झारखंड की अनिश्चित राजनीति में कोई नेता सेफ नहीं, 2014 में CM और 3 पूर्व सीएम हार गये थे चुनाव
झारखंड: 2014 में CM और 3 पूर्व सीएम हार गये थे चुनाव
नई दिल्ली। झारखंड की सियासी फिजां बहुत अनिश्चित रही है। चुनावी मैदान में यहां कोई नेता सेफ नहीं। शिबू सोरेन झारखंड के सबसे बड़े और लोकप्रिय नेता हैं। आदिवासी उन्हें भगवान की तरह आदर देते हैं। ऐसी छवि के वावजूद शिबू सोरेन को चुनावी हार का सामना करना पड़ा है। जब दिशोम गुरू शिबू सोरेन ही यहां के चुनावी मैदान में महफूज नहीं तो कोई और भला कैसे जीत के लिए निश्चिंत हो सकता है। 2014 के विधानसभा चुनाव में तो दिग्गजों के हारने का रिकॉर्ड ही बन गया था। इस चुनाव में तीन पूर्व मुख्यमंत्री, एक मौजूदा मुख्यमंत्री, एक उपमुख्यमंत्री और छह दलों के अध्यक्ष चुनाव हार गये थे। मतदाताओं ने सभी दलों को झटके दिये। 2019 के विधानसभा चुनाव में वैसे तो सभी दल अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। लेकिन चुनावी पिच पर कौन नेता कब रनआउट हो जाएगा, उन्हें भी नहीं मालूम।

शिबू सोरेन
शिबू सोरेन आदिवासी समाज के दिलों पर राज करते हैं फिर भी 2019 का लोकसभा चुनाव वे भाजपा के सुनील सोरेन से हार गये थे। अब उनकी उम्र 75 पार हो चुकी है। उनका राजनीतिक सूरज अब ढलने वाला है। उनका पराभव कुछ पहले से शुरू है। 2009 में मुख्यमंत्री रहते विधानसभा का उपचुनाव हार गये थे। नौसिखिये राजा पीटर ने उन्हें हरा दिया था। शिबू सोरेन की राजनीति विरासत अब उनके पुत्र हेमंत सोरेन संभाल रहे हैं। चर्चा के मुताबिक 2019 के विधानसभा चुनाव में शिबू सोरेन को शिकारीपाड़ा से मैदान में उतारा जा सकता है। शिबू सोरेन की परम्परागत सीट दुमका रही है। हेमंत खुद दुमका से लड़ना चाहते हैं। 2014 में दुमका सीट पर हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री रहते चुनाव हार गये थे। वो तो बरहेट से उन्हें जीत मिल गयी थी वर्ना वे विधायक भी नहीं बन पाते।

मुख्यमंत्री और 3 पूर्व सीएम हार गये थे चुनाव
झारखंड में सीएम हों या पूर्व सीएम वे जीत को लेकर सशंकित रहते हैं। 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव ने दिग्गजों की हार का एक हैरतअंगेज रिकॉर्ड बनाया था। इतने विस्मयकारी नतीजे पहले कभी नहीं आये थे। इस चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दो सीटों से खड़ा हुए थे। वे दुमका में हार गये थे जब कि बरहेट में उन्हें जीत मिली थी। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा खरसांवा सीट से तीन बार चुनाव जीतते रहे थे। 2014 में भी उन्हें जीत का भरोसा था। अगर वे जीत जाते तो भाजपा की तरफ से संभावित सीएम भी होते। लेकिन वोटरों ने उन्हें हरा कर अरमान पर पानी फेर दिया। झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और झाविमो के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी दो सीटों ( राजधनवार और गिरिडीह) पर किस्मत आजमायी थी लेकिन जनता ने दोनों जगहों पर खारिज कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा भी चुनाव हार गये थे। पूर्व उपमुख्यमंत्री रहे सुदेश महतो सिल्ली विधानसभा सीट पर तीन बार चुनाव जीत चुके थे। लोकप्रिय भी थे। लेकिन 2014 का विधानसभा चुनाव वे अपने गढ़ में ही हार गये थे।

छह पार्टियों के अध्यक्ष भी हारे थे चुनाव
कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत 2014 का विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाये थे। उन्हें लोहरदगा में हार का सामना करना पड़ा था। राजद के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह गढ़वा में चुनाव हार गये थे। जदयू के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष जलेश्वर महतो बाघमारा सीट पर शिकस्त खा बैठे थे। तब तृणमूल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बंधु तिर्की मांडर सीट पर पराजित हो गये थे। झाविमो के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी, आजसू के अध्यक्ष सुदेश महतो को हार का सामना करना पड़ा था। 2014 के चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सिर्फ तीन मंत्री ही चुनाव जीत पाये थे बाकि सब हार गये थे। झारखंड में जनता के मूड का अंदाजा लागाना आसान नहीं है।

8 नेता कभी नहीं हारे, उनका क्या होगा ?
झारखंड विधानसभा के अब तक तीन चुनाव (2005, 2009, 2014) हुए हैं। इस राज्य में सिर्फ 8 नेता ऐसे हैं जो अभी तक विधानसभा का चुनाव नहीं हारे हैं। भाजपा के मौजूदा मुख्यमंत्री रघुवर दास ऐसे ही नेता हैं। इसके अलावा भाजपा के सीपी सिंह और नीलकंठ सिंह मुंडा, झामुमो के नलिन सोरेन और जगन्नाथ महतो लगातार जीतते रहे हैं। झाविमो के प्रदीप यादव भी इसी जमात में हैं। वे पौड़ैयाहाट से लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं। लेकिन इस बार यौन शोषण के आरोप में घिरने के बाद उनकी स्थिति बदल गयी है। झाविमो ने 2019 में उन्हें टिकट देने से इंकार कर दिया है। वे किस दल से चुनाव लड़ेंगे, यह साफ नहीं हुआ है। आजसू के चंद्रप्रकाश चौधरी भी लगातार विधायक चुने जाते रहे थे। लेकिन अब वे सांसद बन चुके हैं।












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