जहांगीरपुरी हिंसा: मुसलमानों के मुद्दे पर केजरीवाल की चुप्पी के मायने
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन से चर्चा में आए अरविंद केजरीवाल ने क़रीब 10 साल पहले राजनीतिक व्यवस्था को साफ़ करने और विकास करने का वादा करते हुए राजनीति में दाख़िल हुए थे.
अपना आंदोलन शुरू करने के महज़ दो साल में ही वे दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए. बीच के कुछ समय को छोड़ दें तो वे 2013 से दिल्ली की सत्ता में बैठे हैं.
केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को सरकारी स्कूलों की दशा ठीक करने, सस्ते मुहल्ला क्लीनिक शुरू करने और किफ़ायती दरों पर बिजली और पानी मुहैया कराने के लिए जाना जाता है.
उनकी आम आदमी पार्टी ने हाल में पंजाब विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल करके अपने प्रभाव का और विस्तार किया है.
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अरविंद केजरीवाल अक्सर कहते रहे हैं कि उनकी पार्टी सभी धर्मों को समान मानती है और उनका यकीन सभी के लिए न्याय के मौक़े देने में है. धर्म के आधार पर अक्सर बंटी हुई राजनीति देखने वाले भारत में लोगों ने आप के वादे को सराहा था.
लेकिन पिछले हफ़्ते दिल्ली के जहांगीरपुरी में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हुए दंगों के बाद अब आलोचकों का सवाल है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुसलमानों के लिए कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं.
जहांगीरपुरी की घटना के लिए हिंदुओं और मुसलमानों दोनों संप्रदायों ने दंगे के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराया है. मालूम हो कि ये दंगे तब हुए जब रामनवमी का जुलूस एक मस्जिद के सामने से निकल रहा था.
इस घटना के बाद केंद्र की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने ज़्यादातर मुस्लिम लोगों को इस मामले में गिरफ़्तार कर लिया.
साथ ही बीजेपी के ही नेतृत्व वाले नगर निगम ने इलाक़े में मौजूद अवैध अतिक्रमण को ध्वस्त करने के लिए 'बुलडोज़र' का इस्तेमाल किया. हालांकि अतिक्रमण हटाने का यह अभियान सुप्रीम कोर्ट के दख़ल से रोक दिया गया. लेकिन सरकार के क़दम को लोगों ने 'मुस्लिम दंगाइयों को सबक़ सिखाने' के रूप में देखा.
हालांकि सरकार के इन क़दमों से अधिकतर लोगों को कोई अचरच नहीं हुआ. क्योंकि पिछले कुछ सालों में भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाओं में वृद्धि देखने को मिली है. हाल में बीजेपी शासित कई राज्यों में प्रशासन की ऐसी कार्रवाई दिखी है.
आलोचकों का मानना है कि इतना सब होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल की प्रतिक्रिया कोई ख़ास नहीं रही. इस घटना को घटे एक सप्ताह से भी अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक उन्होंने उस इलाक़े का दौरा नहीं किया.
इतना ही नहीं उन्होंने इस मामले की निंदा भी दबी ज़ुबान में की. उन्होंने 'हिंदुओं के जुलूस पर हमला करने वाले पत्थरबाज़ों' की आलोचना तो की, लेकिन हथियार लेकर मार्च करने वाले उन लोगों की उन्होंने कोई आलोचना नहीं की, जिन्होंने कथित तौर पर भड़काऊ नारे लगाए.
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केजरीवाल के इस रुख़ की कई लोगों ने आलोचना की है.
वरिष्ठ पत्रकार और आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता आशुतोष ने कहा, "सभी नागरिकों के पक्ष में खड़े होना सरकार की ज़िम्मेदारी है. लेकिन केजरीवाल ऐसे बर्ताव कर रहे हैं कि जैसे वो केवल हिंदुओं के मुख्यमंत्री हों."
उन्होंने कहा, "सीएम के ट्वीट में पत्थरबाज़ों की आलोचना इसलिए आपत्तिजनक है, क्योंकि उन्होंने उन वजहों की आलोचना नहीं कि जिसके चलते वे पत्थरबाज़ी करने को मजबूर हुए. जुलूस में शामिल लोग हथियारों से लैस थे और उन्होंने मुसलमानों का मज़ाक उड़ाते हुए उनके ख़िलाफ़ आपत्तिजनक नारे लगाए."
आशुतोष ने कहा कि केजरीवाल का सोचना है कि यदि वे बुलडोज़र की कार्रवाई का विरोध करते हैं तो लोग समझेंगे कि वे मुसलमानों का समर्थन कर रहे हैं. भारत में जहां 80 फ़ीसदी लोग हिंदू हैं, वहां केजरीवाल बहुसंख्यकों की राजनीति कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि केजरीवाल के पास इतना नैतिक साहस नहीं है कि वे उन मूल्यों के पक्ष में खड़े हों जिन्हें दुनिया मानती है."
जहांगीरपुरी मामले में विपक्षी दलों की आलोचना वाले बयानों के मुक़ाबले केजरीवाल के रुख़ और उनके जवाब की लोग तुलना भी करने लगे हैं.
इस मामले में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की नेता बृंदा करात के रुख़ की काफ़ी तारीफ़ हुई है, क्योंकि बुलडोज़र चलाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगने के बाद वो तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गईं.
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https://twitter.com/vijayanpinarayi/status/1517035716475498497
लेकिन इस मामले में केजरीवाल और उनकी सरकार की सोशल मीडिया में काफ़ी आलोचना होने के बाद आम आदमी पार्टी ने आख़िर एक दिन बाद अपने दो विधायकों पवन शर्मा और अब्दुल रहमान को जहांगीरपुरी भेजा.
बीबीसी ने केजरीवाल के रुख़ पर विधायक पवन शर्मा से बातचीत की. लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी का बचाव करते हुए कहा, "इस मामले में आप चुप नहीं है, बल्कि हिंदू-मुसलमान या मंदिर-मस्जिद के मामले में न पड़ने का फ़ैसला किया."
वो कहते हैं, "हम सभी धर्मों की बराबरी में यकीन करते हैं. हम विकास की राजनीति करते हैं, हम शिक्षा और स्वास्थ्य पर फ़ोकस करते हैं. हम लोगों को सस्ती बिजली और पानी मुहैया कराते हैं."
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने मकानों और दुकान ध्वस्त करने की कार्रवाई की निंदा की है. उनके अनुसार, जिस तरह से यह अभियान चलाया गया, वो ग़लत है और ये सब बीजेपी का किया धरा है.
उन्होंने कहा कि नगर निगम में पिछले 15 सालों से बीजेपी का ही राज है, तो उसे ही बताना होगा कि इस दौरान अतिक्रमण कैसे हुआ.
क्या कह रहे हैं लोग
जहांगीरपुरी में कथित अतिक्रमण हटाने से अपना रोज़गार खो चुके लोगों ने केजरीवाल और उनकी पार्टी पर उन्हें अधर में छोड़ देने का आरोप लगाया है. ऐसे लाचार लोगों में दिहाड़ी मज़दूर, कचरा बीनने वाले, स्क्रैप डीलर और वेंडर हैं.
अनवरी बीबी आरोप लगाते हुए कहती हैं, "किसी पार्टी के लोग हमारे पास नहीं आए. सरकार हर किसी के लिए काम करती है, लेकिन ऐसा मालूम पड़ता है कि हमारा कोई नहीं है."
सरेजा कहती हैं, "केजरीवाल ने सारी ज़िम्मेदारियों से हाथ धो लिया है. हर चीज़ के लिए वो केंद्र सरकार को जवाबदेह बताते हैं."
वहीं उनके पड़ोसी शेख़ साफिजुद्दीन कहते हैं,"केजरीवाल हम लोगों की बिल्कुल फ़िक्र नहीं करते. वो केवल हमसे वोट चाहते हैं."
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वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित का आरोप है कि दिल्ली सरकार दंगों और दुकानों को तोड़ने के मामले में केवल 'मूकदर्शक' बनी रही, क्योंकि इससे उनका मक़सद पूरा हो रहा था.
वो कहते हैं, ''केजरीवाल ने बिना मुसलमानों को नाराज़ किए रूढ़िवादी नीति अपना ली है. वो 2020 में चुनाव जीतने के बाद से अपने धर्म और आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन करने से नहीं हिचकिचाते.''
राकेश दीक्षित आरोप लगाते हैं कि अब आप भी बाक़ी दलों से अलग नहीं है. वे भी दूसरे दलों की तरह राजनीतिक मजबूरियों से प्रभावित हैं. उन्हें लगता है कि आने वाले वक़्त में हिंदू राष्ट्रवाद का दबदबा बरक़रार रहेगा, इसलिए मुसलमानों की ज़्यादा अहमियत नहीं है.
दीक्षित कहते हैं कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि जब मुसलमानों पर हमले हुए तब केजरीवाल चुप रहे. उनके अनुसार, इससे पहले नागरिकता संशोधन क़ानून और 2020 के दिल्ली दंगे के वक़्त भी वे नहीं बोले.
उनके अनुसार, 2019 में जब जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया, तो इसका समर्थन करने वाले शुरुआती लोगों में से एक अरविंद केजरीवाल भी रहे.
राकेश दीक्षित कहते हें, "वे अपनी विचारधारा इस बात से तय करते हैं कि किसी ख़ास वक़्त और स्थान पर उन्हें किस चीज़ से फ़ायदा मिलेगा. फ़िलहाल उनकी नज़र गुजरात और हिमाचल प्रदेश के आने वाले चुनावों पर हैं. और उन राज्यों में मुसलमान कम संख्या में हैं और वहां का समाज पहले से ही बंटा हुआ है."
उनके अनुसार, "आप की कोशिश है कि मुसलमानों के मुद्दों से दूरी बनाया जाए ताकि उन्हें हिंदुओं के वोटों का नुक़सान न हो."
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