कपिल सिब्बल बोले आज के दौर में न्यायिक स्वतंत्रता की सबसे ज्यादा जरूरत
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा लोकतंत्र को जीवित रखने और उसे मजबूती देने के लिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहुत जरूरी है। आज के दौर में जब देश कई तरह के संकटों से जूझ रहा है इसकी जरूरत और बढ़ जाती है।तमिलनाडु के वरिष्ठ वकील जे रवींद्रन की तरफ से आयोजित ई-सेमिनार में कपिल सिब्बल ने मौजूदा हालात में न्यायिक जवाबदेही तय करने के तमाम पहलुओं पर चर्चा की।

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सिब्बल ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता के लिए हमें न्याय प्रक्रिया की नींव को मजबूत करना होगा। इसका मतलब है कि हमें ट्रायल और सेशन कोर्ट से न्यायिक सुधार को सबसे पहले अमल में लाना होगा। सिब्बल ने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि निचली अदालतों में जज कई बार कानूनों की गलत व्याख्या करते हुए नियमों के विरुद्ध चले जाते हैं। न्यायिक स्वतंत्रता के लिए जरूरी है कि इन कोर्टों में भी दोनों पक्षों को बराबर प्रक्रियागत सहूलियतें मिलें जिससे दोनों पक्ष बराबर अपना पक्ष रख सकें। उन्होंने इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाया कि जज आजकल केस सुनते समय बोलेते ज्यादा हैं और सुनते कम हैं, जबकि न्याय के लिए जरूरी है कि जज बोलें कम और सुनें ज्यादा।
न्यायिक स्वतंत्रता के लिए उन्होंने हायर कोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार किए जाने को सबसे जरूरी बताया। कोलेजियम सिस्टम पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि ये प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं है और इसका सीधा असर न्यायिक स्वतंत्रता पर पड़ता है। कोलेजियम के माध्यम से होने वाली वरिष्ठ जजों की क्लोज डोर नियुक्तियां की वजह से संस्थागत साख पर सवाल उठते हैं।

सिब्बल ने कहा न्यायिक स्वतंत्रता के लिए जरूरी है कि हम न्यायपालिका को वित्तीय स्वतंत्रता भी दें। हाईकोर्ट से लेकर निचली अदालतों में जजों की बहुत सारी रिक्तियां हैं। ऐसा होने से मौजूदा जजों पर जरूरत से ज्यादा बोझ बढ़ता है, जिसका सीधा असर उनके फैसले और न्याय प्रक्रिया पर पड़ता है।
सिब्बल ने इस बात पर भी जोर दिया कि चूंकि हर जज एक आम नागरिक भी है, इसलिए उसका समाज में आचरण और व्यवहार ऐसा होना चाहिए ताकि फैसला देते समय उसकी व्यक्तिगत साख और प्रमाणिकता पर सवाल ना उठ सके। तमाम जजों पर लगे व्यक्तिगत लाभ के पद और कई तरह के आरोपों के संदर्भ में उन्होंने ये बात कही।
उन्होंने कहा कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस, मास्टर ऑफ रोस्टर होता है और वही तय करता है कि कौन सा केस कौन सी बेंच सुने, इसलिए ये तय करते वक्त कोई आधार होना चाहिए, उसके लिए कोई SOP होना चाहिए और तय करने की प्रक्रिया ट्रांसपरेंट होनी चाहिए। कई बड़े फैसले देने वाले जजों के अचानक ट्रांसफर पर सवाल उठाते हुए उन्होंने इसके पीछे राजनीतिक दखल बताया औऱ कहा कि इससे न्यायिक स्वतंत्रता पर चोट लगती है।

सिब्बल ने कहा कि लोकतंत्र के जिंदा रहने के लिए न्यायपालिका का मजबूत होना जरूरी है और न्यायपालिका की मजबूती के लिए बार एसोसिएशन का एक्टिव रहना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि हमारे हमारे यहां बार एसोसिएशन इस इंटिग्रिटी को बरकरार रखने में नाकाम रही हैं। सिब्बल ने कहा कि संविधान की तरफ से न्यायपालिका को जो असीमित ताकत मिली है उसका अंतिम लक्ष्य, गरीब और सबसे निचले तबके को राहत पहुंचाना, उसे ताकत देना है और न्यायिक स्वतंत्रता के जरिये ही ये संभव हो सकता है।












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