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'सरकार भगवान है, सुनबे नहीं करता है'

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    सरकार भगवान है, सुनबे नहीं करता है

    "मैं 40-45 साल से राशन ले रही थी. लेकिन जबसे अंगूठा छापने की मशीन लगी है तबसे बहुत दिक्कत आ रही है. दो-तीन घंटा नंबर लगाते हैं. उसके बाद अंगूठा लगाते हैं तो भी निशान नहीं आता. पहले बेटे को काम से छुट्टी दिलाकर उसके निशान से ले लेते थे. पर इस बार वो भी नहीं चला क्योंकि मेरा फ़ोन ट्रेन में खो गया. मैं मोबाइल पर आने वाला ओटीपी नहीं बता सकी. अब बताओ, कैसे मिलेगा मेरा राशन? ये तो बहुत अच्छा खेल खेलाया सरकार मेरा."

    इतना कहते-कहते दिल्ली में रहने वाली उर्मिला देवी की आंखें भर आईं.

    उनकी आवाज़ तेज़ हो चली थी. गला रुंधा हुआ था लेकिन ग़ुस्सा इतना कि बिना रुके वे आगे बोलीं, "अबकी आएगा ना सरकार मेरा दरवाज़ा पर कि वोट देना है, वोट देना है, तब कहेंगे कि मेरा अंगूठा तो तुम काट कर ले लिया. अब क्या अंगूठा लगाऊं?"

    उनके बगल में बिहार के नालंदा ज़िले से आईं चिंता देवी खड़ी हैं. चेहरा दिल का हाल बता रहा है. तपाक से कहती हैं, "हे सरकार! हम आपसे बहुत माफ़ी मांगते हैं, मेरा बुढ़ारी में कोई सुख दे दो. सरकार भगवान है, सुनबे नहीं करता है. ऐसा सरकार को तो लगते है ना कि क्या कर दें... मिले तो!"

    उर्मिला और चिंता अकेली नहीं हैं जो आधार के चलते भूखों मर रही हैं. बीते गुरुवार को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक जनसुनवाई रखी गई जिसमें 14 राज्यों के लोग शामिल हुए.

    कई बड़े कार्यकर्ताओं और जानकारों की मौजूदगी में इन लोगों ने बताया कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से आधार को जोड़ना कितना बड़ा सिरदर्द बन गया है.

    70 साल की मोहिनी देवी दिल्ली के कुसुमपुर पहाड़ी इलाक़े में रहती हैं.

    मुंह में दांत और बदन पर चर्बी नहीं बची लेकिन फिर भी झाड़ू-पोंछा करके महीने के 3000 रुपये कमाती हैं, उम्र के साथ घिस चुकी उनकी उंगलियां और आंख बायोमीट्रिक वेरिफ़िकेशन में फ़ेल हो जाती हैं.

    "जब हाथ ख़राब है तो आंख भी तो ख़राब होगा ना दीदी?" मोहिनी बड़ी मासूमियत से पूछती हैं.

    'पांच किलो अनाज के लिए क्यों मर रही हो?'

    मोहिनी के परिवार में बेटा-बहू हैं लेकिन राशन कार्ड बनाते समय उनके पास आधार कार्ड नहीं था, जिसके चलते उनके नाम राशन कार्ड में नहीं चढ़ पाए.

    अब घर में सस्ता अनाज सिर्फ़ मोहिनी के ज़रिए ही आ सकता है.

    वो कहती हैं, "तीन महीने से राशन नहीं मिला है. मैंने दुकान वाले से कहा कि एक महीना ऐसे ही दे दो. कहता है, पांच किलो के लिए क्यों मर रही हो. मैं बोली, मरूंगी नहीं? कार्ड ख़राब हो जाएगा, अगले महीने कह दोगे कैंसल हो गया."

    मोहिनी की चिंता बेवजह नहीं है.

    उन्हें वहां लेकर आईं सतर्क नागरिक संगठन की कार्यकर्ता सुमन बताती हैं, "सरकार कहती है कि तीन महीने राशन नहीं लोगे तो आपका राशन कार्ड रद्द कर दिया जाएगा."

    तो फिर मोहिनी का कार्ड तो अब तक रद्द हो गया होगा?

    इसके जवाब में एक और कार्यकर्ता अदिति ने जो बताया वो और भी हैरान करने वाला है, "ऑनलाइन पोर्टल पर इन्हें जनवरी में पूरा राशन मिला हुआ बताया जा रहा है. हमने जब इनसे क्रॉसचेक किया तो पता चला कि इन्हें राशन नहीं मिला था. ऐसे में सरकार जो कह रही है कि आधार से भ्रष्टाचार रुकेगा, वो तो होता दिख नहीं रहा."

    अजमेर के हरमरा गांव से आईं सुवा का हाल तो और भी बुरा है. वे कहती हैं, ''एक साल से राशन नहीं मिला इसलिए मजबूर होकर गारा ढोने का काम कर रही हैं.''

    राशन कार्ड बनवाने के लिए आधार होना ज़रूरी है. पिछले साल सरकार ने राशन लेने के लिए बायोमैट्रिक वेरिफ़िकेशन को ज़रूरी बना दिया.

    राशन की दुकानों पर पीओएस और आइरिस मशीन रखवा दी गईं जिसमें उंगली, अंगूठे के निशान और आंखों की जांच की जाती है.

    इस जांच में निशान मेल होने के बाद फ़ॉर्म भरते वक़्त दिए गए नंबर पर एक वन टाइम पासवर्ड भेजा जाता है. जिसके बाद ही हर व्यक्ति के लिए पांच किलो की दर से मिलने वाला सस्ता अनाज मिलता है.

    लेकिन ये नियम कितना व्यावहारिक है?

    यह समझाते हुए सुमन कहती हैं, "बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास पुराने नंबर हैं ही नहीं, किसी के पास फ़ोन नहीं है, किसी का चोरी हो गया, या नंबर बदल गया, उन लोगों को तो ओटीपी नंबर ही नहीं मिल पाता. कुछ लोग तो इतने बूढ़े हैं कि उनकी आंख का निशान भी नहीं आता. आधार उनका है, उनके पास नंबर है, राशन कार्ड में उनकी फ़ोटो है, राशन लेने भी वो ख़ुद जा रहे हैं फिर भी उन्हें राशन क्यों नहीं मिलता?"

    इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके राशन कार्ड ही नहीं बन पाते.

    मध्य प्रदेश के रीवा से आए राम बहादुर और संजय कुमार बताते हैं कि सालों से हर जगह धक्के खाने के बाद भी राशन कार्ड नहीं मिल रहा.

    वहीं पन्ना ज़िले से आए रवि बताते हैं कि कई बार बने बनाए राशन कार्ड रद्द भी कर दिए जाते हैं, "हमारे क्षेत्र में एक भ्रष्टाचार निवारण समिति बनाई गई थी, जिसने अमीर आदमी बताकर 43 राशन कार्ड निरस्त कर दिए. बहुत कोशिशों के बाद हमने उन्हें बहाल तो करवा लिया लेकिन अगर ऐसा लगातार होता रहे तो गरीब आदमी खाएगा कहां से?"

    सबको बुलाया लेकिन सिर्फ़ दो सांसद आए

    इस जनसुनवाई का आयोजन रोज़ी-रोटी अधिकार अभियान ने किया था जो खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में काम कर रही कईं संस्थाओं का समूह है.

    रोज़ी-रोटी की कार्यकर्ता दीपा सिन्हा के मुताबिक़ "कभी अंगूठा नहीं मिलता, कभी नेटवर्क नहीं है, कभी बिजली नहीं है. यानी जो चीज़ एक बार जाने के बाद आसानी से मिल जाती थी उसके लिए लोगों को दो-तीन जगह भागदौड़ करनी पड़ती है और चार-पांच बार जाना पड़ता है. इससे लोगों का खर्च भी बढ़ रहा है और वो उस दिन काम पर भी नहीं जा पाते."

    दीपा आगे कहती हैं कि "हम चाहते हैं कि मीडिया, संसद और लोगों का ध्यान उन पर जाए जो भूख में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. हमने जनसुनवाई रखी ताकि लोग आकर अपने अनुभव शेयर करें जिससे हमें समझ आए कि ये किसी एक की लड़ाई नहीं है, ये हर जगह हो रहा है."

    दीपा बताती हैं कि उन्होंने 14 राज्यों की सभी पार्टियों के सांसदों को जनसुनवाई में आने का न्योता दिया था लेकिन सीपीआई सांसद डी राजा और कांग्रेस के सांसद राजीव गौड़ा के अलावा कोई नहीं आया.

    लेकिन वे कहती हैं कि उनका हौसला गिरा नहीं हैं. अगली तैयारी घर-घर जाकर ज्ञापन देने की है.

    वे सरकार से चाहते क्या हैं?

    इस सवाल के जवाब में आयोजक समिति की ही एक और सदस्या अंकिता बताती हैं कि उनकी मुख्य रूप से सात मांगें हैं.

    • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून को बेहतर तरीक़े से लागू किया जाए जिससे कवरेज की ख़ामियां ख़त्म की जा सकें
    • सभी सरकारी कल्याण योजनाओं में आधार की अनिवार्यता समाप्त की जाए
    • राशन और पेंशन जैसी योजनाओं के लिए बायोमैट्रिक वेरिफ़िकेशन की अनिवार्यता को हटाया जाए
    • सरकारी कल्याण योजनाओं का बजट बढ़ाया जाए
    • जनवितरण प्रणाली को सर्वव्यापी बनाया जाए और उसमें दाल, तेल जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ जोड़े जाएं क्योंकि लोग उन्हें ऊंची क़ीमत की वजह से खरीद नहीं पाते
    • स्कूलों के मध्याह्न भोजन और आंगनवाड़ी में अंडा, दूध, फल जैसे पौष्टिक पदार्थ शामिल किए जाएं
    • और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना में मिल रहे 5000 रुपये को 6000 किया जाए क्योंकि खाद्य सुरक्षा क़ानून के मुताबिक़ मातृत्व लाभ 6000 रुपये ही होना चाहिए.

    साल 2017 के ग्लोबल हंगर इंडेक्स यानी दुनिया भर में भूख के आंकड़ों में भारत 100वें नंबर पर था. देश के व्यस्क जनसंख्या के पांचवे हिस्से की बीएमआई सामान्य से कम है वहीं 53 फ़ीसदी महिलाएं और 58 फ़ीसदी बच्चों में ख़ून की कमी है.

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    BBC Hindi
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    English summary
    Government is God does not listen

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