भारत में 35% से ज्यादा महिला डॉक्टर नाइट ड्यूटी में असुरक्षित महसूस करती हैं: IMA का सर्वे
भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि लगभग एक-तिहाई महिला डॉक्टर रात की शिफ्ट के दौरान असुरक्षित या बहुत असुरक्षित महसूस करती हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि कुछ डॉक्टरों को अपनी सुरक्षा के लिए हथियार तक रखने पड़ रहे हैं। यह सर्वे कोलकाता के आरजी कार मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक महिला डॉक्टर के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के बाद किया गया।
IMA के इस अध्ययन में 3,885 डॉक्टरों ने भाग लिया, जो इस विषय पर भारत का सबसे बड़ा अध्ययन है। इस सर्वेक्षण को केरल राज्य IMA के अनुसंधान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉ. राजीव जयदेवन और उनकी टीम द्वारा संकलित किया गया है, और इसे IMA के केरल मेडिकल जर्नल के अक्टूबर 2024 के अंक में प्रकाशित किया जाएगा। सर्वेक्षण में शामिल डॉक्टरों में से 85% डॉक्टर 35 वर्ष से कम आयु के थे और 61% इंटर्न या स्नातकोत्तर ट्रेनी थे। उत्तरदाताओं में 63% महिलाएं थीं।

असुरक्षा की भावना
सर्वे में भाग लेने वाले कई डॉक्टरों ने असुरक्षित (24.1%) या बहुत असुरक्षित (11.4%) महसूस करने की बात कही, जो कुल उत्तरदाताओं का एक-तिहाई है। महिलाओं में यह असुरक्षा की भावना अधिक थी, विशेष रूप से 20-30 वर्ष आयु वर्ग के इंटर्न और पोस्टग्रेजुएट डॉक्टरों में। इसके अलावा, 45% उत्तरदाताओं को रात की शिफ्ट के दौरान ड्यूटी रूम की सुविधा भी नहीं मिली।
ड्यूटी रूम की खामियां
सर्वे के अनुसार, जिन डॉक्टरों को ड्यूटी रूम की सुविधा मिलती भी है, वहां भीड़भाड़, गोपनीयता की कमी और बाथरूम की सुविधा का अभाव जैसी समस्याएं पाई गईं। एक तिहाई से अधिक डॉक्टरों ने बताया कि उनके ड्यूटी रूम में संलग्न बाथरूम नहीं था, जिससे उन्हें देर रात बाहर निकलने की मजबूरी थी। ड्यूटी रूम अक्सर वार्ड या कैजुअल्टी क्षेत्र से भी दूर स्थित होते हैं, जिससे डॉक्टरों की सुरक्षा की चिंता और बढ़ जाती है।
सुरक्षा बढ़ाने के सुझाव
सर्वेक्षण में डॉक्टरों ने सुरक्षा बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव दिए, जैसे कि प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की संख्या बढ़ाना, CCTV कैमरे लगाना, बेहतर रोशनी सुनिश्चित करना, केंद्रीय सुरक्षा अधिनियम (CPA) लागू करना, बाईस्टैंडर की संख्या को सीमित करना, अलार्म सिस्टम स्थापित करना और सुरक्षित ड्यूटी रूम प्रदान करना।
सुरक्षा की मौजूदा स्थिति
डॉक्टरों ने सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें सुरक्षित और सुलभ ड्यूटी रूम, बाथरूम, भोजन और पीने के पानी की सुविधाएं शामिल हैं। इसके अलावा, पर्याप्त स्टाफिंग, प्रभावी ट्राइजिंग और भीड़ नियंत्रण की भी आवश्यकता बताई गई, ताकि डॉक्टर अपने कार्य स्थल पर सुरक्षित महसूस कर सकें।
प्रशासनिक उदासीनता
कई डॉक्टरों ने यह भी बताया कि छोटे अस्पतालों में सुरक्षा संबंधी चिंताओं को लेकर प्रशासन की ओर से उदासीनता देखने को मिलती है। खासकर जूनियर डॉक्टर, जो फ्रंटलाइन पर होते हैं, उन्हें ही सबसे अधिक हिंसा का सामना करना पड़ता है, लेकिन नीति निर्माण में उनकी भागीदारी बेहद सीमित होती है।
नीतिगत बदलाव की आवश्यकता
डॉक्टरों ने सभी स्वास्थ्य सेवा सेटिंग्स में हिंसा को रोकने और हवाई अड्डे जैसी सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए एक केंद्रीय सुरक्षा कानून की मांग की है। यह कानून पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को मानकीकृत करेगा, जिससे मरीजों और डॉक्टरों दोनों को लाभ होगा।
इस अध्ययन के निष्कर्ष नीतिगत बदलावों के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं, जिनमें से कुछ को पहले ही भारत सरकार ने कोलकाता की घटना के जवाब में संबोधित किया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है और डॉक्टरों की चिंताओं पर ध्यान देने का आश्वासन दिया है।












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