J&K Election: जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक दलों के कौन से ऐसे वादे हैं, जिनका पूरा हो पाना मुश्किल है?
Jammu Kashmir Vidhan Sabha Chunav: जम्मू और कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने अपने-अपने घोषणापत्र जारी किए हैं। इनमें कई तो लोक-लुभावन वादे हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से वोटरों से कुछ ऐसे वादे किए गए हैं, जिन्हें पूरा कर पाने की उनकी संभावित सियासी हैसियत को लेकर अभी से सवाल उठ रहे हैं।
जम्मू और कश्मीर में एक दशक बाद विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। सितंबर-अक्टूबर की तीन तारीखों में वोटिंग होनी है और 4 अक्टूबर को वोटों की गिनती होनी है।

इस केंद्र शासित प्रदेश के पहले विधानसभा चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने कुछ ऐसे वादे कर दिए हैं, जिनपर कानून के जानकार भी हैरानी जता रहे हैं।
जम्मू और कश्मीर के राज्य का दर्जा वापसी महज समय की बात!
यह तथ्य है कि जम्मू और कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा मिलना सिर्फ समय की बात है। देश के शीर्ष नेतृत्व की ओर से बार-बार इस बात का भरोसा दिलाया गया है कि आर्टिकल-370 की समाप्ति के बाद इसका जो राज्य का दर्जा छिना था, वह वापस से बहाल होना तय है।
लेकिन, फिर भी तमाम राजनीतिक दलों की ओर से अपने घोषणापत्र में इसे वापस दिलाए जाने के दावे किए गए हैं। जबकि, यह भी साफ है कि इस संबंध में जो भी निर्णय होना है, वह केंद्र सरकार को करना है।
SC/ST-OBC के आरक्षण नीतियों में बदलाव और वापस लेने का वादा
लेकिन, कुछ ऐसे वादे भी सामने आए हैं, जिनको लेकर प्रश्न उठ रहे हैं। मसलन, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस ने साझा घोषणापत्र में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST-OBC) और ओबीसी की आरक्षण नीतियों में बदलाव और इसे वापस लेने का वादा किया है। इसकी शुरुआत आर्टिकल 370 हटने और राज्य को दो केंद्र शासित बनाने के बाद हुई है।
क्या संसद से पास कानूनों को बदल सकेंगे केंद्र शासित प्रदेश के सत्ताधारी दल?
6 फरवरी, 2024 को लोकसभा ने संविधान (जम्मू और कश्मीर) अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 2023 पास किया था। इसके माध्यम से जम्मू और कश्मीर में पहाड़ी समदुया के अलावा गड्डा ब्राह्मण, कोली और पद्दारी जैसे अन्य को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिया गया।
इसके साथ ही लोकसभा से अनुसूचित जाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 2023 को भी मंजूरी मिली, जिसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर में भी वाल्मीकि समुदाय को अनुसूचित जाति (SC)सूची में शामिल करना है।
सवाल है कि अगर ये दल जम्मू-कश्मीर में सत्ता में आ भी गए तो क्या संसद से पास कानूनों को बदलने में सक्षम होंगे? वैसे भाजपा का वादा है कि वह इन नीतियों को पलटने से हर हाल में रोकेगी, खासकर जिसका फायदा वहां के पिछड़े वर्गों को मिल रहा है।
पीडीपी ने भी किए हैं विवादित वादे, सत्ता में आने पर भी पूरा कर पाने को लेकर संदेह!
इस गठबंधन ने इस केंद्र शासित प्रदेश के मतदाताओं से सत्ता में आने पर आर्टिकल 370 हटने से पहले वाली राजनीतिक यथास्थिति बहाल करने का भी वादा किया है। वहीं महबूबा मुफ्ती की अगुवाई वाली पीडीपी ने ऐलान किया है कि सत्ता में आई तो जमात-ए-इस्लामी पर लगे प्रतिबंध को खत्म कर देगी और इस जब्त संपत्तियों को भी वापस कर देगी।
हालांकि, पार्टी ने यह नहीं बताया है कि जमात-ए-इस्लामी पर लगी पाबंदी को वह किस तरह हटाएगी। पीडीपी ने पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से सड़कों से आवाजाही के लिए रास्ते खोलने का भी वादा किया है। यही नहीं, पार्टी ने एनिमी एजेंट्स एक्ट, पब्लिक सेफ्टी एक्ट, अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट और आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट भी हटाने का वादा किया है।
कानून के जानकार भी सियासी दलों के वादों पर उठा रहे हैं सवाल
इन दलों के यह तमाम ऐसे दावे हैं, जिसपर कानून के जानकार भी प्रश्न उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि सीमिति शक्तियों वाली जम्मू और कश्मीर विधानसभा केंद्र सरकार के फैसलों को किस तरह से बदल सकती है।
मुस्लिम वोटरों पर डोरे डालने वाले विवादित वादे!
वैसे जहां तक फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के चुनावी वादों का सवाल है तो इसने श्रीनगर के 'शंकराचार्य हिल' का नाम 'तख्त-ए-सुलेमान' और 'हरि पर्बत' का नाम 'कोह-ए-मारन' रखने जैसे विवादित वादा भी किया है। माना जा रहा है कि इन सब वादों का मुख्य मकसद मुस्लिम बहुसंख्यकों मतदाताओं की भावनाओं को भुनाना है।












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