चुनाव खत्म होने के बाद कैसी है असम की सियासी फिजां?

चुनाव खत्म होने के बाद कैसी है असम की सियासी फिजां?

दिसपुर। असम में विधानसभा के चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं। रिजल्ट निकलने में अभी 25-26 दिनों की देरी है। स्थानीय लोग अपने-अपने नजरिये से इस चुनाव का आंकलन कर रहे हैं। वे स्पष्ट तो कुछ नहीं कहते लेकिन एक संकेत जरूर देते हैं। इस बार क्षेत्रवाद, उप राष्ट्रवाद ( भारत से अधिक अपनी अलग क्षेत्रीय पहचान कायम रखने की भावना) और स्थायी सरकार के मुद्दे ने मतदान आचरण का प्रभावित किया है। असमिया फिल्मों की चर्चित अभिनेत्री जरिफा वाहिद सीएए विरोधी आंदोलन का बड़ा चेहरा रही हैं। वे चुनाव से पहले असम जातीय परिषद में शामिल हुई थीं। उनकी राय में यह चुनाव क्षेत्रवाद को एक नये स्तर पर ले जाने के लिए याद किया जाएगा। हिंदी और असमी फिल्मों के मशहूर गायक पापोन ( अंगारग पापोन मोहंता) ने भी सीएए का विरोध किया था। वे मुम्बई से असम वोट देने के इस लिए आये थे क्योंकि वह इस चुनाव को असम की भावनाओं से जुड़ा मानते हैं। असमी फिल्मों की अभिनेत्री प्रस्तुति पराशर की राय में इस बार अधिकतर लोगों ने स्थायी और मजबूत सरकार बनाने के लिए वोट किया है।

क्या मुस्लिम मतों में विभाजन हुआ है ?

क्या मुस्लिम मतों में विभाजन हुआ है ?

राज्य की आबादी के अनुपात में मुस्लिमों की दूसरी सबसे अधिक संख्या असम में है। पहले स्थान पर जम्मू-कश्मीर है। असम में 34 फीसदी मुसलमान रहते हैं। राज्य के 1 करोड़ 22 लाख मुसलमानों में से केवल 46 लाख ही असम के मूल निवासी हैं। जिन्हें स्वदेशी मुसलमान कहा गया है। असमी भाषा और संस्कृति उनकी पहचान है। 76 लाख मुसलमान बांग्ला बोलने वाले हैं जिनकी जीवनशैली असमी संस्कृति से अलग है। अधिकांश बांग्लाभाषी मुसलमानों पर घुसपैठिया होने के आरोप लगता रहा है। इस बार के चुनाव में भाजपा ने मूल असमी मुसलमानों और बांग्लाभाषी मुसलमानों का मुद्दा उठा कर अल्पसंखयक मतों में विभाजन की स्थिति पैदा कर दी। इससे कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। चुनाव में कांग्रेस और यूडीएफ के कार्यकर्ताओं के बीच खींचतान भी रही थी।

स्वदेशी बनाम बांग्लाभाषी मुसलमान

स्वदेशी बनाम बांग्लाभाषी मुसलमान

भाजपा का कहना था कि अल्पसंख्यक कल्याण की सरकारी योजनाओं का अधिकतर लाभ बांग्लादेशी मुसलमान उठा लेते हैं जिससे असम के मूल मुसलमानों की हकमारी हो रही है। इसलिए सर्वानंद सोनोवाल सरकार ने पिछले साल असम के मूल मुसलमानों (स्वदेशी मुसलमान) गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह की पहचान के लिए एक सर्वे किया था। इन चारों समुदाय के प्रतिनिधियों की सलाह पर स्वदेशी मुसलमानों के लिए सामाजिक आर्थिक विकास की योजना अभी प्रक्रियाधीन है। तीसरे चरण के चरण की 40 सीटों में से अधिकतर पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं। भाजपा ने इस बार सात मुस्लिम प्रत्याशियों को खड़ा किया था। 2016 में भाजपा ने नौ मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे जिसमें केवल एक अमिनुल हक लस्कर (सोनाई) से जीते थे। इस बार भाजपा का कहना है कि हमने वैसे मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है जो असम को अपनी मातृभूमि समझते हैं और सनातन संस्कृति का सम्मान करते हैं।

जीत के अपने-अपने दावे

जीत के अपने-अपने दावे

असम के लोगों के जीवन में अंतहीन समस्याएं हैं। बाढ़, गरीबी और पिछड़ेपन की मार झेलने वाले असमी लोगों के सामने जब घुसपैठ (अवैध रूप से आने वाले बांग्लादेशी) का सवाल आता है तब वे अपनी सारी समस्याएं भूल जाते हैं। तब उनके सामने घुसपैठ जीवन-मरण का सवाल हो जाता है। माना जा रहा है कि सीएए से नाराजगी के बावजूद ऊपरी असम के लोगों ने भाजपा को वोट दिया है। भाजपा, यूडीएफ के अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल पर आरोप लगाती रही है उन्होंने अपने राजनीतिक लाभ के लिए लोअर असम में बांग्लादेशी घुसपैठ को बढ़ावा दिया है। इस प्रचार ने असम के हिंदू और मूल मुसलमानों को प्रभावित किया है। भाजपा नेताओं का दावा है कि तीसरे चरण की 40 में से 22 सीटों पर भाजपा-अगप- यूपीपीएल गठबंधन को मिलने वाली हैं। इसके अलावा भाजपा ने पहले चरण की 47 में से 40, दूसरे चरण में 39 में से 25 सीटें जीतने का दावा किया है। दूसरी तरफ कांग्रेस -यूडीएफ- लेफ्ट का गठबंधन भी जीत का दावा कर रहा है। अब 2 मई को मतगणना के बाद ही इन दावों की असलियत पता चलेगी।

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