कोरोना महामारी के बीच भारत ने 16 साल बाद बदली अपनी नीति, चीन से भी सहायता लेने में परहेज नहीं
देश में कोरोना अपने चरम पर है। कोरोना के बढ़ते मरीजों के कारण स्वास्थ्य ढांचा एकदम चरमरा गया है। ऐसे में सरकार ने विदेशों से सहायता प्राप्त करने की अपनी 16 साल पुरानी निति में बड़ा बदलाव किया है।
नई दिल्ली, 29 अप्रैल। देश में कोरोना अपने चरम पर है। कोरोना के बढ़ते मरीजों के कारण स्वास्थ्य ढांचा एकदम चरमरा गया है। ऐसे में सरकार ने विदेशों से सहायता प्राप्त करने की अपनी 16 साल पुरानी निति में बड़ा बदलाव किया है। इस बदलाव के बाद अब सरकार को विदेशों से मिलने वाले उपहार, सहायता या दान स्वीकार करने से कोई परहेज नहीं होगा। नीति में बदलाव करते हुए सरकार ने अब अपने धुरविरोधी चीन से भी मेडिकल उपकरण खरीदने का फैसला किया है।

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भारत इस समय कोरोना से बुरी तरह प्रभावित है। देश के तमाम अस्पतालों में मरीजों की आमद बढ़ गई है। स्वास्थ्य ढांचे पर काफी दबाव बढ़ गया है। ऑक्सीजन, वैक्सीन और स्वास्थ्य देखभाल उपकरणों की कमी पड़ गई है। ऐसे में सरकार ने अपनी नीति में बदलाव करते हुए चीन से मेडिकल उपकरण खरीदने का फैसला किया है।
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न्यूज प्रतिष्ठित न्यूज वेबसाइट इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार, भारत को अब चीन से जीवन रक्षण उपकरण खरीदने में कोई परेशानी नहीं है। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो भारत ने फिलहाल इस पर कोई फैसला नहीं लिया है। हालांकि इस बात की संभावना बेहद कम दिखाई देती है कि भारत पाकिस्तान से किसी भी प्रकार की खरीद या सहायता लेने को मंजूरी देगा। खबर में यह भी कहा गया है राज्य सरकारें विदेशी एजेंसियों से जीवन रक्षण उपकरण खरीद सकती है और केंद्र उनकी राह में रोड़ा नहीं बनेगा।
मोदी सरकार अपने शुरुआती कार्यकाल से ही भारत के आत्मनिर्भर होने की बात कहती रही है, ऐसे में विदेशी सहायता को मंजूरी देने से सरकार की रणनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। मालूम हो कि कांग्रेस सरकार ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते इस नीति को मंजूरी दी थी. जिसमें कहा गया था कि भारत विदेशी स्रोतों से कोई सहायता प्राप्त नहीं करेगा।
हालांकि इससे पहले उत्तरकाशी में 1991 में आए भूकंप, लातूर भूकंप (1993), गुजरात भूकंप (2001), बंगाल चक्रवात (2002) और बिहार बाढ़ (2004) के दौरान सरकार ने विदेशों से सहायता को स्वीकार किया था। साल 2004 में आई सुनाई के दौरान मनमोहन सिंह ने कहा था कि, 'हमारा मानना है कि हम खुद से इस स्थिति का सामना कर सकते हैं और यदि आवश्यकता हुई तो हम उनकी मदद लेंगे।' यह भारत की आपदा सहायता नीति के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था। इस नीति के तहत भारत ने साल 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ और 2005 में कश्मीर में आए भूकंप और साल 2014 में कशमीर में आई बाढ़ के समय विदेशों से सहायता लेने से इंकार कर दिया था।












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