Telangana में KCR की पार्टी को यूं नहीं याद आए भगवान राम! इस बदले वोटिंग पैटर्न को देखिए
तेलंगाना की राजनीति लोकसभा चुनावों से पहले नई करवट लेती दिख रही है। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) की बड़ी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के प्रमुख के चंद्रशेखर राव (केसीआर) की बेटी के कविता ने अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर को लेकर जो कुछ कहा है, वह इसी की ओर इशारा हो सकता है।
कल्वाकुंतला कविता ने एक्स के माध्यम से न सिर्फ अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर को 'करोड़ों हिंदुओं का सपना साकार होने वाला बताया है, बल्कि यहां होने वाले भगवान राम लला की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन को बहुत ही शुभ अवसर बताया है।'

भाजपा लगाती रही है तुष्टिकरण का आरोप
बीआरएस की कद्दावर नेता ने ऐसे मौके पर यह मुद्दा उठाया है, जब उनके पिता गहरी चोट की वजह से अस्पताल के बिस्तर पर हैं। पार्टी ने जो लाइन ली है, वह चुनावों से पहले उसके बारे में बनी राजनीतिक धारणा के पूरी तरह से अलग है। भारत राष्ट्र समिति को भाजपा ने उसके कुछ कदमों के लिए तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में पेश किया था।
केसीआर सरकार के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं ओवैसी
इसकी कुछ वजहें भी थीं। चुनावों से पहले बीआरएस सरकार ने तीसरी बार सत्ता में आने पर सिर्फ मुसलमानों के लिए आईटी पार्क स्थापित करने जैसी बातें कही थीं, जिसपर काफी विवाद भी हुए थे। दूसरी तरफ भले ही बीआरएस और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के बीच कोई औपचारिक तालमेल नहीं रहा, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के लिए इनके बीच बहुत गहरा अनौपचारिक गठबंधन रहा है।
केसीआर को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने की पैरवी करने वाले नेताओं में हैदराबाद के सांसद ओवैसी सबसे आगे थे। विधानसभा के अंदर और बाहर ओवैसी की पार्टी मुसलमानों के लिए केसीआर सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की तारीफ करते नहीं थकती थी।
2024 में बीआरएस की रणनीति बदलने का संकेत?
के कविता बीआरएस में अपने पिता के बाद भाई केटीआर की तरह काफी महत्पवूर्ण स्थान रखती हैं। उनके बयान को राजनीति के जानकारों ने काफी गंभीरता से लिया है और माना जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले पार्टी अपनी कथित 'गलत' रणनीतियों को दुरुस्त करने की कोशिशों में जुट गई है।
तेलंगाना में भी कांग्रेस की ओर झुके मुसलमान
यह अटकलबाजियां बेवजह नहीं हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव परिणामों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2018 की तुलना में बड़ी संख्या में मुसलमानों का वोट बीआरएस की जगह कांग्रेस को शिफ्ट हुआ है। इसकी आशंका पहले से बताई भी जा रही थी।
मुस्लिम वोटरों के बदले हुए पैटर्न ने बीआरएस को डराया?
उदाहण के लिए कांग्रेस ने इस बार वारंगल पश्चिम में जीत दर्ज की है। पिछले चार चुनावों से कांग्रेस यहां सिर्फ हारती ही आ रही थी। इस क्षेत्र में 60,000 से ज्यादा मुसलमान वोटर हैं।
इसी तरह से मुस्लिम वोटरों का फायदा कांग्रेस को महबूबनगर, हुजूरनगर, वारंगनल पूरब, खम्मम, बोधन, इब्राहिमपत्तनम, शादनगर, रामगुंडम, निजामाबाद ग्रामीण और नालगोंडा में भी मिला है, जिनकी मदद से उसने बीआरएस को हराया है।
ग्रेटर हैदराबाद में ओवैसी की वजह से बीआरएस को मुस्लिम वोट!
लेकिन, ग्रेटर हैदराबाद और आसपास की सीटों पर कहानी उलटी नजर आ रही है। यहां मुसलमानों का समर्थन बीआरएस और ओवैसी की पार्टी को मिला है। इसी वजह से एआईएमआईएम अपनी सभी 7 सीटें फिर से जीत ली है।
ओवैसी ने मुसलमानों से कहा था कि सभी सीटों पर बीआरएस को समर्थन दें, सिर्फ उन 9 सीटों को छोड़कर जहां उसकी अपनी पार्टी के उम्मीदवार हैं।
बीआरएस ने सनथ नगर और सिकंदराबाद में बड़े अंतर से जीत दर्ज की है, जहां मुसलमानों का काफी वोट है। इसी तरह से पार्टी खैरताबाद, जुबली हिल्स, संगारेड्डी, सिकंदराबाद छावनी और मुशीराबाद भी जीत गई है। यानि जहां ओवैसी का प्रभाव काम किया, वहीं पर बीआरएस को मुस्लिम वोट मिले।
तेलंगाना की 119 सीटों में से 45 पर मुसलमानों की अच्छी-खासी जनसंख्या है। 2014 से पहले इनका वोट कांग्रेस को जाता था, लेकिन पिछले दो चुनावों से वह बीआरएस को वोट दे रहे थे, लेकिन इस बार वह फिर से कांग्रेस की ओर घूम गए हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस की जीत का भी असर
कई रिपोर्ट में ये तथ्य स्थापित हो चुके हैं कि तेलंगाना के मुसलमानों को बीआरएस से किसी तरह की शिकायत नहीं थी। लेकिन, कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद उनमें यह विश्वास पैदा हुआ है कि केंद्र में बीजेपी का मुकाबला यही कर सकती है।
माना जा रहा है कि मुसलमानों के बदले हुए वोटिंग पैटर्न ने ही भारत राष्ट्र समिति का हृदय परिवर्तन किया है और उसने लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस को काउंटर करने के लिए अपनी पूरी रणनीति ही बदलनी शुरू कर दी है।
बड़ा सवाल है कि क्या आगे चलकर उनका भाजपा के साथ भी किसी तरह से गणित बैठ सकता है? क्योंकि, जिस विकेट पर बीआरएस खेलना चाहती है, उसपर बीजेपी का लगभग 'एकाधिकार' रहा है।












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