डाक टिकट पर पालकी से लेकर मेट्रो तक का सफ़र

भारतीय डाक विभाग ने हाल ही में अलग-अलग दौर के यातायात के साधनों के उपर डाक टिकट सीरिज जारी की है.

पेड़ के तने से बने पहिए से शुरु हुआ इंसानी यातायात का सफर आज स्पेस शटल की बुलंदियों पर है.

ये कहना ज़रा मुश्किल है कि वक़्त ने सफर के साधनों को बदला या ये सफर करने के साधन थे जिन्होंने वक़्त बदल दिया.

भारतीय डाक विभाग ने हाल ही में विभिन्न युगों में यातायात के साधनों के पर डाक टिकट सीरिज जारी की है.

डाक विभाग ने जारी किए शानदार टिकट, जिन्हें देखना चाहेंगे आप

भारतीय डाक विभाग के 163 साल के इतिहास में ये पहला मौका है जब सफर के साधनों को ध्यान में रखकर उन पर डाक टिकट सीरिज जारी की गई है.

पांच हिस्सों में बंटी हुई ये डाक टिकट श्रृंखला मुग़लिया वक़्त, ब्रिटिश शासन काल, आज़ाद भारत के शुरुआती समय से निकलकर मौजूदा दौर तक पहुंचती है.

ये डाक टिकट हरियाणा में बने भारत के पहले 'ट्रांसपोर्ट हैरिटेज म्यूजियम' से प्रेरित हैं.

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सभी खंडों में सफर के चार-चार साधनों को शामिल किया गया है, इनमें आम से लेकर ख़ास लोगों तक की सवारियों के साधन हैं.

टिकट में शामिल सभी सवारी गाड़ियां लोकप्रिय और व्यापक रुप से इस्तेमाल में लाई जाती थीं.

पहले हिस्से में शामिल पालकियों की टिकट का चित्र कलाकार फ्रैंकिस बालथाज़ार सॉलवेंस की नक्काशी से लिया गया है.

सॉलवेंस 1791 से 1804 तक कलकत्ता में रहे और उसी दौरान उन्होनें इन पालकियों की नक्काशी कागज पर उकेरी.

वो मानते थे कि सफर के साधनों के ज़रिये उन्हें इस्तेमाल करने वाले लोगों की संस्कृति को समझा जा सकता है.

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इनमें से कुछ गाड़ियां आम जनमानस में इतनी लोकप्रिय थीं कि फ़िल्मों में इन्हें लेकर खास दृश्य फ़िल्माए गए और इनसे जुड़े गाने काफी हिट हुए.

दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म 'नया दौर' को कौन भूल सकता है और शमशाद बेगम, रफी की अवाज में 'मदर इंडिया' का गीत 'गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे' आज भी हिट हैं.

अपने हिचकोले के लिए बेहद मशहूर तांगा, जिसे कई जगहों पर टमटम भी कहा जाता है, माना जाता है कि देहाती इलाकों का पहला तिज़ारती वाहन था.

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कहा जाता है कि बीते दौर में इन हिचकोलों की बदौलत कई प्रेम कहानियां जन्मीं. अब ये तांगे लगभग बंद हो चुके हैं.

इस किस्म की घोड़ा गाड़ी भारत में सवारी के साधनों में ब्रिटिश हुक़ूमत के ज़रिये शामिल हुई. सभी तरफ से बंद किए जाने वाली इस घोड़ागाड़ी में ज़्यादातर ऊंचे घरानों के लोग और पर्दापसंद औरतें सवारी करती थीं.

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जे.बी. कृपलानी अपनी किताब 'माई टाईम्स' में इसी तरह की बग्घी से जुड़ी एक दिलचस्प बात बताते हैं कि जब महात्मा गांधी चंपारण में नील की खेती से परेशान किसानों से मिलने गए तो मुज़फ़्फ़रपुर स्टेशन से निकलते वक्त उन्हें इसी तरह की एक बंद बग्घी में बिठाया गया.

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इसे खींचने का जिम्मा कुछ उत्साही युवकों ने लिया, जिस पर गांधी ने ऐतराज किया और बग्घी में बैठने से इनकार कर दिया.

इस पर उन युवकों ने उस वक़्त महात्मा गांधी की बात मान ली लेकिन उनके बग्घी में बैठने के बाद वो उसे खींचने लगे.

जब महात्मा गांधी को ये बात मालूम हुई तो वे बेहद नाराज़ हुए.

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एक समय कलकत्ता (अब कोलकाता) की गलियों की पहचान रहा हाथ रिक्शा पिछले साल बंद कर दिया गया है.

दूसरे विश्वयुद्ध से लौटने वाले भारतीय सैनिकों के साथ भारी संख्या में हार्ले डेविडसन की मोटरसाइकिल आईं जो बाद में मोटरसाइकिल रिक्शे के तौर पर विकसित हुईं.

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चटख रंगो वाली विंटेज कारों के बैगर सफर के साधनों की बात पूरी नहीं हो सकती.

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इस हिस्से में लग्ज़री विंटेज कारों को शामिल किया गया है.

शेवरले 1932 का ये मॉडल भारत के पहले हैरिटेज ट्रांसपोर्ट म्यूजियम के संस्थापक तरुण ठकराल की पहली कार थी. मजबूत बॉडी और ख़ास लुक पर फिदा होकर वो इसे खरीद लाए थे.

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साल 1937 में डबल डेकर बसें आईं. सिंगल डेकर वाहन केवल 36 सवारियों को ले जाने में सक्षम था जबकि जबकि डबल डेकर में 58 यात्री सवार हो सकते थे.

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कोलकाता की पहचान ट्राम को 19वीं सदी के शुरुआती दौर में घोड़ों से खीचा जाता था. 1985 में पहली बार मद्रास (अब चेन्नई) में बिजली से चलने वाली ट्राम की शुरुआत की गई.

ट्राम साल 1900 में कोलकाता और फिर बंबई (अब मुंबई), कानपुर, और दिल्ली में शुरू की गई.

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कोलकाता को छोड़ कर बाकी सभी जगहों पर ट्राम सेवा बंद हो चुकी है. कोलकाता में एशिया में चलने वाला सबसे पुराना इलैक्ट्रिक ट्राम है.

प्रदूषण मुक्त आम यातायात का सबसे प्रभावशाली साधन है मेट्रो.

भारत में मेट्रो की शुरुआत साल 1984 में कोलकाता से हुई.

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साल 2002 में शुरु हुई दिल्ली मेट्रो देश की सबसे बड़ी मेट्रो सेवा है. दिल्ली मेट्रो दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता हुआ मेट्रो नेटवर्क है.

फिलहाल मेट्रो सेवा दिल्ली के अलावा, गुड़गांव, बंगलूरू, चेन्नई, जयपुर और मुबंई में है.

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