हैदराबाद पुलिस ने 'राम के नाम' डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रोकी, 3 गिरफ्तार, भड़के ओवैसी
हैदराबाद में शनिवार को एक रेस्तरां में 'राम के नाम' (इन द नेम ऑफ गॉड) डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग के आयोजन को लेकर तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। शिकायत 30 वर्षीय व्यक्ति पी. रूथविक ने दर्ज कराई थी।
जिन्होंने कहा था कि वह अपने दोस्तों के साथ नेरेडमेट के डिफेंस कॉलोनी में स्थित मार्ले के ज्वाइंट बिस्ट्रो रेस्तरां में गए थे और देखा कि वहां डॉक्यूमेंट्री दिखाई जा रही थी।

उन्होंने कहा कि फिल्म का कंटेंट हिंदू धर्म के खिलाफ है। इस शिकायत के आधार पर राचाकोंडा के नेरेडमेट पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 290, 295-ए और 34 के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की गई थी। किसने की डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग ?
शिकायतकर्ता के अनुसार, जब उन्होंने पूछा कि डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग किसने की थी, तो आयोजकों ने उन्हें बताया कि यह कार्यक्रम एक फिल्म क्लब "हैदराबाद सिनेफाइल्स" द्वारा आयोजित किया गया था और आयोजकों के नाम आनंद, पीयूष उर्फ पराग, श्रीजा और अन्य हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोजकों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और हिंदू धर्म के साथ-साथ विश्व हिंदू परिषद के खिलाफ भी अपमानजनक टिप्पणी की।
असदुद्दीन ओवैसी ने पुलिस की कार्रवाई पर उठाए सवाल
इस बीच, हैदराबाद के सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राचाकोंडा पुलिस से पूछा है कि पुलिस ने फिल्म की स्क्रीनिंग को जबरन क्यों रोका। एआईएमआईएम प्रमुख ने पुलिस से जवाब मांगा कि क्या लोगों को फिल्म देखने से पहले पुलिस से प्री-स्क्रीनिंग सर्टिफिकेट लेना चाहिए।
एआईएमआईएम प्रमुख ने अपने एक्स अकाउंट (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि एक पुरस्कार विजेता वृत्तचित्र की स्क्रीनिंग कैसे अपराध है? यदि ऐसा है, तो फिल्म को पुरस्कार देने के लिए भारत सरकार और फिल्मफेयर को भी जेल भेजा जाना चाहिए। कृपया हमें बताएं कि क्या हमें फिल्म देखने से पहले पुलिस से प्री-स्क्रीनिंग प्रमाणपत्र की आवश्यकता है ?












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