क्या सोनिया-राहुल के वफादार मल्लिकार्जुन खड़गे हैं कांग्रेस में बवाल की मुख्य वजह ?

नई दिल्ली- कांग्रेस की संस्कृति के विपरीत जिस तरह से पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को नेतृत्व परिवर्तन और संगठन में सुधार के लिए खुली चिट्ठी लिखी गई है, वह बहस का अलग मुद्दा हो सकता है। लेकिन, सवाल है कि कांग्रेस के इस बवाल के पीछे राज्यसभा के चुनाव तो नहीं हैं। क्योंकि, हाल के महीनों में गांधी परिवार ने जिस तरह से कुछ खास वफादारों को राज्यसभा में भेजकर पुरस्कृत किया है, उससे पुराने वफादारों के सामने एक अनजाना भय का एहसास होने लगा है। शायद वह इस बात से परेशान हैं कि कहीं उनका समीकरण ना बिगड़ जाए। इसमें से एक बहुत बड़ा नाम मल्लिकार्जुन खड़गे का है। जो लोकसभा चुनाव में तो पार्टी की मिट्टी पलीद कर चुके थे, लेकिन फिर भी उनकी राज्यसभा में एंट्री करवाई गई है, जिससे कुछ नेताओं की आशंकाएं बड़ चुकी हैं।

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    मल्लिकार्जुन खड़गे की वजह से हो रहा है कांग्रेस में बवाल?

    मल्लिकार्जुन खड़गे की वजह से हो रहा है कांग्रेस में बवाल?

    इस साल जून में जो राज्यसभा के चुनाव करवाए गए, उनमें कर्नाटक की चार सीटें भी शामिल थीं। इन चार में से एक ही सीट थी, जिसपर कांग्रेस की जीत पक्की थी। लगभग तय माना जा रहा था कि पार्टी राहुल गांधी के वफादार और सीटिंग एमपी राजीव गौड़ा को फिर से राज्यसभा भेजेगी। लेकिन, पार्टी ने आईआईएम के पूर्व प्रोफेसर रहे गौड़ा को 9 बार लोकसभा सांसद रह चुके मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए बैठ जाने को कह दिया। खड़गे की गांधी परिवार से वफादारी के चलते ही पार्टी ने 2014 से 2019 तक उन्हें लोकसभा में कांग्रेस का नेता बनाए रखा। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के सदन के नेता होने की वजह से खड़गे ने पांच साल तक लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ खूब आवाज बुलंद किया। लेकिन, 2019 के आम चुनाव में वे कर्नाटक की गुलबर्गा में अपनी ही सीट नहीं बचा पाए।

    खड़गे को पांच साल की वफादारी का तोहफा

    खड़गे को पांच साल की वफादारी का तोहफा

    लोकसभा में हार के बावजूद गांधी परिवार ने वफादारी के पुरस्कार के रूप में उन्हें राज्यसभा में एंट्री का टिकट दिया तो कांग्रेस में कई नेताओं के कान खड़े हो गए। क्योंकि, 2014 की मोदी लहर में सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने लोकसभा में दलित और राज्यसभा में मुस्लिम को अपना नेता बनकर एक राजनीतिक संकेत देने की कोशिश की थी। लोकसभा में कांग्रेस की केवल 44 सीटें होने के चलते खड़गे को नेता विपक्ष का दर्जा भी नहीं मिल पाया था। लेकिन, उन्होंने सदन में मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता होने के नाते विभिन्न नियुक्ति समितियों में उन्होंने जितना मुमकिन हुआ अड़ंगा लगाने की भी कोशिश की। जबकि, दूसरी ओर गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा में नेता विपक्ष का दर्जा मिला रहा, जिसे कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है।

    खड़गे की एंट्री से बदल गया कांग्रेस का समीकरण

    खड़गे की एंट्री से बदल गया कांग्रेस का समीकरण

    लेकिन, मल्लिकार्जुन खड़गे के राज्यसभा पहुंचने से सदन में वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का समीकरण पूरी तरह से उलट-पुलट हो जाने के आसार हैं। उच्च सदन के मौजूदा नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद का कार्यकाल फरवरी में पूरा हो रहा है। आने वाले कुछ महीनों में यह तय होना है कि वह फिर से राज्यसभा सदस्य बनेंगे और उन्हीं के पास नेता प्रतिपक्ष का पद बरकरार रहेगा या नहीं। इसपर आखिरी मुहर राहुल गांधी ही लगाने वाले हैं। जाहिर है कि ऐसे में मल्लिकार्जुन खड़गे की राज्यसभा में एंट्री ने कई नेताओं की धड़कनें अभी से बढ़ा दी है। उनकी राज्यसभा सदस्यता पर राहुल गांधी की मुहर है। लोकसभा में वे राहुल के इच्छानुसार अपना रोल बखूबी निभा चुके हैं। इसीलिए इस बात में कोई दो राय नहीं कि मनमोहन सिंह और एके एंटनी के साथ ही पार्टी की अगली कतार वाले नेताओं में उनके चांस बढ़ गए हैं। यह सवाल आजाद को भी परेशान कर रहा है और सदन में उनके डिप्टी रहे आनंद शर्मा को भी, जो पीछे के बेंच पर बैठते-बैठते अब प्रमोशन का इंतजार कर रहे थे। सोनिया को लिखी चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वालों में ये दोनों ही नाम बड़े अहम हैं।

    लोकसभा में भी बिगड़ा है खड़गे की वजह से समीकरण

    लोकसभा में भी बिगड़ा है खड़गे की वजह से समीकरण

    खड़गे की वजह से सिर्फ राज्यसभा में ही कांग्रेस नेताओं का गणित नहीं बिगड़ा है। उनकी वजह से लोकसभा में भी कुछ कांग्रेसियों की उम्मीदों पर पानी फिर चुका है। वे लोकसभा चुनाव हार गए तो पार्टी नेतृत्व ने सदन में पार्टी के नेता के रूप में पश्चिम बंगाल के बड़बोले सांसद अधीर रंजन चौधरी का नाम आगे कर दिया। जबकि, मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे दो पूर्व केंद्रीय मंत्री इस पद के लिए टकटकी लगाए बैठे थे। गौर करने वाली बात है कि सोनिया को नेतृत्व परिवर्तन को लेकर जिन 23 असंतुष्टों ने खत भेजा था, उनमें लोकसभा के यही दोनों सांसद हैं। संगठन में सुधार करने के लिए सोनिया को चिट्ठी लिखने वालों में मुकुल वासनिक का नाम थोड़ा हैरान जरूर करता है। क्योंकि, वो तो हमेशा से गांधी परिवार के बहुत ही वफादार माने जाते रहे हैं। लेकिन, दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस साल महाराष्ट्र में राज्यसभा की एक सीट राहुल गांधी के वफादार राजीव साटव को दे दी गई थी।

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