Karnataka assembly election 2023: कर्नाटक में जातिगत समीकरण, कौन किस पर भारी?

Karnataka assembly election 2023 dates: कर्नाटक में चुनाव तारीखों का ऐलान हो गया है। राज्य में 10 मई की वोटिंग में जातिगत समीकरण की बड़ी भूमिका होगी।

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Karnataka assembly election 2023 dates: कर्नाटक में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। देश के तमाम उत्तरी राज्यों की तरह यहां भी जातिगत और धार्मिक समीकरण चुनावों में बहुत बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा में कुल 225 सीटें हैं, जिनमें से 224 पर चुनाव होने जा रहा है। एक सीट नॉमिनेटेड एमएलए के लिए सुरक्षित है। जबकि, अनुसूचित जातियों के लिए 36 और अनुसूचित जनजातियों के लिए 15 सीटें रिजर्व रखी गई हैं। राज्य में इस समय बीजेपी के 119, कांग्रेस के 75 और जनता दल (सेक्युलर) के 28 एमएलए हैं।

Karnataka assembly election 2023 dates: कर्नाटक में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। देश के तमाम उत्तरी राज्यों की तरह यहां भी जातिगत और धार्मिक समीकरण चुनावों में बहुत बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा में कुल 225 सीटें हैं, जिनमें से 224 पर चुनाव होने जा रहा है। एक सीट नॉमिनेटेड एमएलए के लिए सुरक्षित है। जबकि, अनुसूचित जातियों के लिए 36 और अनुसूचित जनजातियों के लिए 15 सीटें रिजर्व रखी गई हैं। राज्य में इस समय बीजेपी के 119, कांग्रेस के 75 और जनता दल (सेक्युलर) के 28 एमएलए हैं। कर्नाटक चुनाव में दलितों का प्रभाव कर्नाटक विधानसभा में आरक्षित सीटों की तुलना में दलितों और आदिवासियों की आबादी की बात करें तो समाज के इन दोनों महत्वपूर्ण वर्गों का चुनावी समीकरण में प्रभाव को समझा जा सकता है। प्रदेश के कास्ट फैक्टर में दलित समाज का बहुत बड़ा रोल माना जा सकता है। राज्य में इनकी जनसंख्या 20% है। मतलब, जिस भी दल की तरफ दलित मतदाताओं का ज्यादा रुझान हुआ, उसकी किस्मत चमक सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस की राजनीति के दिग्गज चेहरा हैं और इसी समाज से सियासत में आगे बढ़कर देश की सबसे पुरानी पार्टी की सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान हुए हैं। लिंगायत भी कर्नाटक में बहुत बड़े वोट बैंक हैं अनुसूचित जातियों के बाद राज्य में सबसे प्रभावी वोट बैंक लिंगायत समाज का है। इनकी आबादी 17% है और यह समाज कर्नाटक की राजनीति में बहुत अहम किरदार निभाता आया है। राज्य में भाजपा के सबसे बड़े दिग्गज नेता और पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा इसी समाज से आते हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत समाज से हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या दूसरे दलों के बड़े केंद्रीय नेता, लिंगायत मठों का चक्कर यूं ही नहीं काटते रहे हैं। ओबीसी की आबादी सबसे ज्यादा इसी तरह कर्नाटक में ओबीसी या अन्य पिछड़ी जातियों का वोट बैंक बहुत ही महत्वपूर्ण है। ओबीसी में अकेले कुरुबा जाति की जनसंख्या 7% है। बाकी ओबीसी की कुल आबादी भी 16% है। कुरुबा जाति पारंपरिक तौर पर भेड़ पालन से जुड़ी रही है। कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया इसी समाज से हैं। इसके अलावा बीजेपी और कांग्रेस के कई दिग्गज भी ओबीसी समाज से हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी अन्य पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं। कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम वोटरों की भूमिका महत्वपूर्ण कांग्रेस और जेडीएस के लिए मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से बहुत मददगार साबित होता रहा है। यही वजह है कि मौजूदा बीजेपी सरकार ने मुसलमानों के 4% कोटा को खत्म किया है तो कांग्रेस ने सरकार में आने पर उसे पलटने का वादा किया है। राज्य में मुस्लिमों की जनसंख्या 16% है और मोटे तौर पर एकमुश्त वोटिंग की वजह मुसलमान बहुल क्षेत्रों में यह निर्याणक भूमिका निभाते हैं। वोक्कालिगा समाज का कितना प्रभाव ? कर्नाटक में एक और समाज है, जो राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण और सक्रिय रहा है। कोई भी पार्टी हो वह वोक्कालिगा समाज को नजरअंदाज करके नहीं चल सकती। राज्य में इस समाज के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा माने जा सकते हैं। राज्य में इनकी आबादी 11% है। इस समाज में अबतक मुख्यतौर पर जेडीएस का ही प्रभाव रहा है, लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने इसमें भी अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया है और देवगौड़ा परिवार के सदस्यों को भी हार का सामना करना पड़ा था। इसे भी पढ़ें- कैसे बनाए जा रहे हैं चुनावी समीकरण ? राज्य में अनुसूचित जनजाति की आबादी महज 5% है। वहीं, 3% ब्राह्मण और 3% क्रिश्चियन भी अपने-अपने पॉकेट में थोड़े-बहुत प्रभाव रखते हैं। कर्नाटक में जहां बीजेपी शुरू से हिंदुओं को एक समूह के रूप में एकजुट करने की कोशिशों में जुटी रही है, वहीं भाजपा का यह चुनावी नरेटिव कांग्रेस और जेडीएस के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ने में सक्षम है। यही वजह है कि मुस्लिम कोटा और टीपू सुल्तान जैसे मसले पर यहां जमकर राजनीति होती रही है। कर्नाटक में धर्म और जातिगत समीकरण:- दलित: 20% लिंगायत: 17% ओबीसी: 23% वोक्कालिगा: 11% मुस्लिम: 16% आदिवासी: 5% ब्राह्मण: 3% ईसाई: 3%

कर्नाटक चुनाव में दलितों का प्रभाव
कर्नाटक विधानसभा में आरक्षित सीटों की तुलना में दलितों और आदिवासियों की आबादी की बात करें तो समाज के इन दोनों महत्वपूर्ण वर्गों का चुनावी समीकरण में प्रभाव को समझा जा सकता है। प्रदेश के कास्ट फैक्टर में दलित समाज का बहुत बड़ा रोल माना जा सकता है। राज्य में इनकी जनसंख्या 20% है। मतलब, जिस भी दल की तरफ दलित मतदाताओं का ज्यादा रुझान हुआ, उसकी किस्मत चमक सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस की राजनीति के दिग्गज चेहरा हैं और इसी समाज से सियासत में आगे बढ़कर देश की सबसे पुरानी पार्टी की सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान हुए हैं।

Karnataka assembly election 2023 dates: कर्नाटक में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। देश के तमाम उत्तरी राज्यों की तरह यहां भी जातिगत और धार्मिक समीकरण चुनावों में बहुत बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा में कुल 225 सीटें हैं, जिनमें से 224 पर चुनाव होने जा रहा है। एक सीट नॉमिनेटेड एमएलए के लिए सुरक्षित है। जबकि, अनुसूचित जातियों के लिए 36 और अनुसूचित जनजातियों के लिए 15 सीटें रिजर्व रखी गई हैं। राज्य में इस समय बीजेपी के 119, कांग्रेस के 75 और जनता दल (सेक्युलर) के 28 एमएलए हैं। कर्नाटक चुनाव में दलितों का प्रभाव कर्नाटक विधानसभा में आरक्षित सीटों की तुलना में दलितों और आदिवासियों की आबादी की बात करें तो समाज के इन दोनों महत्वपूर्ण वर्गों का चुनावी समीकरण में प्रभाव को समझा जा सकता है। प्रदेश के कास्ट फैक्टर में दलित समाज का बहुत बड़ा रोल माना जा सकता है। राज्य में इनकी जनसंख्या 20% है। मतलब, जिस भी दल की तरफ दलित मतदाताओं का ज्यादा रुझान हुआ, उसकी किस्मत चमक सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस की राजनीति के दिग्गज चेहरा हैं और इसी समाज से सियासत में आगे बढ़कर देश की सबसे पुरानी पार्टी की सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान हुए हैं। लिंगायत भी कर्नाटक में बहुत बड़े वोट बैंक हैं अनुसूचित जातियों के बाद राज्य में सबसे प्रभावी वोट बैंक लिंगायत समाज का है। इनकी आबादी 17% है और यह समाज कर्नाटक की राजनीति में बहुत अहम किरदार निभाता आया है। राज्य में भाजपा के सबसे बड़े दिग्गज नेता और पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा इसी समाज से आते हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत समाज से हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या दूसरे दलों के बड़े केंद्रीय नेता, लिंगायत मठों का चक्कर यूं ही नहीं काटते रहे हैं। ओबीसी की आबादी सबसे ज्यादा इसी तरह कर्नाटक में ओबीसी या अन्य पिछड़ी जातियों का वोट बैंक बहुत ही महत्वपूर्ण है। ओबीसी में अकेले कुरुबा जाति की जनसंख्या 7% है। बाकी ओबीसी की कुल आबादी भी 16% है। कुरुबा जाति पारंपरिक तौर पर भेड़ पालन से जुड़ी रही है। कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया इसी समाज से हैं। इसके अलावा बीजेपी और कांग्रेस के कई दिग्गज भी ओबीसी समाज से हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी अन्य पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं। कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम वोटरों की भूमिका महत्वपूर्ण कांग्रेस और जेडीएस के लिए मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से बहुत मददगार साबित होता रहा है। यही वजह है कि मौजूदा बीजेपी सरकार ने मुसलमानों के 4% कोटा को खत्म किया है तो कांग्रेस ने सरकार में आने पर उसे पलटने का वादा किया है। राज्य में मुस्लिमों की जनसंख्या 16% है और मोटे तौर पर एकमुश्त वोटिंग की वजह मुसलमान बहुल क्षेत्रों में यह निर्याणक भूमिका निभाते हैं। वोक्कालिगा समाज का कितना प्रभाव ? कर्नाटक में एक और समाज है, जो राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण और सक्रिय रहा है। कोई भी पार्टी हो वह वोक्कालिगा समाज को नजरअंदाज करके नहीं चल सकती। राज्य में इस समाज के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा माने जा सकते हैं। राज्य में इनकी आबादी 11% है। इस समाज में अबतक मुख्यतौर पर जेडीएस का ही प्रभाव रहा है, लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने इसमें भी अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया है और देवगौड़ा परिवार के सदस्यों को भी हार का सामना करना पड़ा था। इसे भी पढ़ें- कैसे बनाए जा रहे हैं चुनावी समीकरण ? राज्य में अनुसूचित जनजाति की आबादी महज 5% है। वहीं, 3% ब्राह्मण और 3% क्रिश्चियन भी अपने-अपने पॉकेट में थोड़े-बहुत प्रभाव रखते हैं। कर्नाटक में जहां बीजेपी शुरू से हिंदुओं को एक समूह के रूप में एकजुट करने की कोशिशों में जुटी रही है, वहीं भाजपा का यह चुनावी नरेटिव कांग्रेस और जेडीएस के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ने में सक्षम है। यही वजह है कि मुस्लिम कोटा और टीपू सुल्तान जैसे मसले पर यहां जमकर राजनीति होती रही है। कर्नाटक में धर्म और जातिगत समीकरण:- दलित: 20% लिंगायत: 17% ओबीसी: 23% वोक्कालिगा: 11% मुस्लिम: 16% आदिवासी: 5% ब्राह्मण: 3% ईसाई: 3%

लिंगायत भी कर्नाटक में बहुत बड़े वोट बैंक हैं
अनुसूचित जातियों के बाद राज्य में सबसे प्रभावी वोट बैंक लिंगायत समाज का है। इनकी आबादी 17% है और यह समाज कर्नाटक की राजनीति में बहुत अहम किरदार निभाता आया है। राज्य में भाजपा के सबसे बड़े दिग्गज नेता और पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा इसी समाज से आते हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत समाज से हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या दूसरे दलों के बड़े केंद्रीय नेता, लिंगायत मठों का चक्कर यूं ही नहीं काटते रहे हैं।

Karnataka assembly election 2023 dates: कर्नाटक में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। देश के तमाम उत्तरी राज्यों की तरह यहां भी जातिगत और धार्मिक समीकरण चुनावों में बहुत बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा में कुल 225 सीटें हैं, जिनमें से 224 पर चुनाव होने जा रहा है। एक सीट नॉमिनेटेड एमएलए के लिए सुरक्षित है। जबकि, अनुसूचित जातियों के लिए 36 और अनुसूचित जनजातियों के लिए 15 सीटें रिजर्व रखी गई हैं। राज्य में इस समय बीजेपी के 119, कांग्रेस के 75 और जनता दल (सेक्युलर) के 28 एमएलए हैं। कर्नाटक चुनाव में दलितों का प्रभाव कर्नाटक विधानसभा में आरक्षित सीटों की तुलना में दलितों और आदिवासियों की आबादी की बात करें तो समाज के इन दोनों महत्वपूर्ण वर्गों का चुनावी समीकरण में प्रभाव को समझा जा सकता है। प्रदेश के कास्ट फैक्टर में दलित समाज का बहुत बड़ा रोल माना जा सकता है। राज्य में इनकी जनसंख्या 20% है। मतलब, जिस भी दल की तरफ दलित मतदाताओं का ज्यादा रुझान हुआ, उसकी किस्मत चमक सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस की राजनीति के दिग्गज चेहरा हैं और इसी समाज से सियासत में आगे बढ़कर देश की सबसे पुरानी पार्टी की सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान हुए हैं। लिंगायत भी कर्नाटक में बहुत बड़े वोट बैंक हैं अनुसूचित जातियों के बाद राज्य में सबसे प्रभावी वोट बैंक लिंगायत समाज का है। इनकी आबादी 17% है और यह समाज कर्नाटक की राजनीति में बहुत अहम किरदार निभाता आया है। राज्य में भाजपा के सबसे बड़े दिग्गज नेता और पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा इसी समाज से आते हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत समाज से हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या दूसरे दलों के बड़े केंद्रीय नेता, लिंगायत मठों का चक्कर यूं ही नहीं काटते रहे हैं। ओबीसी की आबादी सबसे ज्यादा इसी तरह कर्नाटक में ओबीसी या अन्य पिछड़ी जातियों का वोट बैंक बहुत ही महत्वपूर्ण है। ओबीसी में अकेले कुरुबा जाति की जनसंख्या 7% है। बाकी ओबीसी की कुल आबादी भी 16% है। कुरुबा जाति पारंपरिक तौर पर भेड़ पालन से जुड़ी रही है। कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया इसी समाज से हैं। इसके अलावा बीजेपी और कांग्रेस के कई दिग्गज भी ओबीसी समाज से हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी अन्य पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं। कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम वोटरों की भूमिका महत्वपूर्ण कांग्रेस और जेडीएस के लिए मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से बहुत मददगार साबित होता रहा है। यही वजह है कि मौजूदा बीजेपी सरकार ने मुसलमानों के 4% कोटा को खत्म किया है तो कांग्रेस ने सरकार में आने पर उसे पलटने का वादा किया है। राज्य में मुस्लिमों की जनसंख्या 16% है और मोटे तौर पर एकमुश्त वोटिंग की वजह मुसलमान बहुल क्षेत्रों में यह निर्याणक भूमिका निभाते हैं। वोक्कालिगा समाज का कितना प्रभाव ? कर्नाटक में एक और समाज है, जो राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण और सक्रिय रहा है। कोई भी पार्टी हो वह वोक्कालिगा समाज को नजरअंदाज करके नहीं चल सकती। राज्य में इस समाज के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा माने जा सकते हैं। राज्य में इनकी आबादी 11% है। इस समाज में अबतक मुख्यतौर पर जेडीएस का ही प्रभाव रहा है, लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने इसमें भी अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया है और देवगौड़ा परिवार के सदस्यों को भी हार का सामना करना पड़ा था। इसे भी पढ़ें- कैसे बनाए जा रहे हैं चुनावी समीकरण ? राज्य में अनुसूचित जनजाति की आबादी महज 5% है। वहीं, 3% ब्राह्मण और 3% क्रिश्चियन भी अपने-अपने पॉकेट में थोड़े-बहुत प्रभाव रखते हैं। कर्नाटक में जहां बीजेपी शुरू से हिंदुओं को एक समूह के रूप में एकजुट करने की कोशिशों में जुटी रही है, वहीं भाजपा का यह चुनावी नरेटिव कांग्रेस और जेडीएस के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ने में सक्षम है। यही वजह है कि मुस्लिम कोटा और टीपू सुल्तान जैसे मसले पर यहां जमकर राजनीति होती रही है। कर्नाटक में धर्म और जातिगत समीकरण:- दलित: 20% लिंगायत: 17% ओबीसी: 23% वोक्कालिगा: 11% मुस्लिम: 16% आदिवासी: 5% ब्राह्मण: 3% ईसाई: 3%

ओबीसी की आबादी सबसे ज्यादा
इसी तरह कर्नाटक में ओबीसी या अन्य पिछड़ी जातियों का वोट बैंक बहुत ही महत्वपूर्ण है। ओबीसी में अकेले कुरुबा जाति की जनसंख्या 7% है। बाकी ओबीसी की कुल आबादी भी 16% है। कुरुबा जाति पारंपरिक तौर पर भेड़ पालन से जुड़ी रही है। कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया इसी समाज से हैं। इसके अलावा बीजेपी और कांग्रेस के कई दिग्गज भी ओबीसी समाज से हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी अन्य पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं।

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    कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम वोटरों की भूमिका महत्वपूर्ण
    कांग्रेस और जेडीएस के लिए मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से बहुत मददगार साबित होता रहा है। यही वजह है कि मौजूदा बीजेपी सरकार ने मुसलमानों के 4% कोटा को खत्म किया है तो कांग्रेस ने सरकार में आने पर उसे पलटने का वादा किया है। राज्य में मुस्लिमों की जनसंख्या 16% है और मोटे तौर पर एकमुश्त वोटिंग की वजह मुसलमान बहुल क्षेत्रों में यह निर्याणक भूमिका निभाते हैं।

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    वोक्कालिगा समाज का कितना प्रभाव ?
    कर्नाटक में एक और समाज है, जो राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण और सक्रिय रहा है। कोई भी पार्टी हो वह वोक्कालिगा समाज को नजरअंदाज करके नहीं चल सकती। राज्य में इस समाज के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा माने जा सकते हैं। राज्य में इनकी आबादी 11% है। इस समाज में अबतक मुख्यतौर पर जेडीएस का ही प्रभाव रहा है, लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने इसमें भी अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया है और देवगौड़ा परिवार के सदस्यों को भी हार का सामना करना पड़ा था।

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    कैसे बनाए जा रहे हैं चुनावी समीकरण ?
    राज्य में अनुसूचित जनजाति की आबादी महज 5% है। वहीं, 3% ब्राह्मण और 3% क्रिश्चियन भी अपने-अपने पॉकेट में थोड़े-बहुत प्रभाव रखते हैं। कर्नाटक में जहां बीजेपी शुरू से हिंदुओं को एक समूह के रूप में एकजुट करने की कोशिशों में जुटी रही है, वहीं भाजपा का यह चुनावी नरेटिव कांग्रेस और जेडीएस के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ने में सक्षम है। यही वजह है कि मुस्लिम कोटा और टीपू सुल्तान जैसे मसले पर यहां जमकर राजनीति होती रही है।

    Karnataka assembly election 2023 dates: कर्नाटक में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। देश के तमाम उत्तरी राज्यों की तरह यहां भी जातिगत और धार्मिक समीकरण चुनावों में बहुत बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा में कुल 225 सीटें हैं, जिनमें से 224 पर चुनाव होने जा रहा है। एक सीट नॉमिनेटेड एमएलए के लिए सुरक्षित है। जबकि, अनुसूचित जातियों के लिए 36 और अनुसूचित जनजातियों के लिए 15 सीटें रिजर्व रखी गई हैं। राज्य में इस समय बीजेपी के 119, कांग्रेस के 75 और जनता दल (सेक्युलर) के 28 एमएलए हैं। कर्नाटक चुनाव में दलितों का प्रभाव कर्नाटक विधानसभा में आरक्षित सीटों की तुलना में दलितों और आदिवासियों की आबादी की बात करें तो समाज के इन दोनों महत्वपूर्ण वर्गों का चुनावी समीकरण में प्रभाव को समझा जा सकता है। प्रदेश के कास्ट फैक्टर में दलित समाज का बहुत बड़ा रोल माना जा सकता है। राज्य में इनकी जनसंख्या 20% है। मतलब, जिस भी दल की तरफ दलित मतदाताओं का ज्यादा रुझान हुआ, उसकी किस्मत चमक सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस की राजनीति के दिग्गज चेहरा हैं और इसी समाज से सियासत में आगे बढ़कर देश की सबसे पुरानी पार्टी की सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान हुए हैं। लिंगायत भी कर्नाटक में बहुत बड़े वोट बैंक हैं अनुसूचित जातियों के बाद राज्य में सबसे प्रभावी वोट बैंक लिंगायत समाज का है। इनकी आबादी 17% है और यह समाज कर्नाटक की राजनीति में बहुत अहम किरदार निभाता आया है। राज्य में भाजपा के सबसे बड़े दिग्गज नेता और पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा इसी समाज से आते हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत समाज से हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या दूसरे दलों के बड़े केंद्रीय नेता, लिंगायत मठों का चक्कर यूं ही नहीं काटते रहे हैं। ओबीसी की आबादी सबसे ज्यादा इसी तरह कर्नाटक में ओबीसी या अन्य पिछड़ी जातियों का वोट बैंक बहुत ही महत्वपूर्ण है। ओबीसी में अकेले कुरुबा जाति की जनसंख्या 7% है। बाकी ओबीसी की कुल आबादी भी 16% है। कुरुबा जाति पारंपरिक तौर पर भेड़ पालन से जुड़ी रही है। कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया इसी समाज से हैं। इसके अलावा बीजेपी और कांग्रेस के कई दिग्गज भी ओबीसी समाज से हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी अन्य पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं। कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम वोटरों की भूमिका महत्वपूर्ण कांग्रेस और जेडीएस के लिए मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से बहुत मददगार साबित होता रहा है। यही वजह है कि मौजूदा बीजेपी सरकार ने मुसलमानों के 4% कोटा को खत्म किया है तो कांग्रेस ने सरकार में आने पर उसे पलटने का वादा किया है। राज्य में मुस्लिमों की जनसंख्या 16% है और मोटे तौर पर एकमुश्त वोटिंग की वजह मुसलमान बहुल क्षेत्रों में यह निर्याणक भूमिका निभाते हैं। वोक्कालिगा समाज का कितना प्रभाव ? कर्नाटक में एक और समाज है, जो राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण और सक्रिय रहा है। कोई भी पार्टी हो वह वोक्कालिगा समाज को नजरअंदाज करके नहीं चल सकती। राज्य में इस समाज के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा माने जा सकते हैं। राज्य में इनकी आबादी 11% है। इस समाज में अबतक मुख्यतौर पर जेडीएस का ही प्रभाव रहा है, लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने इसमें भी अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया है और देवगौड़ा परिवार के सदस्यों को भी हार का सामना करना पड़ा था। इसे भी पढ़ें- कैसे बनाए जा रहे हैं चुनावी समीकरण ? राज्य में अनुसूचित जनजाति की आबादी महज 5% है। वहीं, 3% ब्राह्मण और 3% क्रिश्चियन भी अपने-अपने पॉकेट में थोड़े-बहुत प्रभाव रखते हैं। कर्नाटक में जहां बीजेपी शुरू से हिंदुओं को एक समूह के रूप में एकजुट करने की कोशिशों में जुटी रही है, वहीं भाजपा का यह चुनावी नरेटिव कांग्रेस और जेडीएस के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ने में सक्षम है। यही वजह है कि मुस्लिम कोटा और टीपू सुल्तान जैसे मसले पर यहां जमकर राजनीति होती रही है। कर्नाटक में धर्म और जातिगत समीकरण:- दलित: 20% लिंगायत: 17% ओबीसी: 23% वोक्कालिगा: 11% मुस्लिम: 16% आदिवासी: 5% ब्राह्मण: 3% ईसाई: 3%

    कर्नाटक में धर्म और जातिगत समीकरण:-

    • दलित: 20%
    • लिंगायत: 17%
    • ओबीसी: 23%
    • वोक्कालिगा: 11%
    • मुस्लिम: 16%
    • आदिवासी: 5%
    • ब्राह्मण: 3%
    • ईसाई: 3%

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