किराए के घर के लिए भटक रहे पूर्व मुख्यमंत्री

रावत ने दो सीटों से चुनाव लड़ा था लेकिन वो हार गए. और सूबे की राजधानी में रहने के लिए उन्हें मकान की ज़रूरत है.

हरीश रावत
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हरीश रावत

10 मार्च तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत को देहरादून में मकान ढूंढने में नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं.

हरीश रावत ने कहा कि उन्हें कुछ इस क़दर परेशानियों का सामना करना प़ड़ा कि वो 'बेहद दुखी हो गए.'

रावत ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मकान के मामले में नेताओं की प्रतिष्ठा बहुत ही ख़राब है. मैं तो बहुत ही दुखी हो गया."

सुप्रीम कोर्ट के हुक्म के बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलने वाली सरकारी मकान की सुविधा ख़त्म हो गई है.

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रावत ने दो सीटों से चुनाव लड़ा था लेकिन वो हार गए. और सूबे की राजधानी में रहने के लिए उन्हें मकान की ज़रूरत है.

हाल तक शहर के गढ़ी कैंट इलाक़े में मौजूद बीजापुर गेस्ट हाउस में पांच कमरों में रहने वाले पूर्व मुख्यमंत्री को मकान तो मिला है लेकिन देहरादून शहर के तक़रीबन बाहर.

वो कहते हैं कि लोग नेताओं को मकान देना ही नहीं चाहते.

वो बताते हैं, "लोग सुबह हां बोलते और शाम को मना कर देते. कोई कहता मेरा लड़का आ रहा है, कोई कहता लड़की आ रही है. जब चार-पांच जगह से मना हो गया तो हम समझ गए कि लोग हमें मकान देना ही नहीं चाहते."

एक दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद डॉक्टर रमेश पोखरियाल निशंक हालांकि नेताओं की छवि की बात से बहुत सहमत नहीं दिखते हैं लेकिन मानते हैं कि सार्वजनिक जीवन में रहने वालों को इस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

हालांकि निशंक का देहरादून में अपना मकान है लेकिन इसके बावजूद उन्हें ऑफ़िस के लिए एक अलग मकान किराए पर लेना पड़ा.

वह कहते हैं, "जब एक ही दिन में कभी सौ, कभी पांच सौ लोग आ जाएंगे तो आप क्या करेंगे. उन्हें कहां बैठाएंगे. फिर गाड़ियों से गली में जाम लग जाता है. मेरे पड़ोसी भी परेशान होने लगे थे तो हमें ऑफ़िस के लिए किराए का मकान लेना पड़ा."

वह पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास की सुविधा को इससे जोड़कर देखने की बात करते हैं.

वह कहते हैं कि जनता के काम से ही उन्हें जनता से मिलने की ज़रूरत पड़ती है और सरकारी बंगला होने से आम आदमी को परेशानी भी नहीं होती थी.

प्रॉपर्टी कंसलटेंट फ़र्म प्रोलाइफ़ मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक राजेश रावत कहते हैं, "मशहूर लोगों को या राजनेताओं को मकान मिलने में दिक्कत तो आती ही है क्योंकि इनसे मिलने-जुलने वाले बहुत होते हैं उससे आस-पास के लोगों को परेशानी होती है. फिर सुरक्षा की भावना भी एक मुद्दा होती है. अक्सर लोग अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई लगाकर मकान बनाते हैं और उन्हें उसे नेताओं को सौंपने में थोड़ा डर लगता है."

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