हरियाणा की वो अकेली सीट जहां चौधरी देवीलाल की INLD की विरासत बची रही
नई दिल्ली। हरियाणा विधानसभा चुनाव में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) को 11 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं, अभय चौटाला की इंडियन नैशनल लोकदल (INLD) को महज एक ही सीट पर बढ़त हासिल है। देश के उप-प्रधानमंत्री रहे चौधरी देवीलाल के पुत्र ओमप्रकाश चौटाला के दोनों पुत्रों, अजय और अभय चौटाला के बीच राजनीतिक बंटवारे के बाद यह पहला बड़ा चुनाव है। अब तक के रुझान बता रहे हैं कि हरियाणा की जनता ने चौधरी देवीलाल की सियासी विरासत अजय चौटाला के पुत्र दुष्यंत चौटाला को ही सौंपने का मन बनाकर अभय चौटाला से मुंह मोड़ लिया है।

हरियाणा की 90 सीटों में अब तक इनेलो को सिर्फ एक सीट कर जीत मिली है। मतगणना के शुरुआती दौर में अभय चौटाला पीछे चल रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी पर जबरदस्त बढ़त हासिल कर जीत हासिल की। बता दें कि 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में अभय सिंह चौटाला ने इस सीट पर BJP प्रत्याशी को 11539 वोटों से हराया था। 2014 में इस सीट पर इनेलो का वोट शेयर 46.65 प्रतिशत था। 2009 में ओमप्रकाश चौटाला ने इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी को 16423 वोटों से हराया था।
भाई को जेल होने के बाद बनाया INLD
जेबीटी भर्ती घोटाले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और बड़े भाई अजय चौटाला को सजा होने के बाद अभय चौटाला ने ही इनेलो का नेतृत्व किया। वो ऐलानाबाद से लगातार दो बार विधायक चुने गए। पहली बार 2009 में यहां से विधायक चुने गए थे। अभय कई खेल एसोसिएशन के पदाधिकारी भी रह चुके हैं। अभय चौटाला को जमीनी माना जाता है। मगर परिवार में फूट के बाद उन्हें अब राजनीतिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
2000-04 तक सीएम थे चौटाला
आईएनएलडी ने हरियाणा पर 2000 से 2004 के बीच आखिरी बार राज किया था और ओमप्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री बने थे। उस वक्त पार्टी को 90 में से 47 सीटें हासिल हुई थीं। 2005 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ 9 सीटें मिलीं। 2009 में कुछ राहत मिली और आईएनएलडी ने 31 सीटों पर जीत दर्ज की।
उबर पाएंगे अभय चौटाला?
आईएनएलडी प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाले में 10 साल की सजा काटने के लिए तिहाड़ जेल में बंद हैं। चौटाला अगर जेल से छूट भी जाते हैं तो उनसे पार्टी में दोबारा जान फूंकने की उम्मीद नहीं के बराबर है क्योंकि वह 84 वर्ष के हो चुके हैं। अभय चौटाला अच्छे मैनेजर बताए जाते हैं, लेकिन वह अपने पिता की तरह जनता के बीच उतने लोकप्रिय नहीं हैं। इस चुनाव ने यह साबित कर दिया है।












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