Himachal Pradesh: क्या चुनावी रेवड़ियों की वजह से वित्तीय संकट में फंसी सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार?
Himachal Pradesh Financial Crisis: हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार को अभी दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन राज्य भयानक वित्तीय संकट में घिर चुका है। आलम ये है कि सुक्खू कैबिनेट को अपनी खुद की सैलरी निकालने पर भी रोक लगानी पड़ गई है। अब राज्य सरकार भाजपा के कार्यकाल वाली कई तरह की सब्सिडियां बंद करने की तैयारी में है।
हिमाचल के सीएम सुक्खू ने खुद ईटी को दिए इंटरव्यू में कहा है कि 'अगर हमारी कैबिनेट दो महीने तक सैलरी नहीं लेती है तो इससे हम कितने पैसे बचा लेंगे? सिर्फ 1 या 2 करोड़ रुपए। यह लोगों को यह संकेत देने के लिए है कि अगर हम चाहते हैं कि हिमाचल प्रदेश 2027 तक आत्मनिर्भर बने तो हमें कड़े फैसले लेने की जरूरत है...हमने अपने से ही इसकी शुरुआत की है।'

बीजेपी कांग्रेस के चुनावी वादों को दे रही है दोष
बड़ा सवाल है कि आखिर दो वर्षों में ही हिमाचल प्रदेश में ऐसा क्या हो गया जो राज्य सरकार को इतने गंभीर आर्थिक संकट की ओर प्रदेश की जनता का ध्यान खींचने की जरूरत पड़ गई। विपक्षी भाजपा का आरोप है कि इस पहाड़ी प्रदेश की ऐसी दयनीय स्थिति महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए मुफ्त में बांटने और पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू करने की वजह से आई है, जिससे खजाना खाली हो रहा है।
सुक्खू सरकार बीजेपी के कार्यकाल पर फोड़ रही है ठीकरा
लेकिन, सुक्खू सरकार इस हालात का ठीकरा पिछली बीजेपी सरकार पर फोड़ रही है और उसके कार्यकाल में शुरू गई करीब 14 सब्सिडियों पर फिर से विचार करने वाली है। कांग्रेस सरकार केंद्र सरकार पर भी फंड रोकने के आरोप लगा रही है।
सुक्खू का कहना है, '2022 के विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी ने सबके लिए बिजली फ्री कर दी थी, यहां तक कि करदाताओं के लिए भी...3,000 स्टेट रोडवेज की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की छूट दे दी। हमने होटल मालिकों की बिजली सब्सिडी हटाने और महिलाओं को बस यात्रा की सब्सिडी आधी करने का फैसला किया है।'
बीजेपी सरकार में दी गई 'रेवड़ियों' पर गाज गिरनी शुरू
उनका कहना है कि बीजेपी सरकार ने जो मुफ्त में पानी देने का फैसला किया था, उसे भी वापस लिया जाएगा। लेकिन, महिलाओं को हर महीने 1500 रुपए देने और पुरानी पेंशन योजना लागू करने के कांग्रेस के चुनावी वादे का वह जमकर बचाव कर रहे हैं। मुख्यमंत्री का दावा है, 'अगर हमने यह कदम उठाए हैं तो हमने प्रदेश का राजस्व भी बढ़ाया है। यही नहीं, ओपीएस की वजह से अभी तक कोई खास वित्तीय बोझ नहीं पड़ा है।'
हिमाचल प्रदेश पर 95,000 करोड़ रुपए का कर्ज
खुद सीएम का ही कहना है कि इस समय हिमाचल प्रदेश पर 95,000 करोड़ रुपए का कर्ज है। 9 पहाड़ी राज्यों में यह सबसे ज्यादा ऋण का पहाड़ है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, 'यह कर्ज हमें बीजेपी से विरासत में मिली है। कल्पना कीजिए कि हमें विकास के लिए नहीं, बल्कि मूलधन और उस पर ब्याज देने के लिए लोन लेना पड़ा है।'
एक आंकड़े के मुताबिक आज हिमाचल के हर व्यक्ति पर 1.17 लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज हो चुका है, जो अरुणाचल प्रदेश के बाद देश में सबसे ज्यादा है।
हिमाचल के बजट का अधिकतर हिस्सा सैलरी और पेंशन पर खर्च
लेकिन, हिमाचल के सीएम के दावों के बीच प्रदेश की वित्तीय सच्चाई की दूसरी और असल तस्वीर बहुत ही भयावह है। राज्य का वार्षिक बजट 58,444 करोड़ रुपए का है, जिसमें से हिमाचल सरकार सिर्फ सैलरी और पेंशन पर 42,079 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।
हिमाचल प्रदेश के वित्तीय संकट की असल वजह?
अगर मोटे तौर पर कहें तो हिमाचल प्रदेश की दयनीय वित्तीय स्थिति के पीछे बहुत ज्यादा उधार लेने, सैलरी और पेंशन पर लागत में वृद्धि और अपर्याप्त राजस्व है।
मुफ्त बिजली, ओपीएस और महिलाओं के खातों में 1,500 रुपए देने से जनता के खजाने पर बोझ बहुत बढ़ गया है। इस योजना पर सालाना 800 करोड़ रुपए और रिटायर्ड कर्मचारियों को ओपीएस देने से सरकार पर सालाना 1,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार बढ़ा है। इसी तरह से वित्त वर्ष 2024 में राज्य इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की बिजली सब्सिडी पर 1,800 करोड़ रुपए की लागत आई है।
एक आंकड़े के मुताबिक हिमाचल में 189,466 से ज्यादा पेंशनधारी हैं, जिनकी संख्या 2030-31 तक बढ़कर 2,38,827 होने की संभावना है। इसके बाद राज्य के खजाने पर सालाना सिर्फ पेंशन पर 20,000 करोड़ रुपए खर्च होने वाला है।












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