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Karnataka Honey Trap Row: किसकी सियासत भस्म होने का बढ़ा खतरा, सत्ता संघर्ष से घर में घिरी कांग्रेस?

Karnataka Honey Trap Case: कर्नाटक की राजनीति में इन दिनों 'हनी ट्रैप' विवाद ने हलचल मचा रखी है। यह विवाद राज्य के सहकारिता मंत्री केएन राजन्ना के उस बयान के बाद शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि एक संगठित गिरोह उन्हें फंसाने की कोशिश कर रहा था।

उनके अनुसार, यह गिरोह 48 अन्य लोगों को भी अपना शिकार बना चुका है, जिनमें विभिन्न दलों के नेता और जज भी शामिल हैं। हालांकि, इस विवाद की तह में जाने पर यह केवल एक आपराधिक षड्यंत्र ही नहीं लग रहा, बल्कि इसके पीछे सत्ता संघर्ष की आंतरिक लड़ाई भी नजर आ रही है, जिसके माध्यम से कांग्रेस के भीतर के गहरे मतभेद भी उजागर हो रहे हैं।

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Karnataka Honey Trap Row: कितने गहरे हो चुके हैं कांग्रेस के अंदरूनी मतभेद?

राजन्ना का नाम मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के करीबी नेताओं में गिना जाता है। वह लंबे समय से डिप्टी सीएम और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार के कट्टर विरोधियों में गिने जाते रहे हैं। उन्होंने हाल ही में कांग्रेस आला कमान से शिकायत की थी कि शिवकुमार को 'एक व्यक्ति, एक पद' नीति के तहत केवल एक पद पर रहना चाहिए।

राजन्ना अकेले नहीं हैं। कई अन्य मंत्री भी शिवकुमार के बढ़ते प्रभाव से असहज महसूस करते रहे हैं। इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय से आने वाले मंत्री जैसे कि सतीश जारकीहोली, जी परमेश्वरा और एचसी महादेवप्पा जैसे दिग्गज कांग्रेसी भी शामिल हैं। यह सभी मंत्री कांग्रेस के भीतर एक अलग धड़ा है, जो समय-समय पर शिवकुमार के लिए चुनौती बनने की कोशिश करता नजर आता रहा है।

Karnataka Honey Trap Scandal: कांग्रेसी सियासत में हनी ट्रैप का साजिश वाला एंगल

हनी ट्रैप विवाद तबसे और गहराया गया है, जबसे इसके पीछे डिप्टी सीएम शिवकुमार का नाम अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ा जाने लगा है। शिवकुमार पहले भी हनी ट्रैप की साजिश के विवादों में घिरे रह चुके हैं। 2021 में बीजेपी सरकार में मंत्री रहे रमेश जारकीहोली को एक सेक्स स्कैंडल में फंसने की वजह से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था। उस समय उन्होंने शिवकुमार पर ही इस साजिश का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया था।

अब, जब कांग्रेस के ही मंत्री इस तरह के आरोप लगा रहे हैं, तो इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष अपने चरम पर है। शिवकुमार के बारे में कहा जाता है कि वह मौजूदा कांग्रेस सरकार के पहले दिन से खुद को अगले मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करना चाह रहे हैं, लेकिन उनके खिलाफ पार्टी के अंदर ही एक मजबूत खेमा डटा रहा है।

Karnataka Honey Trap: बीजेपी का फायदा?

जहां कांग्रेस इस विवाद से जूझ रही है, वहीं विपक्षी बीजेपी इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। विधानसभा में बीजेपी विधायकों ने इस मुद्दे को जमकर उठाया है और कांग्रेस सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। हंगामे के दबाने के नाम पर 18 बीजेपी विधायकों को 6 महीने के लिए निलंबित भी कर दिया गया, लेकिन इससे विवाद और बढ़ गया।

बीजेपी इस मामले को कांग्रेस के अंदरूनी मतभेदों को उजागर करने के अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी ने सवाल उठाया कि 'हनी ट्रैप' के शिकार हुए सभी नेता सिद्धारमैया गुट से ही क्यों हैं? क्या यह केवल एक संयोग है, या फिर इसके पीछे कोई गहरी साजिश है? यह सवाल बीजेपी सोशल मीडिया के माध्यम से और जनसभाओं में लगातार उठा रही है।

Karnataka Honey Trap: कर्नाटक में कांग्रेस हाई कमान भी मजबूर?

इस पूरे घटनाक्रम के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सिद्धारमैया से मुलाकात की है। हालांकि, बैठक के बाद इसे सिर्फ 'शिष्टाचार भेंट' बताया गया, लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे पर गहराई से चर्चा हुई।

कांग्रेस हाई कमान पहले से ही कर्नाटक में चल रहे सत्ता संघर्ष से अवगत है और वह इस विवाद को नियंत्रित करने की कोशिश में लगा है,लेकिन कहीं न कहीं नेताओं के पीछे की संख्या गणित के चलते उसके भी हाथ बंध चुके हैं।

Karnataka Honey Trap: कांग्रेस की सियासत भस्म होने का बढ़ा खतरा?

राजन्ना के आरोपों से कांग्रेस में सत्ता संघर्ष खुलकर सामने आ चुका है। यदि यह विवाद बढ़ता है, तो इससे पार्टी की छवि को गहरा नुकसान हो सकता है। इस विवाद का सबसे बड़ा प्रभाव शिवकुमार की मुख्यमंत्री बनने की उम्मीदों पर पड़ सकता है। क्योंकि, अपने पीछे के वोट बैंक और नेताओं की जुगलंबदी के दम पर सिद्दारमैया अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए किसी भी स्थिति तक जा सकते हैं।

कांग्रेस आला कमान की मुश्किल ये है कि इस विवाद की वजह से उसकी साख को नुकसान भी पहुंच रहा है तो भी न तो वह शिवकुमार के खिलाफ सख्त कदम उठाने की स्थिति में है और न ही सिद्दारमैया के पक्ष में हो रही सियासी गोलबंदी तोड़ने का साहस दिखा सकती है।

क्योंकि, जहां एक तरफ सिद्दारमैया के पास एक बड़ा वोट बैंक है, वहीं शिवकुमार कांग्रेस के लिए कर्नाटक ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में कई बार संकट मोचक की भूमिका निभाने के काम आ चुके हैं और आ सकते हैं। ऐसे भी पार्टी की साख पर बट्टा लगने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ सकता है।

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