो और ऑडियो जानकारी हेडक्वार्टर भेज सकते हैं।
रेस्क्यू मिशन में भी इनकी मदद ली जा सकती है। भूकंप या धमाकों के बाद जब बड़ी इमारतें मलबे में तब्दील हो जाती हैं, तो ये रोबोटिक कॉकरोच मलबे के भीतर गहराई में जाकर फंसे हुए लोगों का पता लगा सकते हैं। उनके साथ लगे सेंसर मानव सांस या शरीर की गर्मी (Heat) को पहचान कर सूचना दे सकते हैं।
बायो-रोबोटिक्स: वॉर का नया चेहरा
दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञ इसे 'बायो-रोबोटिक्स' के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग मान रहे हैं। जहां पारंपरिक रोबोट की बैटरी खत्म होने का डर रहता है, वहीं ये जैविक रोबोट अपना भोजन खुद तलाश सकते हैं और लंबे समय तक ऑपरेशनल रह सकते हैं। जर्मनी का यह प्रयोग सफल रहा तो भविष्य में मधुमक्खियों और अन्य कीटों का इस्तेमाल भी इसी तरह की जासूसी में किया जा सकता है। अगर यह तकनीक पूरी तरह सफल होती है, तो भविष्य में जासूसी और रेस्क्यू मिशन में रोबोटिक कॉकरोच एक नई क्रांति ला सकते हैं।
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