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Flashback 2022 : सुप्रीम कोर्ट के किन फैसलों से बना इतिहास, 10 बड़े मामले जिनमें SC Verdict ने खींचा ध्यान

Flashback 2022 ऐसा अवसर है जहां बीते 12 महीनों के दौरान हुई घटनाओं को याद किया जाए। सबक याद रहें, मिसालों से प्रेरणा ली जाए। सुप्रीम कोर्ट के 10 ऐसे फैसलों पर एक नजर जो 2022 में नजीर बने।

flashback 2022 supreme court

Supreme Court Flashback 2022 में इसलिए भी याद किया जाएगा क्योंकि देश की सबसे बड़ी अदालत ने संविधान से जुड़े कई सवालों पर अहम फैसले सुनाए। 2022 में लंबित मामलों का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण, देशद्रोह, वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) और विदेश से लिए जाने वाले चंदों से जुड़े कानून (FCRA) पर महत्वपूर्ण निर्णय दिए। एक नजर इस साल की 10 बड़ी घटनाओं और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर जिनसे सामाजिक आर्थिक जीवन पर प्रभाव प्रभावित होगा।

कई प्रभावशाली आदेश पारित

कई प्रभावशाली आदेश पारित

सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के पहले छह महीनों के दौरान कई प्रभावशाली आदेश पारित किए। यह भी दिलचस्प रहा कि लंबे समय बाद सुप्रीम कोर्ट में सभी 34 न्यायाधीशों के पद भरे हुए थे। चीफ जस्टिस एनवी रमना और न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ जैसे न्यायविद शीर्ष अदालत के ऐतिहासिक निर्णयों के साक्षी बने। जस्टिस एलएन राव और एएम खानविलकर विशेष रूप से चर्चा में रहे।

सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण का सवाल, डेटा की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण का सवाल, डेटा की जरूरत

26 फरवरी 2021 को, तमिलनाडु सरकार ने वन्नियार समुदाय के लिए सरकारी नौकरी और शिक्षा में 10.5% आरक्षण की घोषणा की। मद्रास उच्च न्यायालय ने आरक्षण को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एलएन राव, बीआर गवई और बीवी नागरत्ना ने तमिलनाडु सरकार की अपील पर 31 मार्च, 2022 को कहा कि आरक्षण अन्य ओबीसी समूहों के खिलाफ भेदभाव करेगा। बाद में जस्टिस एलएन राव, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बीआर गवई ने पदोन्नति में आरक्षण के सवाल पर जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता केस में स्पष्ट निर्णय दिया। न्यायमूर्ति राव ने कहा, राज्यों को समय-समय पर डेटा की समीक्षा की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की राज्यों को फटकार

सुप्रीम कोर्ट की राज्यों को फटकार

Reservation के सवाल पर केस की सुनवाई के दौरान SC ने आगे स्पष्ट किया कि अगर राज्यों को लगता है कि प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है तो मात्रात्मक डेटा एकत्र करने के लिए आरक्षित 'कैडर' का उपयोग इकाई के रूप में करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, राज्य यह सुनिश्चित करें कि आर्थिक रूप से उन्नत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार, आरक्षित सीटों पर दावा न कर सकें। एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में SC ने स्थानीय चुनावों में देरी करने के लिए राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण नीतियां कई बार खारिज होने के बाद महाराष्ट्र सरकार ओबीसी आरक्षण के बिना स्थानीय चुनाव कराने को तैयार है। मई, 2022 में SC ने मध्य प्रदेश सरकार की OBC आरक्षण नीति को अस्थायी रूप से स्वीकार किया गया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीति की संवैधानिकता को भविष्य में चुनौती दी जा सकती है।

'वन रैंक वन पेंशन' नीति बरकरार

'वन रैंक वन पेंशन' नीति बरकरार

नवंबर 2015 में केंद्र सरकार ने सैन्य कर्मियों के लिए वन रैंक वन पेंशन (OROP) नीति बनाई। मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद 16 मार्च, 2022 को न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एस.कांत और जस्टिस वी.नाथ ने OROP को बरकरार रखने का फैसला सुनाया। OROP नीति में कहा गया है कि 1 जनवरी 2014 के बाद सेवानिवृत्त होने वाले सैनिक अपने अंतिम आहरित वेतन के आधार पर पेंशन के हकदार होंगे। सैनिक इस तिथि से पहले सेवानिवृत्त हुए हैं, वे 2013 में अपनी रैंक के मुताबिक अधिकतम और न्यूनतम वेतन के औसत के आधार पर पेंशन के हकदार होंगे। पेंशन राशि हर पांच साल में समय-समय पर संशोधित की जाती है।

OROP सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा

OROP सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा

सेना के अधिकारियों और पूर्व सैनिकों ने OROP नीति की आलोचना की। भेदभावपूर्ण नीति का आरोप लगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओआरओपी की समीक्षा अवधि सेवानिवृत्ति की तारीख की परवाह किए बिना सभी पेंशनभोगियों पर लागू होती है, जो भेदभाव की श्रेणी में नहीं आएगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन पेंशनों की गणना का आधार एक नीतिगत निर्णय है और इसलिए इसमें हस्तक्षेप करना न्यायालय के दायरे में नहीं। दिलचस्प है कि लगभग 42 साल यानी 1973 से ही सैन्य अधिकारियों और रिटायर्ड सैनिकों की तरफ से 'वन रैंक वन पेंशन' (OROP) की मांग लगातार की गई। 2015 में रक्षा मंत्रालय ने OROP नीति की घोषणा की। सेवानिवृत्ति की तारीख और अंतिम वेतन के आधार पर पेंशन की गणना का नियम बना।

NGO के लिए विदेशी दान पर बैन बरकरार

NGO के लिए विदेशी दान पर बैन बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने गैर सरकारी संगठन (NGO) को मिलने वाले विदेशी दान पर प्रतिबंध बरकरार रखा। अप्रैल 2022 में जस्टिस ए.एम खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सी.टी. रविकुमार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2020 की संवैधानिकता को बरकरार रखा। इस कानून के माध्यम से केंद्र सरकार ने एनजीओ को मिलने वाले विदेशी धन पर सख्ती दिखाते हुए प्रतिबंधित लगा दिया। एनजीओ क्षेत्र संशोधन के प्रावधानों से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ।

विदेशी चंदा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा !

विदेशी चंदा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा !

गैर-सरकारी संगठनों के एक समूह ने सर्वोच्च न्यायालय में संशोधन को चुनौती दी और बैन को सरकार की मनमानी करार दिया। विदेशी धन पर 'NGO के अधिकार का उल्लंघन' का आरोप भी लगा। सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों के लिए विदेशी धन का इस्तेमाल रोकने के लिए संशोधन जरूरी है। दलीलों के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा, कानून में संशोधन केंद्र सरकार को लेन-देन की अधिक सावधानी से निगरानी करने में सक्षम बनाएगा। राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता बनी रहेगी। SC ने स्पष्ट किया कि विदेशी दान प्राप्त करना कोई 'अधिकार' नहीं है।

सुरक्षा और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन

सुरक्षा और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन

16 जुलाई, 2021 के बाद पहली बार भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए के तहत राजद्रोह की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मामले पर जुलाई में अदालत ने टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने इस मामले को 7 जजों की बेंच को रेफर करने पर विचार किया। पांच दिन बाद, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से हलफनामा दायर किया। सरकार ने कानून पर पुनर्विचार तक मामले की सुनवाई स्थगित रखने का अनुरोध किया। 11 मई को, खंडपीठ ने सुनवाई स्थगित की। साथ ही अपने आदेश (ambiguous) में कहा, कोर्ट 'आग्रह और उम्मीद करती है' कि कानून पर पुनर्विचार होने तक आईपीसी की धारा 124ए के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों की तरफ से कोई कठोर कदम नहीं उठाए जाएंगे।

राजद्रोह मामला सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा

राजद्रोह मामला सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा

राजद्रोह की संवैधानिकता का मामला सुप्रीम कोर्ट इसलिए पहुंचा क्योंकि दो पत्रकारों- किशोर वांगखेमचा और कन्हैया लाल शुक्ला को 2018 में गिरफ्तार किया गया। राजद्रोह के आरोप लगाए गए। दोनों ने धारा 124ए को चुनौती दी। कानून अस्पष्ट होने और इसके मनमाने प्रयोग से असहमति का दमन करने का आरोप लगा। याचिका के साथ पत्रकारों, सिविल सेवकों और नागरिक समाज संगठनों की तरफ से दायर नौ अन्य मामलों को भी टैग किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट में अग्निपथ स्कीम का विरोध

सुप्रीम कोर्ट में अग्निपथ स्कीम का विरोध

सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने जब सैन्य सुधार पर Agnipath Recruitment Scheme का ऐलान किया तो मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा। अदालत में जस्टिस सीटी रवि कुमार और सुधांशु धूलिया की बेंच ने कहा, गर्मी की छुट्टियों के बाद केस लिस्ट होगा या नहीं इसका फैसला चीफ जस्टिस एनवी रमना करेंगे। जुलाई में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने देशभर की हाईकोर्ट में दायर याचिकाओं के कारण कहा कि इस स्कीम से जुड़े कानूनी सवालों पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। सभी याचिकाकर्ता दिल्ली हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखें। दिसंबर के दूसरे सप्ताह में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस योजना पर फैसला रिजर्व रख लिया।

क्या है अग्निपथ योजना

क्या है अग्निपथ योजना

रक्षा मंत्रालय और तीनों सेनाओं का कहना है कि सशस्त्र सेना में भर्ती की नई स्कीम 'अग्निपथ योजना' के तहत आने वाले वर्षों में सेना में भर्तियां तीन गुना बढ़ने की उम्मीद है। इस स्कीम के कारण युवाओं और अनुभवियों के बीच 50-50 का बैलेंस बनाया जा सकेगा। सरकार का दावा है कि अग्निपथ योजना को लागू करने से पहले इजरायल, अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस, यूके और जर्मनी में सेना भर्ती के मॉडलों को परखा गया है। स्कीम के तहत भर्ती होने वाले युवा अग्निवीर कहे जाएंगे। इनकी औसत आयु घटकर 24 से 26 साल के बीच रह जाएगी। अभी सैनिकों की एवरेज एज 32 साल है।

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का LIVE प्रसारण

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का LIVE प्रसारण

Flashback 2022 इसलिए भी याद किया जाएगा क्योंकि इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया गया। दर्शकों तक कोर्टरूम में होने वाली बातें वीडियो फॉर्मेट में पहुंचीं। संविधान पीठ (पांच जजों की बेंच) में होने वाली सुनवाई का सीधा प्रसारण CJI एनवी रमना की रिटायरमेंट से ठीक पहले 26 अगस्त, 2022 से शुरू हुआ। पांच साल पहले 2017 में कानून के छात्र स्वप्निल त्रिपाठी ने याचिका दायर की थी। 2018 में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर की पीठ ने कहा था, संवैधानिक मामले और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों का लाइव ब्रॉडकास्ट किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट से पहले गुजरात और कर्नाटक में हाईकोर्ट की कार्यवाही यूट्यूब पर दिखाई जाने लगी थी। चीफ जस्टिस रमना के बाद CJI यूयू ललित और उनके बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बने न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल में भी देश की सबसे बड़ी अदालत से महत्वपूर्ण मामलों का सीधा प्रसारण किया जा रहा है।

PMLA कानून में ED की ताकत पर सुप्रीम कोर्ट

PMLA कानून में ED की ताकत पर सुप्रीम कोर्ट

धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) कानून के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) को मिली शक्तियों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में लगभग 100 याचिकाएं दायर की गईं। पीएमएलए की धारा 45 के तहत जमानत के प्रावधान और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में 2018 में कानून में संशोधन को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ईडी को व्यापक और अनियंत्रित जांच की शक्तियां दी गई हैं। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति खानविलकर, जस्टिस माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की 3-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अक्टूबर, 2021 और मार्च, 2022 के बीच 22 दिन सुनवाई की। न्यायमूर्ति खानविलकर के सेवानिवृत्त होने से दो दिन 27 जुलाई को अपने फैसले में देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा, पीएमएलए कानून के सभी प्रावधान बरकरार रहेंगे। कोर्ट ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग जैसे 'जघन्य' अपराध का मुकाबला करने के लिए प्रतिबंधात्मक जमानत की शर्तें (restrictive bail conditions), 'विधेय अपराध' (predicate offence) की सजा और ईडी को मिलीं जांच की व्यापक शक्तियां जरूरी हैं।

सुप्रीम कोर्ट और 2002 के गुजरात दंगों से जुड़ा केस

सुप्रीम कोर्ट और 2002 के गुजरात दंगों से जुड़ा केस

2002 के गुजरात दंगे में जकिया जाफरी को सुप्रीम कोर्ट से निराशा हाथ लगी। जकिया ने 2018 में शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने जून, 2022 के फैसले में कहा कि जानबूझकर इस मामले को दुर्भावनापूर्ण तरीके से (ulterior motives) इतने लंबे समय तक खींचा गया। Flashback 2022 में इस फैसले का जिक्र इसलिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तत्काल बाद एक्टिविस्ट की पहचान रखने वाली तीस्ता सीतलवाड और गुजरात के तत्कालीन डीजीपी आरबी श्रीकुमार को गिरफ्तार किया गया। पूर्व IPS अधिकारी संजीव भट्ट के खिलाफ एक और प्राथमिकी दर्ज की गई। भट अभी जेल में हैं। संक्षेप में इतना कि 2022 में गुजरात दंगे से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 63 आरोपियों को मिली क्लीन चिट को बरकरार रखा। जकिया जाफरी की याचिका खारिज हो गई।

CJI यूयू ललित के दौर में लंबे समय से प्रतीक्षित बदलाव हुए

CJI यूयू ललित के दौर में लंबे समय से प्रतीक्षित बदलाव हुए

सीजेआई एनवी रमना की रिटायरमेंट के बाद न्यायमूर्ति यूयू ललित भारत के मुख्य न्यायाधीश बने। महज 74 दिनों के कार्यकाल में जस्टिस यूयू ललित ने सुप्रीम कोर्ट में बड़े बदलाव की शुरुआत की। पदभार संभालने से दो दिन पहले ही उन्होंने SC में 25 संविधान पीठ वाले केस को लिस्ट करने का ऐलान किया था। चीफ जस्टिस बनने के बाद उन्होंने कहा, सर्वोच्च न्यायालय में '...पूरे साल कम से कम एक संविधान पीठ काम करेगी। केस लिस्ट होने के प्रोसेस में भी बड़े बदलाव आए। एक रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस ललित के चीफ जस्टिस बनने पर पहले हफ्ते में 1800 मामलों का निपटारा किया गया।

EWS आरक्षण बरकरार रहेगा

EWS आरक्षण बरकरार रहेगा

2019 में हुए 103वें संविधान संशोधन के तहत केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर तबके (EWS) के लोगों को आरक्षण का प्रावधान किया। कोर्ट में इसे चुनौती दी गई। रिजर्वेशन के मुद्दे पर चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता में संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने आरक्षण बरकरार रखने का फैसला सुनाया। हालांकि, दिलचस्प बात ये रही कि चीफ जस्टिस ने इस मामले में बहुमत से अलग फैसला लिखा। संविधान पीठ में जस्टिस रविंद्र भट ने भी बहुमत से अलग राय जाहिर की। सीजेआई ललित और न्यायमूर्ति भट ने कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण- पूरी तरह से आर्थिक मानदंडों पर आधारित आरक्षण का प्रावधान- संविधान में मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है, क्योंकि संशोधन से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। अदालत का जो फैसला प्रभावी होगा उसमें EWS रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आरक्षण मिलता रहेगा क्योंकि संविधान संशोधन के बाद लाभार्थी वे होंगे जो मौजूदा आरक्षण की योजनाओं से पहले से लाभान्वित नहीं हो रहे हैं।

Hijab Ban पर SC का फैसला भी सुर्खियों में रहा

Hijab Ban पर SC का फैसला भी सुर्खियों में रहा

कर्नाटक का हिजाब बैन भी लगभग पूरे साल सुर्खियों में रहा। Flashback 2022 में इस फैसले का जिक्र इसलिए क्योंकि देशभर की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी थीं। 12 अक्टूबर, 2022 को, सुप्रीम कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में कर्नाटक सरकार की तरफ से लागू हिजाब बैन को चुनौती देने वाली याचिका पर आदेश पारित किया। खंडित फैसले में जस्टिस हेमंत गुप्ता ने हिजाब पर बैन को बरकरार रखा। उन्होंने तर्क दिया कि प्रतिबंध के कारण शिक्षा में धर्मनिरपेक्षता सुनिश्चित हुई है। पीठ में शामिल जस्टिस सुधांशु धूलिया के तर्क अलग थे। उनके अनुसार, प्रतिबंध के कारण मुस्लिम लड़कियों के शिक्षा के अधिकार प्रभावित हुए। न्यायालय ने कई कानूनी सवाल भी खड़े किए। इसमें पूछा गया कि गतिरोध की संभावना को देखते हुए क्या 2-न्यायाधीशों की खंडपीठ में ऐसे मामलों की सुनवाई ठीक है ?

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